आओ समाज को होली के रंगो से भरे

सामाजिक चिंतन होली

सम्मानित  स्वजाति बंधुओं इस बार होली पर हम सब मिलकर इस बात पर विचार करे

होली हमें इस बात का संदेश देती है कि सभी के जीवन में खुशियों का रंग भरा रहे। संवत्सर होलिका दहन से होता है। जो सभी बुराईयों को पीछे छोड़ जाने का, मन की क्लेश को अग्नि की भेंट चढ़ाने का, स्वच्छ एवं निर्मल ह्रदय से चैत्र मास के प्रथम दिन की शुरुआत करने का तथा वर्ष पर्याप्त खुशियां बांटने का संदेश देता है। होली मिलन की संस्कृति भी इसी बात की परिचायक है। होली सभी तरह के भेद भाव का समाप्त करती है। होली मन में उपजे वैर कटु-वाणी को समूल नाश करने का भी संदेश देती है।

मनुष्य परिस्थितियों का गुलाम होता है| और समय कभी किसी के लिए एक जैसा नहीं रहता है, हम सभी प्रकृति  के बनाये नियम को नहीं तोड़ सकते है| इतिहास इसका गवाह है की कितने धर्म और जातियाँ बनी और गुम हों गयी| परिवर्तन समाज का नियम है, अगर हम इसका पालन करें तो सब कुछ संभव हों सकता है| इसके लिए सबसे पहले अपने समाज को एक मंच पर संगठित करना होगा, और यह तभी पूर्ण रूप से संभव होगा जब हम शिक्षित और सभ्य बनेंगे |  इसमें भी नवयुवकों और शिक्षित लोगों को आगे आना होगा, और सबको बिना किसी भेद भाव और उच्च नीच के साथ लेकर चलना होगा| जीविका के लिए किया गया कोई भी कार्य या व्यवसाय बुरा नहीं होता है पर हम सदैव अच्छाइयों और ऊँचाई के तरफ देखना चाहिए वक्त बदलने के साथ अपने समाज को भी बदलने के लिए प्रेरित करना होगा, पर किसी दबाव या जबरजस्ती नहीं| 

समाज के जो लोग पढ़ लिखकर आगे बढ़ चुके है और समाज के अच्छाइयों और बदलाव को समझ रखते है उन्हें आगे आकर समाज के अन्य लोगों का सहयोग करना चाहिए| यहाँ यह बताना आवश्यक है समाज सेवा के लिए बड़े ही त्याग कि आवश्यकता होती है और यह कार्य किसी एक के द्वारा संभव भी नहीं है, यह प्रशंसनीय है कि पुरे देश में जगह जगह समाज के लोग विभिन्न तरह से विभिन्न नामों और विभिन्न तरीके से संगठन में लगे है| मगर यह पर्याप्त नहीं है और ना ही कभी पूर्ण और स्थायी रूप से सफल हों पायेगा| 

कुछ समाज के लोग एकला चलो आन्दोलन के तरह से भी समाज को जोडने और आगे बढाने में लगे है परन्तु इसमें समाज सेवा कम स्वार्थ अधिक प्रतीत होता है कुछ लोग केवल अपने नाम के प्रचार और ख्याति के लिए समाज सेवा मे लगे है| परन्तु यह उचित प्रतीत नहीं लगता| हमें एक नाम एक रूप एक बैनर के नीचे आकार, समाज के संगठन और मजबूती के लिए बिना स्वार्थ और फायदे के लिए कार्य करना होगा तभी सम्पूर्ण समाज का विकास संभव होगा| यह भी कडुवा सच है की समाज सेवा भी बिना धन के नहीं कि जा सकती है कहने और करने में बड़ा फर्क होता है अतः इस ओर भी हमें समुचित प्रयास कर धन इकट्ठा करने कि आवश्यकता करनी होगी| 

