कलयुग

काव्य

भीख मांगे भिखमंगा मन
राशन ले तउन भिखारी
दान करे जुवारी मन
अऊ भोग करे पुजारी ।
खेत जाये किसान
अनाज रोपे बनिहार
धान निकाले हार्वेस्टर

मंडी ले जाये दलाल ।

किसान रोये दर दर
नेता जोड़े खड़े हाथ
अऊ मंद मंद मुस्काये
लूट गे हे इहां किसान।
दलाल दलाली मे पेट भरे
कोचिया मन कांटा मारे म
होशियार, कोचियई करे हर बार
नेता मन के बंदरबांट होए
अऊ बोझा ढोए मजदूर हर किसान।

कानून बनत हे साल दर साल उपभोग होवत हे हर रोज
नेतामन खोजबीन करावत हवे,
कमेटी बिठावत हवे अऊ
रिपोर्ट आवत हवे मरे के बाद।
लाचार होवत हवे महिला मन
न्याय पाये खातिर,
भटकत हवे दर दर
न्याय करईया फंसे हे
नेता मन के चंगुल म
राज हवय, ठाठ हवय त
ई पुलिसिया मन के ।
सायरन हा बाजत हवे दिनरात,
देखाये बर पहरेदारी करत हवे
मरईया मन मरत हवे
अऊ लूटईया मन लूटत हवे
इही हा कलयुग आये
सिरतोन, इसी हा कलयुग आये ।।

रचनाकार :- प्रमेश ताम्रकार

प्रमेश ताम्रकार
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