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कविता: बेटियाँ

बिक गये घर कई, बिक गयी खेतियां
बैठ पायी है डोली में तब बेटियां ।

माँ की चूड़ी बिकी, बिक गयीं बालियां
हाथ मेहँदी रचा पायी तब बेटियां ।

हलवा, पूड़ी तो बेटो के खातिर बने,
बॉसी रोटी चबाती रही बेटियां ।

भैया, भाभी भी अपमान करते बहुत
फिर भी राखी भिजाती रही बेटियां ।

बेटा रोये तो दादी के हाथों में है
गीले बिस्तर पे सोती रही बेटियां ।

पैदा होने पे बेटो के गोली चले,
कोख में ही तो मारी गयी बेटियां ।

इनकी इच्छा को पूछा कभी न गया
बैठ डोली में जाती रही बेटियां ।

बनके नैना सी  जलती रही बेटियां
दर्द होने का सहती रही बेटियां ।

बिक गये घर कई … तब 
बैठ पायी है डोली में…. बेटियाँ ।

 

संकलन : 
ज्योति वर्मा 
खंडवा म.प्र.

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

हैहयवंशी चंद्रकांत ताम्रकार 

सेवक, चिंतक एवं विचारक
हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज
खुरई (जिला-सागर) मध्यप्रदेश
संपर्क : 8319385628

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