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अच्छी शुरुआत का अज्ञात अंत

यह हमने अक्सर देखा होगा, समाज मे बहुत से मुद्दों पर चर्चाएं होती रहती है । एक स्वाभाविक प्रक्रिया के अनुरूप विचारों का आदान-प्रदान होता है और जब बात कुछ ज्यादा देर चल जाती है तो एक अच्छी शुरुआत मान कर उस दिन की चर्चा को विराम दे दिया जाता है ।

यह इसलिए अच्छी शुरुआत थी

सामान्यतः हम देखते हैं कि सामाजिक पटल पर चर्चाओं का आरम्भ सोची समझी व्यवस्था के अधीन नही होता, किसी सदस्य का कोई संदेश किसी विषय पर चर्चाओं के आरम्भ का उत्प्रेरक बन जाता है । अब चूंकि यह चर्चा नियोजित नही थी, क्षणिक उत्प्रेरणा से आरम्भ हुई थी, और बात करने में लोगों को आनंद भी आया था इसलिए इसे अच्छी शुरूआत मान लिया जाता है…

अंत का आरम्भ

हर शुरुआत का अंत होता है, कुछ शुरुआतें आरम्भ से ही अंत की और बढ़ती जाती हैं ।

प्रदीप

जब किसी कार्य की चर्चा तो अच्छी हो, लेकिन उस चर्चा में भविष्यदृष्टि का अभाव हो तो वह एक शुरुआत मात्र बन कर रह जाती है, किसी भी कार्य की परिणीति भी शुभ हो इसके लिए निरंतरता की आवश्यकता होती है ।

विषय की स्पष्टता कैसे हो

जिस विषय पर चर्चा का शुभारंभ हुआ था उस विषय पर आगे चर्चा जारी रहना चाहिए, निरंतरता से विषय की अच्छाई और बुराई स्पष्ट हो जाती है । जब विषय पर निरंतर चिंतन और चर्चाओं के बाद स्पष्टता आ जाये तब उस पर कार्ययोजना बनाना चाहिए।

कार्यनिष्पादन के बगैर हर चर्चा केवल मनोरंजन है, और मनोरंजन से व्यक्तिगत सुख तो प्राप्त होता है लेकिन जिस विषय पर समय और ऊर्जा का व्यय किया गया उस विषय पर प्रगति नहीं हो पाती ।

इस लिए आवश्यक है कि किसी विषय पर चर्चा इस उद्देश्य से की जाए कि चर्चा के अंत मे कोई न कोई हल समाज के लाभ केलिये निकाला जाए, तभी चर्चाओं की सार्थकता है, अन्यथा एक अच्छी शुरुआत एक अज्ञात अंत की और बढ़ जाती है ।

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

प्रदीप वर्मा (हैहयवंशीय)

मास्टर इन कम्प्युटर एप्लिकेशन (MCA), मास्टर इन हिन्दी लिट्रेचर (MA, साहित्य), पी॰एस॰एम॰ (scrum॰org, यूएस), बेचलर ऑफ लॉं (LLB ऑनर), बेचलर ऑफ कॉमर्स, एम.एस.पी.सी.ए.डी.

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