कुछ अलग किया

काव्य होली

न नशा इश्क़ का किया
न नशा दिखावे का
नाम हो जिसका वैभव
क्या किया अगर कुछ अलग न किया

क्या हुआ जो भूल गए क्या खता की जो रूठ गए
हम तो गैरों की भी परवाह कर लेते हैं जनाब
क्या हुआ जो अपनों को ही बेपरवाह कर गए

हो गया हूं वाकिफ कौन क्या है इस जहां में
लोग चाहते बहुत है जताते नहीं इस जहां में
देखने में लगते है लोगों को मीठी जुबां
लेकिन करते असर है मिर्च तीखी जुबां

यूं तो मै शायर नहीं जनाब
कभी कभी दिल की बात जुबां पर आ ही जाती है
चाहते हैं बहुत कुछ बोलना और लिखना
पर क्या करें कमबख्त क्यूं है सबको बदलना

नहीं भरोसा जान का
क्या पता कब जिस्म से अलग हो जाए
हम आपके इंतजार में किसी और के हो जाए
किसी के दिल में किसी की यादों में किसी के ख्वाबों में

जिसने मुझे जाना नहीं
उसे हक है कुछ भी बोलने का
ना हमे गमी किसकी है कमी
जैसा हूं खुद ही खुद तक सीमित और खुश हूं

किसी ने हमसे पूछा कैसे हो
हम हैं हाजिर जवाब बोल दिया
जिन्दगी में गम है
गम में दर्द है
दर्द में मजा है
और मजे में हम हैं

न किसी के अभाव में जियो
न किसी के प्रभाव में जियो
जिंदगी खुद की है
उसे अपने अंदाज से जियो

लगेगा समय फर्श से अर्श का
बन गया खास विमर्श आपका
कहते हैं लोग यह नहीं चलेगा
चलते चलते यूं ही कहीं रुकेगा
अगर रुकना होता तो रुक जाते
कहीं न कहीं अटक जाते
अटकना भटकना न हमने सीखा
खुद के विचारों में अलग सलीखा
यूं तो देखा था सपना प्रदीप जी ने
उसे पूरा किया समाज के महानुभावों ने
विचारों में फिर से क्रांति आएगी
आपकी विमर्श नित नए अनुभव लाएगी
यूं ही चलता रहेगा रचनाओं का सिलसिला
विमर्श पढ़ते ही बच्चों,युवाओं और बुजुर्गों का चेहरा खिला

 

बहुत सीमित हूं अपने शब्दों में लेकिन बहुत विस्तृत हूं अपने अर्थों में
नाम है वैभव छोटा सा
काम करूं अनोखा सा
नही किसी का डर
हो चला मैं निडर
हूं मैं अजीब
मां से मिली तहजीब
ऐसी है मेरी हस्ती
पिता से मिली सख्ती
था मैं अंजान
गुरुओं से मिला ज्ञान

तन्हा दिल और तन्हाई हमको रास ना आई
जग जीवन की छोड़ भलाई
करते अब प्रभु की मनुआई
नहीं भरोसा इन प्राणों का
कब तक साथ निभाई
रम जा राम की मस्ती में हर दिल में छवि प्रभु की पाई
तन्हा दिल और तन्हाई हमको रास ना आई

वैभव सिंह हैहयवंशी
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