खून का असर

सरयूप्रसाद कोर्ट में स्टेनो -ग्राफर के पद पर कार्यरत थे दिखने में सुंदर ऊचे पूरे|उन्होंने अपने परिवार से बगावत करके अपनी एक रूपवती सहकर्मी से प्रेम-विवाह किया इसके लिए उन्होंनेअपने बुजुर्ग माता -पिता का कोइ ख्याल नहीं किया उन्हें असहाय छोडकर अपनी रूपवती अर्धांग्नी को लेकर सरकारी बंगले मै जुगाड़ कर रहने चले गये | वे अपने पिता की एक मात्र संतान थे|ऐसे में उनका फर्ज बनता था ,अपने माता -पिता की इच्छा कासम्मान करते उन्हें सहारा देते | वे अपने जन्म दाताओं के दर्द कोन समझ सके| उन्हें अपनी प्रेयसी के आंचल में अपना भविष्य नजर आया सरजूप्रसाद तो प्यार में अंधे थे | वे यह भी भूल गये उनके माता- पिता का क्या होगा जीवन के अंतिम दिनों में उन्हें कौन सहारा देगा बेटे के गम और समाज मे किसी के सामने सर उठा कर न रह पाने के गम में उनको गहरा आघात लगा इसी बीच पुत्र -रत्न की प्राप्ति सरजूप्रसाद को हुई माता पिता बड़े स्वा-भिमानी थे माता -पिता ने अपने बेटे-बहु के सामने कभी हाथ नही फैलाये | बेटा भी इतना एहसान फरामोस निकला उसने भी उनकी कभी खबर नहीं ली |

बुरा समय गुजारते हुए अंतिम सांसे ली | उसे उनका अंतिम संस्कार भी नसीब नहीं हुआ | समय का पहिया ऐसा चलता है उसकी गति को कोई नहीं समझ सकता समय की मार से अब तक कोइ नहीं बच सका सरजूप्रसाद का स्वास्थ अचानक खराब हो गया जब उसका बेटा 10 वर्ष का था तभी सरजूप्रसाद का देहांत हो गया।अपनी प्रेयसी को जीवन में संघर्ष करने अपने नाबालिग का भार उस पर छोड़ गया, शायद भगवान्ने मोहनी को अपने बेटे को असहाय मां -बाप से अलग करवाने की सजा दी हो | उनकी हाय लगी हो |

ईश्वर के यहाँ देर है अंधेर नहीं है | समय गुजरता गया ,सरजूप्रसाद का बेटा सुन्दर लाल पढ -लिख कर इंजीनियर बन गया| मोहनी को अपने बेटे सुन्दरलाल की पढाई लिखाई में अपनी जमा पूंजी खर्च कर दी इतना ही  नहीं अपनी छत्र-छाया मकान भी गिरवी रख दिया  हर कोई चाहता है उसकी संतानकाबिल बने अपनी जिम्मेवारी मोहनी ने बखूबी निभाई जल्दी ही बेटे सुन्दरलाल की एक अच्छी कम्पनी में नौकरी लग गयी | एक दिन बेटा माँ से बोला माँ तुमने मुझे पढ़ाने में कितने कष्ट झेले है अब सुख के दिन आ गये अब जीवन मे तुझे कोइ दुःख नहीं उठाना पड़ेगा|तेरा बेटा तेरे कदमों में जीवन की साडी खुशियाँ ला देगा तुझे कोई तकलीफ नहीं होने दूंगा मोहनी अपने भाग्य को सराहती |

