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आत्मा की आंखें: रामधारी सिंह दिनकर

राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ की कविताओं में एक और ओज, विद्रोह और क्रांति की पुकार है तो दूसरी और कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति । वे संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू भाषा पर आधिकारिक पकड़ रखते थे । पद्मविभूषण की उपाधि सहित साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार आदि से सम्मानित थे ।

दिनकर जी का यह काव्य संग्रह ‘आत्मा की आंखें’ वास्तव में एक पूर्ण मौलिक संग्रह नही है । दिनकर जी के ही शब्दों में इस संग्रह की हर कविता अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय डी एच लौरेंस की कविताओं को देख कर गढ़ी गई हैं । लेकिन जब कोई कवि किसी कविता को अपने रचनात्मक आवरण में छिपा लेता है तो वह उसी की कहलाती हैं ।

आत्मा की आंखें, वास्तव में हमारे मन की आंखों से जीवन के अनुभव की कविता है जिसमे प्रेम में ईश्वर और ईश्वर में दुनिया के दर्शन होते हैं । इस संग्रह की पहली ही कविता “प्रार्थना” ईश्वर से अद्भुत मांग करती है:

मेरे पांव में चांदनी बिछाओ भगवान!

ईश्वर भक्ति में लीन व्यक्ति ही अकेलेपन का आनंद जानता है और बता सकता है । अकेलेपन पर ऐसी अर्थमय कविता पढ़ने के साथ ही हमारे मन मे स्थायी जगह बना लेती है, एक बानगी देखिए:

अकेला होने पर जागते हैं विचार,
ऊपर आती है उठकर
अंधकार से नीली झंकार

तत्वों के केंद्र से होकर एकतान
बिना किसी बाधा के करता है ध्यान
विषम के बीच छिपे सम का
अपने उदगम का

दिनकर जी अपनी खास शैली में कहते हैं:

बाहरी तरंगों पर जितना ही फूलते हैं
हम अपने को उतना ही और भूलते हैं
जड़ जमाना चाहते हो
तो एकांत में जाओ
अगम अज्ञात में अपनी सोरें फैलाओ
अकेलापन है राह
अपने आप को पाने की
जहाँ से तुम निकलचुके हो
उस घर मे वापस जानेको

“आत्मा की आंखे” संकलन की रचनाओं में भावनात्मक विविधताओं के दर्शन होते हैं । मनुष्य मन के विविध भावों को उकेरती चित्रकारी के समान कविताएं उन भावों के चित्र पाठक के मन मे उकेर देती हैं । इन कविताओं को पढ़ने के बाद उनके भावचित्रों को मन से निकलना आसान नही है ।

यह संकलन धर्म, पाप, आत्मा, जीवन, क्लान्त, ज्ञान, विनम्रता, ईश्वर, शैतान, रहस्यवाद और कई अनंत मानवीय भावों की कविताओं से समृद्ध है । दिनकर जी के इस संकलन को पढ़ना एक आनंददाई अनुभव है ।

लोकभारती पेपरबैक्स द्वारा दिनकर ग्रंथमाला सीरीज के अंतर्गत इस संग्रह का प्रकाशन किया गया है । मात्र 150 रुपये की यह पुस्तक लगभग 90 से ज्यादा कविताओं का संग्रह है । यह पाठकों केलिये संग्रहणीय पुस्तक है । हम इस पुस्तक की अनुशंसा करते हैं ।

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

प्रदीप वर्मा (हैहयवंशीय)

मास्टर इन कम्प्युटर एप्लिकेशन (MCA), मास्टर इन हिन्दी लिट्रेचर (MA, साहित्य), पी॰एस॰एम॰ (scrum॰org, यूएस), बेचलर ऑफ लॉं (LLB ऑनर), बेचलर ऑफ कॉमर्स, एम.एस.पी.सी.ए.डी.

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