क्या खता हुई जो मुस्कुरा न सके

और कविताएं काव्य होली

क्या खता हुई जो मुस्कुरा न सके
क्या वजह थी जो गम को छिपा न सके
इस जवां दिल में जिंदादिली बनाए रख ऐ साथी
ये जहां है जहां आंखो ने आंसुओं को भी पनाह न दी

मोहब्बत है दीवानों सी
जिसे हम पा न सके
हुई खता जो हमसे
दोबारा चाह न सके
करना तो चाहते थे इश्क़ आपसे
पर क्या करें मां की ममता जैसा प्यार कर न सके आपसे

क्या हुआ जो चेहरे पर उदासी छा गई
जैसा कल बीता दिन
क्या फिर से वही हुआ
जरा फिर से सोचो क्या ग़लत हुआ
थोड़ा सा सुधार कर लो
अच्छा बाबा फिर से मुस्कुरा लो

जब हटने लगे दिमाग की
गलती से याद कर लेना
हम भी नाचीज़ हटे दिमाग की हटा देंगे

अब तो व्यस्त हो जाना जिंदगी का दस्तूर बन गया है
जिसे रूठना है उसे मना लेंगे
किसी न किसी तरह अपना बना लेंगे

वैभव सिंह हैहयवंशी
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