आए फागुनवा के रीत मोरे ललनी

धर्म और संस्कृति होली

आए फागुनवा के रीत मोरे ललनी

होली प्रतीक है दानवता पर मानवता, अज्ञानता पर ज्ञान और कटुता पर प्रेम की विजय का। वहीं होली पर गाए जाने वाले फाग गीत लोक जीवन को उत्साह –उमंग देने का एक जीवंत जरिया है। सच में छत्तीसगढ़ी फाग गीतों की अल्हड़ता हंसी ठिठोली और लोक सौंदर्य अभिभूत करने वाला है।

फाग गीतों की मस्ती और नगाड़ों की गूंज से पूरा गांव फगुनाई रंग में सरोबार हो उठता है।

 

एक समय था जब अबाल वृद्ध अपने खलिहानों से कटी फसलों की डंठल लिए होलिका दहन स्थल पहुंचते थे। फिर अग्नि उज्जवलित हो जाने पर वे उन डंठलों को अग्नि में समर्पित कर देते। उसी में थोड़ा सा भाग बचाकर “प्रसाद” के रूप में घर ले जाते थे। घर में उन्हें ओसारे में कहीं खौस दिया जाता। इसको लेकर तब एक लोकमान्यता यह थी कि इस राख का उपयोग भयंकर से भयंकर बीमारियों में प्राण रक्षा की जाती थी।

ये प्रमाण भी मिलते हैं कि प्राचीन काल में होलिकाग्नी में जौं और गेहूं की बालियां अर्पित की जाती थीं। गांवों में अब भी यह विश्वास और नियम कायम है। इन दिनों किसान का घर नए अनाज से परिपूर्ण रहता है। वह अन्य दिनों और महीनो की तुलना में फागुन पर्व पर अधिक प्रसन्न रहता है। 

छत्तीसगढ़ का लोक समाज अब भी अनाज को धानी धरती और ईश्वर का वरदान मानता है। वह कोठी में अनाज भंडारण करने के बाद ईश्वर की आराधना करते हुए फागुनी पर्व पर आने वाले वर्ष की मंगलकामना करता है। होली या फागुन पर्व पर प्रचलित तमाम लोककथाओं के प्रसंग में एक ही तत्व निहित होता है,वह है,असत्य पर सत्य की विजय। चाहे वह हिरण्यकश्यप की कथा हो या चाहे भविष्य पुराण में वर्णित डूंडा राक्षिसी की कथा हो।ताड़कासुर का वध और शिव द्वारा कामदेव को भस्म करने की कथाएं भी होली से जोड़ी जाती हैं। लोक मान्यता यह भी है कि सम्राट विक्रमादित्य ने इस दिन विजय पर्व मनाया, तब से नया संवत्सर मनाए जाने की परम्परा शुरू हुई। इसी दिन चैतन्य महाप्रभु का जन्म दिन भी मनाया जाता है।

फागुन पर्व उल्लास और जीवंतता  का प्रतीक है। इस रंग पर्व में प्रयुक्त होने वाले तमाम रंग मानव स्वभावों की अभिव्यक्ति के प्रतीक हैं। होली के पांच रंग लाल, गुलाबी,हरा,पीला और सफेद क्रमानुसार प्रीति,उत्साह,प्रसन्नता,संपन्नता और पवित्रता के संवाहक हैं।ये सारे रंग फागुनी आभा लिए हुए हैं,जिसमे वेश–केश–देश सब एकरंगी हो जाता है। 

 

महाकवि निराला के शब्दों में –

फागुन के रंग राग
बाग बन फाग मचा है
रंग गई पग पग धन्य धरा…।

होली पर्व पर गाए जाने वाले फाग गीतों की सौंदर्य गरिमा शब्दों से नही आंकी जा सकती। उसकी पूर्णता गायन शैली और वादन कला के साथ ही संभव होती है। फिर भी यदि गीतों के शब्द बंध को आधार मानकर विचार किया जाए, तो उसमे छिपी गहरी काव्यानुभूति छलक – छलक उठती है

 

मन हर लियो रे
मन हर लियो रे, छोटे से श्याम कन्हैया
छोटे – छोटे रूखवा कदम से
भुइंया लहसे जाए
पेड़ तरी बैठे कन्हैया
मुख मुरली बजाय
मुख मुरली बजाय
छोटे से श्याम कन्हैया…।
 

छत्तीसगढ़ में बसंत पंचमी के दिन अरंड की शाख गाड़ने से होलिकाउत्सव तक लगभग तेरह दिन या अधिक भी नियमित फाग गीत गाए जाने की परम्परा है। ऐसा नही की सभी युवकों में गायन कुशलता हो। कुछ चुनिंदा लोक गायक ही गांवों में यह दायित्व निर्वहन करते हैं। गांव के चौपालों या खुले गगन तले गायकों की प्रतिस्पर्धात्मक लहरियां गूंजती रहती हैं।