समाज के बड़े बुज़ुर्गों और  अनुभवी लोगों को एकत्र करना होगा उनका संरक्षण प्राप्त करना होगा साथ ही परस्पर जन संपर्क कर राष्ट्र स्तर, राज्य स्तर और जन्हा जन्हा समाज के लोग बहुसंख्यक मात्रा मे है,  जिले स्तर पर संगठन खड़ा कर  समाज के लोगों को  एक दूसरे से जोडना होगा तभी हम सफल हों सकते है| संगठन मजबूत होने के बाद ही हम अन्य समाज के लोगों से प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे तथा राजनैतिक दृष्टि से भी जुड़ सकेंगे| इन सभी सफलताओं को पाने  के लिए समाज में शिक्षा का प्रचार प्रसार करना होगा बिना शिक्षित हुए आगे बढ़ना और संगठित होना संभव नहीं होगा| 

सरकारी और गैर सरकारी मे नौकरी का लाभ पाने हेतु प्रयास करना होगा, समय के मांग के अनुसार व्यवसाय को बदलना होगा| सूचना और विज्ञान को भी अपनाना होगा, परपर जन संपर्क आन्दोलन चलाना होगा, विचारों का आदान प्रदान बिना किसी भेद भाव के करना होगा| समाज के जो लोग जहां भी जिस रूप मे है उनको इतिहास की जानकारियों से रूबरू करना होगा| क्योंकि सब कुछ होते हुए भी यदि इतिहास का ज्ञान नहीं होगा हम उसकी महत्ता को नहीं जान सकेंगे| कार्यों और व्यवसाय से जाति कि गणना नहीं कि जाति है वह मात्र अपनी कार्य पहचान के लिए होती है और इसी अज्ञानता के कारण हम अपने पहचान को अपने जाति समझ कर जोड़ने और लिखने लगे है, यही कडुवा सच है|

यहाँ यह भी बताना आवश्यक है की सदियों से जानी और लिखी जा रही यह परंपरा को कोई भी छोडना नहीं चाहेगा| पर जैसा कि पहले भी लिखा गया है की परिवर्तन प्रकृति और समाज का नियम है, प्रगति के लिए हमें भी इस ओर सोचना ही होगा| साथ ही अन्य समाज के लोगों द्वारा किये जा रहे उनके उत्थान और संगठित होने के कायदे और तरीके से सिखाना होगा, तथा निरंतर बिना किसी स्वार्थ लालच के संगठन के उत्थान और स्वरूप के बारे में विचार करना होगा| 

समाज से हम और हमसे समाज है इसे ही यथार्थ मानकर अपनी एक पहचान बनानी होगी| अबतक जो भी समाज के लोगों के द्वारा किया गया या कर रहे है उसपर कोई टिका या टिप्पणी न करते हुए उत्थान के तरफ एक नए सामाजिक इतिहास की रचना करनी चाहिए ताकि कम से कम आने वाली पीढ़ी के संतानें अपने को गौरवान्वित महसूस कर सके और शान से सर ऊँचा रखकर देश-समाज मे अपना भागीदारी बना सके| कार्य अत्यंत ही अधीन और चुनौती  है| 

पर असंभव नहीं, यदि हम सभी मिलकर सच्चे मन और लगन से इसे शुरू करें तो सफलता अवश्य ही मिलेगी क्योंकि किसी भी क्रय की दृढ़ निषेध के साथ शुरुआत ही उसके सफलता की कुंजी होती है| हमें सही दिशा मे सोचना और उसे तय करना होगा कि कैसे इस चुनौती का सामना करे, हमारा उन सभी समाज के लोगों का धन्यवाद जो लोग जन्हा भी जिस तरीके से समाज के संगठन और उत्थान के लिए कार्य कर रहे है साथ ही यह विनीति कि उस संगठन और उत्थान को एक मंच दे, जिस प्रकार सभी नदिया अलग अलग बहते हुए अपना कार्य करती है परन्तु समुद्र में मिलकर उसे एक विशाल रूप देती है, उसी विशालता को हमें अपने समाज मे परिवर्तन लाकर आगे बढ़ सकते है|

