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अक्षय तृतीया – लोक जीवन की अभिव्यक्ति

सभ्यता मनुष्य की बाह्य प्रवत्ति मूलक प्रेरणाओं से विकसित हुई है। मनुष्य की अंतर्मुखी प्रवत्तियों से जिस तत्व का निर्माण होता है,यही संस्कृति कहलाती है। संस्कृति लोकजीवन का दर्पण होती है।जीवन में संतुलन बनाए रखना संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। छत्तीसगढ़ के लोकजीवन की अभिव्यक्ति बनकर आता है अक्ति का त्योहार। अक्ती यानी अक्षय तृतीया है यह आंचलिक शब्द अखाड़ा तीज भी कहा जाता है। दो बड़े शब्दों ‘अक्षय’ और ‘तृतीया’ के मेल से बनता है अक्ती। प्राचीन समय से लेकर अब तक इसे लोकजीवन का सबसे बड़ा पर्व कहा गया है। अक्ती त्याग ,तप और साधना का प्रतीक पर्व है।

हमारी संस्कृति चींटियों को भी शक्कर खिलाने की रही है।उदारता हमारी संस्कृति की आधारभूमि रही है। यही संदेश उजागर करता है अक्ती का त्योहार। यह पर्व ठाकुर – नौकर (कमैया) संबंधों को द्रढ करता है। इस दिन गांव के मातादेवालय में जाकर ठाकुर देव की पूजा करने का विधान है। कृषक दोनो में भरकर धान का भोग लगाने जाता है। सभी किसानों के धान को इकट्ठा किया जाता है। जब तक देवालय में भोग ना लग जाए, गांव में पानी भरना भी वर्जित रहता है। अच्छा मुहूर्त देखकर भोग लगे धानो को खेतों में छिड़क दिया जाता है और सुख समृद्धि और खूब फसल आने की कामना की जाती है। 

अक्ती के दिन यात्रा करना वर्जित माना गया है। ग्रामीण इस दिन आंगन को गोबर से लीप – पोतकर सजीला बनाया जाता है।गोबर की महक से सारा गांव सराबोर हो उठता है। गांव – गांव में इस प्रकार का चलन है अक्ती बिजहा के बिना फसल बोआई अपसकुन माना जाता है। ऐसा महसूस होता है,

ज्यों– 

धरती नाचय घुंघरू बांधे पांव मा,
सूरज के किरना बग ले उईस गांव मा।

ग्रामीण मान्यता है कि अक्ती या अक्षय तृतीया केवल किसानों का ही पर्व है।शहरी क्षेत्रों में गांवों जैसी ताम झाम कहां। इसी दिन ,कृषि मजदूर जो कमैया कहलाते हैं। साल का आखिरी दिन समझकर ठाकुर का द्वार छोड़ देते हैं और अवकाश मनाते हैं। फिर इसी दिन से ‘नया काम’ हाथ में लिया जाता है। कुछ  कमैया पूर्व मालिक के घर ही कमाने लगते हैं, तो कुछ नए काम की तलाश में रहते हैं,यूं कहें की अक्ती किसानों के लिए संवत्सर का प्रतीक होती है। 

ईशा वास्य उपनिषद किंचित जीविका पर संतोष करने का उपदेश देता है। कमैया मजदूर अनजाने में इसी आदर्श को अपनाते नजर आते हैं। लगन व ईमानदारी के साथ वे ठाकुर के हर कार्य में सहयोग करते हैं। ठाकुर – कमैया  एक अदृश्य बंधन के सदृश होता है संबंध, न इसकी लिखा–पढ़ी करने  की झंझट, न साक्ष्य की जरूरत, विश्वास ही समझौता होता है। वर्ष के बीच में काम छोड़कर जाने की नौबत ही नहीं आती। कमैया मजदूर तो सदैव आस में लगा रहता है। यह विश्वास है कि ठाकुर उसे अगले साल भी न्योता देगा। उसे श्रम पर भरोसा जो है।

छत्तीसगढ़ की अक्ती को लेकर मत–मतांतर हैं,पर विद्वान कहते हैं कि यह दरबार से निकलकर जन – जन तक पहुंची एक स्वच्छ परंपरा है। इस दिन यहां आवश्यक रूप से की जाने वाली साफ – सफाई, लिपाई–पुताई, कमैया लोगों का काम छोड़ना,फिर अवकाश मनाना–सभी कार्य इस बात के गवाह हैं कि आनंद व कौतूहल का निर्माण पहले भी होता रहा है। लोकगाथा है कि अक्ती का आविर्भाव कल्चुरी काल में ही हुआ,तब यह दरबार के भीतर की जश्न थी।

कहा जाता है कि एक बार बैठमल नामक अर्दली ने दरबार की साफ सफाई नहीं की। राजा ने जब वस्तुस्थिति देखी, तो झठ उसे दरबार से निकल जाने की आज्ञा दी,तभी महारानी ने दरबार में आकर आरोप अपने सर ले लिया, बोली–

“राजन, बैठमल मेरे काम में व्यस्त था,उसका अपराध हुआ भी  तो वह क्षम्य है। मैं अपराधी हूं,उसे काम कराने ले गई। अतः दंड मुझे दीजिए।” 

उधर बैठमल भी चुप ना बैठ सका,उसने अपनी गलती स्वीकार कर ली और याचना भर स्वर में बोला –

‘महाराज,अपराध मेरा है,मुझे ही दंड देवें।’

राजा ने धीरज से काम लिया,उनके मन में बात उभर आई–‘बैठमल व रानी दोनों ही स्वयं को दोषी मान रहे हैं,बात क्या है ?’