अपने बेटे की तारीफ हर किसी से करती इसी बीच सुन्दरलाल  को अपनी  कम्पनी की एक सहकर्मी से प्यार हो गया,अपनी  माँ को एक दिन अवसर पाकर बताया माँ तुझे खाना पकाने में बड़ी तकलीफ होती है,जो मुझसे देखा नहीं जाता सोचता हूँ अब शादी करलूं मनपसंद लडकी के सम्बन्ध में माँ को बताया तो उसे ,अपना अतीत याद आ गया | वह सोच मे पड़ गयी | माँ को कुछ भी बोलता न  देख सुन्दरलाल  बोला क्या बात है माँ, क्या बात है  ?  किस सोच में हो ? नहीं कोइ बात नहीं है माँ  अपनी होंने वाली जीवन  संगनी से कब मिलवा रहे हो बेटे  सुन्दरलाल बोला माँ आपकी हां की जरूरत थी वह माँ के गले से लिपट गया गया | मोहनी की आँखें आंसुओं से डबडबा गई और चाहकर भी विरोध न क़र सकी |

माँ इतवार को में लेकर आता हूँ सुन्दरलाल ने अपनी प्रेमिका को अपनी माँ से मिलवाया साथ में उसके माता-पिता भी थे खुशी-ख़ुशी उनका रिश्ता मंजूर कर लिया और कुछ समय बाद उनकी शादी संपन्न करवा दी समय बीतता गया | मोहनी सुंदर और सुशील बहु पाकर बहुत खुश थी अपने बेटे -बहू के साथ खुश थी सबसे उनकी तारीफ करते थकती नहीं थी | भविष्मैं आने वाले तूफ़ान से अनजान,बे-खबर समय अपना रंग कब बदलता  है पता  ही नहीं चलता !एकदिन खाना खाते -खाते सुन्दरलाल अपनी माँ से कहता है ,माँ एक बड़ी खुश-खबरी है |मेरी प्यारी माँ मेरी कम्पनी मुझे अमेरिका भेज रही है | विभाग प्रमुख बनाकर एक  दो दिन में बीजा मिल जायेगा |पहले  मई अकेला जाऊंगा बाद में तेरी बहु  का ट्रांसफर वहीं करवाकर परिवार सहित वही रहेंगे | मोहनी बोली ये तो बड़ी ख़ुशी की बात है वह सोचकर प्रसन्न थी की उसे भी अमेरिका जाने, विदेश घूमने का मौका मिले| भगवान परिवार पर मेहरबान लगते हैं जो तुझे इतना बड़ा अवसर मिल|कुछ दिनों बाद सुंदरलाल अमेरिका चला गया |दिन -रात अपनी गति से से चलते रहे | एक दिन सुंदर लाल का फोन आया वह खुश होकर बोला माँ आपकी बहु के ट्रांसफर का आवेदन मंजूर कर लिया है माँ बोली ये तो बड़ी ख़ुशी की बात है | परिवार साथ-साथ रहेगा | यह  बहु  बेचारी पति के बिना उदास रहती है माँ मैंने उसे भी यह खुश-खबरी दे दी है और तेयारी करने का बोल दिया हूँ शीघ्र आकर ले जाउंगा | मोहनी बोली ठीक है बेटा जल्दी आना हम लोग तेरा सबरीसे इंतज़ार करेंगे तू उडकर जल्दी आ जा |

मोहनी  भी अमेरिका जाने की तयारी करने लगी पर  नियति  को  कुछ ही  मब्जूर था , जिससे वह अनजान थी कुछ दिनों के बाद सुन्दरलाल अमेरिका  से घर आया खाना खाते- खाते वह माँ से बोला माँ हमे कल ही  बापस जाना है। तू फ़िक्र मत करना हम वहाँ अच्छे से सेटल होकर, उपुयुक्त भवन खोजकर तुझे भी वहाँ बुलवा लूगा | अभी एक बेडरूम और किचनवाला मिला है सबके लायक खोज रहा हूँ मोहनी  बोली पर बेटे  तूने यह पहले नहीं बताया |सुंदरलाल बोला माँ  मैंने  बताया तो था ,शायद  ख़ुशी के मारे तू ठीक से सुन नहीं पाई होगी | माँ तू फ़िक्र क्यों करती हैतुझे भी शीघ्र उड़कर ले जाऊंगा| मेरीअच्छी माँ ,प्यारी माँ | में समय पर पैसे भेजता रहूँगा घर खर्च और साहूकार का कर्ज पटाने ताकि तू जल्दी कर्ज मुक्त हो सके छत बनी रहे | सुंदर लाल की पत्नी माँ बेटे का प्यार देखकर मंद-मंद मुस्करा रही थी वह खुश थी।  उसे अब  स्वतंत्रता  पूर्वक जीने का अवसर मिलेगा | बेटे की बात सुनकर मोहनी  का मोह भंग हो गया | उसके सरे  ख्वाब चकनाचूर  हो गये | काटो तो खून नहीं | वह सोचने लगी मेरे बेटे क्या  इसी दिन के लिए मैंने तुझे इस काबिल बनाया था एक दिन तू मुझे अकेला छोडकर कहीं और मौज मस्ती से दिन गुजार |