इस दिन लोग आमिर और गरीब के बिच का अंतर नहीं करते है, सभी एक दूसरे के गले मिल जाते है| जो समाज में भाई चहरे की भावना को बढाता है| यह रिश्तों को पुनर्जीवित करने और लोगो के बीच भावनातमक  बंधन को मजबूत बंधन में बाधने में मदद करता है|

हमे होली के रंगों की तरह समाज के हर वर्ग या समूह जो विभिन्न उप नामों से विभिन्न रंगों की तरह जाने पहचानें जाते है और वह सभी हैहय वंश क्षत्रिय समाज को मानते है। इस होली हम सभी एक दूसरे को ऐसे रंगे की पूरा समाज रंगीन संस्कृतिक के तरह तरह बन जाय। होली का त्योहार अनेकता में एकता का संदेश देता हैं, हमे इस संदेश को समाज में ढालना चाहिए| होली समाज को एक साथ लाने और सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने में मदद करती है| 

यह त्यौहार समाज के हर वर्ग द्वारा मनाया जाता है क्योली यह समाज में रंगों की उल्लास कौर खूबसूरती व् खुशी देता है| साथ ही इस त्यौहार की यह परम्परा भी है कि यह दुश्मन को भी गले लगा देती है जिसके लिए एक गाना भी मशहूर है –

होली के दिन दिल खिल जाते हैं
रंगों में रंग मिल जाते हैं
होली के दिन दिल खिल जाते हैं
रंगों में रंग मिल जाते हैं
गीले शिकवे भूल के दोस्तों
दुश्मन भी गले मिल जाते हैं
होली के दिन दिल खिल जाते हैं
रंगों में रंग मिल जाते हैं
होली के दिन दिल खिल जाते हैं
रंगों में रंग मिल जाते हैं होली है…

वास्तव में होली के रंगों की तरह ही हमारा जीवन भी रंगों से भरा होना चाहिए। प्रत्येक रंग अलग-अलग देखने और आनंद उठाने के लिए बनाए गए हैं। यदि सभी रंगों को एक में मिला कर देखा जाए तो वे सभी काले दिखेंगे। लाल, पीला, हरा आदि सभी रंग अलग-अलग होने चाहिए, पर साथ ही हमें इनका आनंद भी एक साथ उठाना चाहिए।  ठीक इसी प्रकार समाज में भी लोग विभिन्न रंगों के तरह विभिन्न उपनामो से जाने जाते है, पर वह सभी हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के रूप में एक ही नाम के विभिन्न उपनाम है, जो रंगों के तरह विभिन्न होते हुए भी सिर्फ रंग के नाम के तरह यानि हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के ही अंग है| 

जिसमे कुछ रंग किसी को अच्छे लगते है कुछ रंग किसी को, अत: हम रंग का भेद ना करते हुए समाज के एकता और मानवता को समझे|

होली आपसी प्रेम, एकता एवं भाई-चारे का प्रतीक पर्व है। होली हमें सभी मतभेदों को भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाने की प्रेरणा देती है। वास्तव में होली प्रेम, प्रसन्नता, एकता एवं सद्भभावना का पर्व है। यह रिश्तों में मिठास भरने का पर्व है। दुश्मम को भी गले लगाने का पर्व है। अतः होली के दिन दोपहर बाद दोस्तों, रिश्तेदारों के आने-जाने, एक दूसरों को अबीर-गुलाल लगाने,  बुजुर्गों के चरणस्पर्श करने, हम उम्र से गले मिलने तथा बच्चों को शुभाशीष प्रदान करने की पुरातन परंपरा हैं। आइये हम सभी फिर से इसे पुनर्जीवित करते हुए थोड़ा समय इस होली से इसकी शुरुवात करे और इस परम्परा से समाज में फिर से सामजिक सद्भभाव, खुशिया और परस्पर प्रेम स्थापित करे| यह पर्व हमें एकता के सूत्र में बाधने में सहयोग बना सकता है|

डॉ॰ विष्णुस्वरूप चंद्रवंशी
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