उन्होंने रानी को निवास भेज दिया और बैठमल को आदेश दिया कि जाओ,‘तुम तो आज छुट्टी में जाओ। सभी दरबारी कर्मचारी भी आज अवकाश में चले जाएं।आज खुशी व उत्साह से अवकाश दिन घोषित किया जाता है।’

लोक मान्यता है कि तब दरबार के कर्मचारी सचमुच अपने अपने घर लौट गए,दूसरे दिन फिर,उन्होंने राजा के दरबार में उपस्थिति दी। साथ में एक दिन अक्ती के दिन ही नौकरों–चाकरों के अवकाश मनाने की परम्परा चल निकली।राजा निसंतान जी रहे थे, गुड्डे–गुड़ियों की प्रतिमाएं बनाकर उनका ब्याह रचाए जाने का भी, यही दिन शुभ माना गया। स्वयंसिद्ध मुहूर्त के कारण शुभ फलदाई कहा गया है। आज भी विवाह मुहूर्त एवं वास्तु पूजा के लिए ‘अक्ती’ दिन शुभ माना जाता है।

अब जरा दृष्टि पात करें छत्तीसगढ़ की पूर्व स्थिति पर। धान की पैदावार वर्षा पर निर्भर करती थी। खरीफ की फसल हुई तो हुई,नहीं तो नहीं। ग्रीष्म में तो बबूल और साजा के पेड़ों पर उल्लू ही बोलते।छोटी–छोटी चिड़ियां तो दिखती भी न थी–

कहूं रुख मा घुघवा, घू घु कर नरियावे
अऊ छोटे–छोटे चिरई–चिरगुन ला वो डरवावै।

आज तो स्थिति विपरीत है।सिंचाई व्यवस्था होने के कारण छत्तीसगढ़ के अधिकांश क्षेत्रों में खरीफ व रबी दोनो की फसलें की जाती हैं।पशुओं के लिए चारे की भी समस्या न रही।अक्ती की याद करता हुआ एक कमैया इस तरह कहता है–

कांदी के बीड़ा हर कोठा में बिगरे हे
जस तोरे सुरता हा,मन मा बिसरे हे

अंततः अक्ती यानी अक्षय तृतीया, शोषण व दमन से मुक्त हुए एक अवसर की याद दिलाती है 

अंचल में उदारता, आतिथ्य–सत्कार,सदाउदारता और सहनशीलता के जीवित होने का यह ज्वलंत प्रमाण है। दरबार के वे दिन लद गए।पर वर्ष में एक बार मनाए जाने वाले खुशी व उल्लास के इन क्षणों में गांव में कौन जाना नही चाहता।एक किशोरी अपनी मां से यही आग्रह करती है–

चलो चले मां, सपनों के गांवों में
कांटों से दूर कहीं,फूलों की छावो में।

खई का चिन्हांकन होता था–

एक समय था,जब शिक्षा और सभ्यता के चरण गांवों में नहीं पड़े थे, तब कमइया लोगों के पारिश्रमिक का हिसाब–किताब गोबर से अंकित किया जाता था। तब घर में माई कोठी होती थी।

उस पर अंगुलियों द्वारा निम्न निशान बनाए जाते थे–

पांच काटा –० (एक गोल चिन्ह)
5 काटा खई – ००० (तीन गोल चिन्ह)
1 खंडी का चिन्ह –००० (तीन गोलाइयां मिला दी जाती थी)
3 खंडी खई – ।।। (तीन खंडी लकीरें) 
4 खंडी खई – ।।।। (चार लकीरें)

शुभाशुभ विचार –

  • अक्ती के दिन पानी गिरना शुभ सूचक ।
  • अक्ती–पानी देने पर ही पितृ–तर्पण कार्य पूरा होना।
  • कमैया का काम पकड़ने पर ‘चोंगी–माखूर’ झोंकना कहना।
  • सुखा मिट्टी का ढेला रखकर बरसात की संभावना का विचार करना।
  • कोठी के नीचे चार मिट्टी के ढेले रखे जाते हैं।उन पर जल से भरा घड़ा रखा जाता है।घड़े का पानी झर झर कर सभी ढेलों को गीला करे तो सर्वत्र वर्षा की संभावना मानी जाती है।यदि किसी दिशा में ढेला सुखा रह जाए,तो उस दिशा में वर्षा नहीं होगी।
  • अक्ती का मुहूर्त साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक माना गया है।यदि पर्व के दिन बुधवार हो और रोहिणी नक्षत्र पड़े,तो इसे सर्वश्रेष्ठ तिथि कही जाती है। इस दिन बिना बिचारे ही ‘अक्ती लगिन’ भी आयोजित कर लिया जाता है।

