आध्यात्म: अंतस् का फाग

by | काव्य, रंग बसंत | 0 comments

जिंदगी कैसी भागमभाग,
संचय, नर्तन और संताप।
ढलता सूरज, सागर तट पर,
सजी पालकी चला उजास।

बेशकीमती साँसों का घर,
आत्म-वैभव से आबाद।
सात्विकता की दौलत जोड़ो,
योग जगाये अन्र्तआग।

मौन की भाषा योग सिखाता,
स्वानुभूत वासंती राग।
विषैले नागों को नथकर,
योग चखाता अमृत स्वाद।

योग के दो अलौकिक अक्षर,
अन्तर्दृष्टि और वैराग।
साक्षी भाव से जग को देखो,
मुक्ति का आये सैलाब।

अंर्तऊर्जा बहती निर्झर,
योग रचे अंतस् का फाग।
साँसों की छैनी से गढ़ लो,
मूरत बुद्ध करुण अनुराग।

गिरिराज सुधा
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