 

सर बांध मुकुट खेलै होरी
बजे नगारा दसों जोड़ी जोड़ी
पहली नगारा अवध में बाजय
राम लखन सीता हवय जोड़ी….।

 

फाग गीतों में राधा कृष्ण और राम सीता शाश्वत मिथक के रूप में व्याप्त हैं। इनमे श्रृंगार के दोनो रूपों संयोग वियोग का वर्णन होता है। कहीं काव्य प्रतिमानों का उत्कर्ष झलकता है। गीतों में अनगढ़ शिल्प सौंदर्य और उद्यम जीवन राग सघनता से आकृष्ट करता है। गीतों में प्रचलित रूढ़ियों और प्राचीन कुरीतियों के खिलाफ भी तीखी अभिव्यक्ति होती है। लोक संघर्ष और पीड़ा के भावों की भी अभिव्यक्ति होती है – 

आए आए फागुनवा के रीत मोरे ललनी
सइयां अभागा न आय
अरे काखर बर भेजवं संदेश मय लिख लिख पतियां
काखर भर भेजवं संदेश  मोर ललनी 

फाग गीतों का शास्त्रीय आधार भले ही न हो पर गायन शास्त्रीय विधान के अनुसार ही होता है। अक्सर ये गीत ध्रुपद धमार राग में गाए जाते हैं। ध्रुपद में 12 और धमार में 14 मात्राएं होती हैं। गायन के दौरान दुगुन और तिगुन किया जाता है। त्रिकाल , दीपचंदी  और कहरवा ताल मात्रा में गाए गीतों की तानें, अलाप , पलटे,खटके और मुरकी का प्रयोग पर्व के उत्साह को द्विगुणित कर देते हैं। युगल नगाड़े, झांझ, मंजीरा, खुल्लर, डमरु, ढपली और ढोलक के समवेत स्यर पर्व की जीवंतमय पर्व की झांकी प्रस्तुत करते हैं।

गायक और पूरा दल नगाड़े के चारों ओर इकट्ठे होकर हाथों से इशारे करते हुए झूम झूम कर गाते हैं। इस दौरान ऐसा महसूस होता है,जैसे गांव मस्ती में झूम रहा है। धरती आसमान गूंज उठता है। लगता है,जैसे गायक गायन में एक – दूसरे से आगे निकल जाने की कोशिश कर रहे हों –

 

अरे राधे बिन होरी न होए
राधे बिन होरी न होए
सहर मा देवय बुलउवा राधे को—राधे को
अरे देवय बुलउवा राधे को—राधे को……।

 

फाग गीत केवल धार्मिक पात्रों के चरित्र का ही बखान नहीं करते,बल्कि इनमे आदर्श और पीड़ित जन की भावना भी दृष्टिगोचर होती है। जनजीवन से जुड़ी लोक लय में अभिव्यक्ति होती है, – कुछ इस तरह

अब की बेर हमर लाज राखो  मुरारी
जईसन लाज राखे अर्जुन के भारत युध मंझारी 
अब राखव लाज हमारी….।

फाग में झूमर या झुमका एक मित्र शैली होती है। इसे ही चहका,लटका या लचका कहते हैं। कुछ भू– भागों में पहवर नामक एक अश्लील फाग भी गाया जाता है। प्राचीन समय में फाग के पुराने रूप को चांचीर कहा जाता था। कुल मिलाकर कहें की फाग की मात्रा, अलाप और काव्य पक्ष बड़ा ही सुदढ होता है। फिर गीतों ही गीतों में होने वाली सवाल जवाब शैली देखने सुनने का मजा ही कुछ और है–

रंग मै होरी कईसे खेलिहय
मय कनहइया के संग 
भरे पिचकारी मोर हाथ मा मोर
झूमर होके तंग…..।

हमारा लोक समाज इतना व्यापक है कि भोजपुरी बुंदेलखंडी फाग भी छत्तीसगढ़ी फाग में आकर मिल जाते हैं। रंग गुलाल की बौछार प्रकृति को नई आभा प्रदान करती है –

 

कन्हइया मै तो दासी तुम्हारी
बिरज की सखियन जाने दे मोहन
देवव मत उनको गारी
जो गति चाहो, करब हमारी
हवव यदुवंशी तिहारी…..

फागुनी पर्व की उमंग किसानों को नया संदेश देती है। यह त्योहार जन को जमीन से जोड़ने का काम करता है। तभी तो इसकी सोंधी सुगंध महानगरों को भी आकर्षित करती है और अतीत की स्मृतियों को पुनर्जीवित करते महानगरवासी गांवों की ओर, जड़ों की ओर चल पड़ते हैं।

डाॅ. प्रकाश पतंगीवार
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