अंततः कहा जा सकता है कि अक्ती श्रम की पूजा का पर्व है।

राजस्थान में अक्षय तृतीया के दिन वर्षा के लिए मुहूर्त निकाला जाता है। लोग मंगलकामना करते हैं कि अच्छी भरपूर वर्षा हो।अनाज का भरपूर उत्पादन हो।यहां कन्याएं मंगलगीत गाती हैं। युवादल रंग बिरंगी पतंगे उड़ाते हैं।अंचल में जिन सात खाद्यानों से पूजा होती है,उसे सतनजा कहा जाता है।

लोक प्रचलित एक और कथा–

प्राचीन काल में धर्मदास नामक वैश्य था।उसने अक्षय तृतीया के बारे में सुना।तब से नित्य देवी–देवताओं की पूजा करता।स्वर्ण,रजत और दिव्य वस्तुएं दान में देता।यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती ( कोसम)के राजा बना।व्रत करके वह धनी,प्रतापी बना,वह पुराणों में उल्लिखित है कि यही धर्मदास आगे चलकर मौर्य वंश का उत्तराधिकारी बना।स्कंदपुराण और भविष्यपूराण में कहा गया है कि बैसाखशुक्ल तृतीया को भगवान विष्णु ने रेणुका के गर्भ में जन्म लिया।महाराष्ट्र के मंदिरों में परशुराम जयंती मनाई जाती है।कभी सुनी जाती है, कि स्त्रियां गौरी पूजा करके अन्न्न और धन बांटती हैं।

लोक पर्व अक्ती

भारतीय संस्कृति में चार स्वयं सिद्ध मुहूर्त माने गए हैं –चैत्र शुक्ल प्रतिष्ठा,अक्षय तृतीय,दशहरा एवं दीप पर्व।इनमे अक्षय तृतीया ऋतु परिवर्तन का पर्व कहा गया है।बैसाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि अक्षय तृतीया, आखातीत अथवा अखाड़ा तीज कही जाती है।जो कभी क्षय या नष्ट न हो,सदैव स्थायी रहे,वही अक्षय कहलाता है।भविष्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया को दिया गया दान स्नान,तप,जप हवन जैसे कर्म के फल अक्षय हो जाते हैं।

स्नातवा कृत्वा व दत्त्वा च ज्ञात्वा अनंत फलम लभेत।।

इन्ही कारणों से यह तिथि अक्षय तृतीया कही जाती है। पुराणों में पुष्टि की गई है कि यह तिथि ईश्वर की तिथि है। अतः इसे चिरंजीवी तिथि भी कहते हैं।धार्मिक मान्यता है कि त्रेता युग का आरंभ अक्षय तृतीया से ही हुआ, इसलिए यह युगादि तिथि भी कहलाती है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि सतयुग के आरंभ की तिथि है। 

बैसाख शुक्ल पक्ष की तृतीया की तिथि त्रेता युग की आदि तिथि कही गई है। माघ कृष्ण पक्ष की अमावस्या को द्वापर की आदितिथि कहते हैं। भाद्र कृष्ण त्रयोदशी को कलयुग की आरंभ तिथि बताई गई है।भविष्य पुराण के अनुसार नर–नारायण, हयग्रीव और परशुराम का अवतरण इसी तिथियों को हुआ था। बद्रीनाथ के कपाट भी इसी दिन खुलते हैं।इस दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर का समापन हुआ था।

कालगणना के अनुसार अक्षय तृतीया बसंत और ग्रीष्म ऋतु का समागम है।

इस इन व्रत रखकर घड़ा,कुल्हड़ की पूजा करने का विधान है।कुछ लोग इसी दिन से घड़े का ठंडा पानी पीना प्रारम्भ करते हैं।स्वयं सिद्ध अभिजीत शुभ मुहूर्त होने के कारण इस दिन विवाहोत्सव जैसे मांगलिक कार्य संपन्न होते हैं।मालवा में खरबूज और आमपत्र रख दिए जाते हैं और उनकी पूजा की जाती है।

यहां ऐसी मान्यता है कि इस दिन कृषि कार्य प्रारंभ करने से सुख समृद्धि आती है।बुंदेलखंड में कुंवारी कन्याएं परिवार के सदस्यों व ग्रामीणों को सगुन सामग्री भेंट करती हैं और लोकगीत गाती हैं।यह व्रत पूर्णिमा तक चलता रहता है।

डॉक्टर प्रकाश पतंगीवार

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