ओ ऋतुराज बसंत आओ निमन्त्रण स्वीकारो

by | काव्य, रंग बसंत | 0 comments

ओ ऋतुराज बसंत
तुम्हारे आगमन क़ी
भारतवासी बड़ी बेसब्री से
प्रतीछा करते हैं
आपके आगमन पर
मायूसी पर मस्ती छाती है
धरा पर नया आवरण चढाते हो
वशुन्धरा दुल्हन सा श्रृंगार कर
गदगद हो उठती है

वर्ष भर से मौन
काली कलूटी कोयलिया
पागलों सी
एक ड़ाल से दूसरी ड़ाल पर
फुदक-फुदक कर
आपके आगमन की
घोषणा करती है .
कुहू-कुहू की मधुर वाणी से
सारे वातावरण को
सगीतमय बनाती है .

मुनादी करती है आपके
स्वागत में जश्न मनाने की.
उधर अम्रराइंयां भ़ी
आपके आगमन की सुचना पाकर
ख़ुशी से पागल हो उठती हैं
फूली नहीं समाती हैं
अपनी छाती पर पत्तों की जगह
फूलों को देती हैं
लोग कह उठते हैं
लो आम फिर बौरा गये
लोग झूम उठते हैं
सोचकर लो
दुःख के दिन गये
सुख के दिन आ गये .
लो आम फिर बौरा गये.

वह मरियल टेसू
बदन पर जिसके कल तक
हड्डियाँ -ही -हड्डियाँ थीं
आपका स्पर्श पाकर
केसरिया रंग में रंग जाता है
माँनो हँसकर कहता है
बहादुरों का स्वागत ऐंसे ही
बेताब होकर किया जाता है .
मानो यह भ़ी कहता प्रतीत होता है
गिर कर सम्भलने वाला
संघर्ष में अपना स्वाभिमान
कायम रखने वाला
कभी नहीं मिटता
अन्तोगत्वा वह
खुशिओं से लद जाता है .
सारा ज़माना उसके सामने
नतमस्तक हो जाता है।

रमाकांत बडारया
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