मेरे बेटे पैसा ही सब कुछ नहीं होता | माँ कीआँखों मैंआंसू देखकर सुन्दरलाल बोला माँ क्या ? तुझे अपने बेटे पर भरोसा नहीं है। व्यवस्था होने पर तुझे भी बुलवा लूँगा | मोहनी  मन मार क्र बोली ठीक है बेटा, तेरी  जैंसी मर्जी | तू जैसा उचित समझे उसे अपना गुज़रा हुआ अतीत चल-चित्र की तरहसामने आनेलगा उसे उसका भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा इतिहाश दुहराएजाने की कगार पर था इसका मोहनी को य -हसास होने लगा था | बेटा सुन्दरलाल अपनी पत्नी को लेकर अमेरिका चला गया, माँ को भगवनभरोसे छोडकर | नियति भी अनोखे खेल खेलती है सुन्दरलाल नियमित पैसे भेजतारहा घर का खर्च ठीक से चलता रहा साहूकार का कर्ज भी पटता रहा | सुन्दरलाल ने माँ को पुत्र रत्नप्राप्ति की सूचना दी सुनकर बोली बेटा मेरा मन पोते को देखने मचल रहा है ,जल्दी आ मुझे ले जा | सुन्दरलाल बोला हाँ -हाँ माँ तुझे लेने जल्दी आता हूँ आने की खबर करता हूँ | मोहनी अपने बेटे के आने का इंतज़ार करती रही ,पर बेटे का आना तो दूर ,उसने पैसे भी भेजना बंद कर दिया न ही कभी फोन ही किया | फोन  करने पर हमेशा नो रिप्लाई का सन्देश सुनाई देता  घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था | उपर से साहूकार घर से बेदखल करने की रोज धमकियाँ दे रहा था उसकी सुनने वाला कोइ नहीं था | वही हुआ जिसका उसेडर था साहूकार ने गुंडे भेजकर उसे घर से बहर निकालकर कब्जा कर  लिया वह कुछ नहीं कर सकी | मजबूरी में उसे विर्धाश्रम   मैं शरण लेनी पडी यहाँ उसकी आत्मा चिल्ला-चिल्ला करकहती अपने किये की सजा सजा यहीं पर मिलती है| पाप का घड़ा फूटने में देर नहीं लगती “खून का असर ” कहीं नहीं जाता | वह अपना रंग दिखाता ही है “सोचो जो तुमनेअपने सास -ससुर के साथ क्या ? अच्छा किया था | जो सूरज लाल ने अपने माँ बाप  के साथ किया अब वही सुन्दरलाल तुम्हारे साथ कर रहा है, क्योंकि वजह तुम्हीं थीं | इश्वर के यहाँ देर है पर अंधेर नहीं है वह सोचती काश मैं पाप का भागिदार न बनी होती तो ये दिन देखने न मिला होता बेटे पोते की याद लिये ,मन पर भारी बोझ लिए मोहनी इस दुनिया को———अलबिदा कह गयी !

 

संपादकीय नोट: पाठक यह भी सोचें क्या यह मोहिनी का दोष था? या स्त्री होने पर उसे ही जिम्मेदार ठहराया जाता है? क्या पुरुष पत्र ने अपनी जिम्मेदारी निभाई क्या दोषी नहीं है ?

रमाकांत बडारया
Latest posts by रमाकांत बडारया (see all)