कहानी: हाथ बाटना

कहानी

रचनाकार – रामसहाय, अशरफाबाद, लखनऊ l

एक सत्य बात हमेशा याद रखना, “दुआएं रद्द नहीं होती, बस बेहतरीन वक्त पर कबूल होती है”

एक गाँव में एक मंदिर था l जिसमें भगवान राम, सीता, लछमन और हनुमान जी की मूर्तियां थी, पुजारी जी अकेले थे सो उन्होंने गाँव के एक किसान के लड़के को काम धाम के लिए रख लिया, लड़का महा मुर्ख था l उसे जितना बता दो उतना कर पाता था l एक बार पुजारी जी ने प्रयाग जाने का विचार किया ,तो किसान के बेटे से बोले “बेटा तुमने देखा ही हैं, कि मैं पूजन कैसे करता हूँ lसारा काम उसी तरह करते रहना, मंदिर धोना साफ करना क्यारियों में पानी डाल देना, भगवान को नहला देना चंदन फूल चढ़ा देना, और भोजन बनाकर उनका भोग लगा देना, उसके बाद खाना ल चढ़ा देना, और भोजन बनाकर उनका भोग लगा देना, उसके बाद खाना l पुजारी जी के चले जाने के बाद किसान का बेटा काम पर लग गया l

10 बाल्टी पानी से उसने मंदिर धोया मूर्तियों को नहलाया, चंदन फूल चढ़ाया l और खाना बनाने बैठ गया l भोजन तैयार हो गया तो थाली परोस कर मंदिर में ले गया और मूर्तियों के समाने रखकर बोला लो भगवान भोग लगाओl लड़का आँख बन्द करके बैठा पर भगवान ने भोग नहीं लगाया l दस मिनट बीता एक घंटा दो घंटा बीता मगर भगवान ने भोग नहीं गया अंत में उसने कहा भगवान भोग लगा लो, तो बाकी का काम समाप्त करूँ वरना गुरु जी अप्रसन्न होगे मेरी भी आंतें भूख से व्याकुल है l

“भगवान का भक्त होने का मतलब यह नहीं कि आप कभी गिरेंगे नहीं, पर जब आप गिरेंगे तो भगवान आपको स्वयं थाम लेंगे ।

आखिर चारों मूर्तियों ने आकर भोजन कियाl लड़के ने पूछा राम जी आप तो भगवान है, ये बाकी लोग कौन है? राम जी ने कहा ये लछमन है तुम्हारे चाचा और ये है सीता तुम्हारी ताई और ये हनुमान जी तुम्हारे दादा जीl तो महाराज ऐसा करो काम बाट दो l अकेला मै काम करते -करते थक जाता हूँ l दादा जी से कहिये मंदिर साफ कर दिया करे, चाचा से कहिये बाजार से समान ले आया करें, और ताई जी भोजन पकाये l सभी बैठे -बैठे खाते है अच्छा नहीं लगता है l निश्छल भक्ति की बात भगवान कैसे टालते राजी हो गये और यही क्रम चल पड़ा, आठ, दस दिन के बाद ज़ब पुजारी जी लौटे तो देखा हनुमान जी पानी खींच रहे है, सीता जी रसोई में खाना बना रही, राम जी मन्दिर को झाड़ -पोछ रहे है l ये देखकर पुजारी जी चकित रह गये पूछा बेटा यह सब क्या है l कुछ नहीं महाराज ये लोग खाली बैठे रहते थे सो मेरा हाथ बाट रहे है और क्या l राम जी हँस कर चुप रह गये l

“आस्था पर जितना विश्वास है उतना अगर अपने कर्तव्य पर हो तो हर परिक्षा में आप सफल रहोगे। क्योंकि आपका विश्वास ही ये निर्धारित करता है के आप अपने कर्तव्य के लिऐ अपने आप को कितना समर्पित करते हो। आस्था का मतलब यह मानना नहीं है कि ईश्वर आपके लिए सही करेंगे, बल्कि यह है की ईश्वर जो करेंगे वह सही होगा।”

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलाती है

“जब तक आप स्वयं पर विश्वास नहीं करते, तब तक आप ईश्वर पर भी विश्वास नहीं कर सकते हैं ।”

मनुष्य को जीवन कभी किसी के आस्था और विश्वास को ना तो कभी तोड़ना चाहिए और नहीं स्वयं से कभी छोड़ना चाहिए| किसी भी व्यक्ति की परिस्थिति या दशा उसके चरित्र को बया नहीं कर सकता है| हम व्यक्ति को बिना समझे या परखे कोई निर्णय नहीं कर सकते है| बेजान पत्थर भी पूजे जाते है और उन्हीं पत्थरों से किसी को घायल भी किया जा सकता है| और जब बात ईश्वर की आस्था का है तो हम इसे कभी भी अमान्य नहीं कर सकते है| जीवन जीने की एक ही आधार है कर्तव्य, परिश्रम और विश्वास के साथ अपने जीवन को जीने का प्रयास करना चाहिए| कोई भी चीज़ सुख, दुःख, अमीरी, गरीबी,सम्पति और विपत्ति कभी स्थाई नहीं हो सकते है, यह भी सूर्य और चंद्रमा के सामान चलायमान गतिशील और परिवर्तन होते रहते है| “प्रार्थना और ध्यान इंसान के लिए बहुत जरूरी है। प्रार्थना में भगवान आपकी बात सुनते है, और ध्यान में आप भगवान की बात सुनते है।”

श्रीमति रीता सिंह चंद्रवंशी
Latest posts by श्रीमति रीता सिंह चंद्रवंशी (see all)

1 thought on “कहानी: हाथ बाटना

  1. वर्तमान समय में समाज के लिए विशेष उपयोगी। हमे जन भावना और संवाद स्थापित किए बिना समाज नहीं बन सकता।रिश्तों को जीवित करना होगा, हाथ बटाना ही सहयोग बनेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *