कावापूत की बुद्धिमानी

कहानी होली

(कश्मीर पर आधारित यह कहानी डा० शिवन कृष्ण रैना की मूल रचना है) जिसे राष्ट्धर्म पत्रिका, लखनऊ में प्रकाशित है|)

ठेस लगे, बुद्धि बढ़े – अर्थ – हानि मनुष्य को बुद्धिमान बनाती है।

एक दिन एक कौवा और उसका पोता सडक के किनारे दाना चुग रहे थे|इतने में वंहा से एक मनुष्य गुजरा| मनुष्य को देख कौवा का पोता फुर से उड़ गया और पास के वृक्ष पर की ऊपर की शाखा पर बैठ गया| कौवा दाजी अपने स्थान से ज़रा भी नहीं हिला| मनुष्य के चले जाने पोता निचे आ गया और कहने लगा कि  – दादा, तुम मनुष्य को देखकर भागे क्यो नहीं ? दादा जी की मुद्रा गंभीर हो गए| अपने पोते पर कम अक्ली का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा – बड़े ना समझ हो| भइ, भागना तब चाहिए था जब हम यह देख लेते कि वह पत्थर उठाने को झुक अहा होता| 

अब पछताए होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गई खेत अर्थात समय निकल जाने के पश्चात् पछताना व्यर्थ होता है।

पोते के गले दादा की यह तर्क उत्तर ण सका, झट बोला- दादा अगर वह पहले से ही पत्थर हाथ में लिए होता तो? इस कथन ने दादा जी को निरुत्तर कर दिया| वे खीझ निपोरते हुए वंहा से चम्पत हो गे| 

जैसी जाकी बुद्धि है, तैसी कहै बनाय। … शब्दार्थ / अर्थ : जिसकी जैसी जितनी बुद्धि होती है, वह वैसा ही बन जाता है, या बना-बना कर वैसी ही बात करता है। उसकी बात का इसलिए बुरा नहीं मानना चाहिए।

उक्त् लघु कथा का आधार लेकर कश्मीर में एक कहावत प्रचलित हो गई है- “कव गाव पाँव काव्पूत गाव डोड पाँव” यानी कौवा एक पाँव के बराबर, मगर कौए का बच्चा डेढ़ पाँव के बराबर|

“जब कोई आयु, बुद्धि या पद में छोटा व्यक्ति अपने से बड़े व बुद्धिमान व्यक्ति को कोई अनावश्यक सीख देता है तो यह कहावत कही जाती है. अंडुवा बैल, जी का जवाल. स्वतंत्र और उच्छृंखल व्यक्ति के लिए (अंडुवा – बिना बधियाया हुआ बैल अर्थात सांड)”

यह कहानी हमें यह शिक्षा देती है कि हमें सिखने की प्रक्रिया कभी भी बंद नहीं करना चाहिए क्योकि हम जैसे जैसे बड़े होते है हम छोटे-छोटे बच्चो के जैसे कदम बढ़ाना बंद कर देते है| कोई भी नया कदम करने से पहले डरना शुरू कर देते है, और कही न कही हर नै चीज़ करने से पहले लगता है कि यह मुझसे नहीं होगा|

सफलता और असफलता में यही एक रोड़ा है, रुकावट है| अगर हम अपने जिंदगी में खुद में सुधार  पर ध्यान डे और थोड़ा सुधार में निरन्तरता रख्हे रहे तो कोई कारान नहीं कि सफलता आपके कदम न चूमे|

श्रीमति रीता सिंह चंद्रवंशी
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