जागो पृथ्वीराजो जागो

by | काव्य, रंग बसंत | 0 comments

जयचंदों ने अपने सिर फिर उठाना शुरू किया है
प्रथ्वीराजो जागो देश फिर तुम्हे पुकार रहा है
अपनों और परायों की
जिनको कोई पहचान नहीं है
अंबर आग उगलता है
शायद उनको इसकी खबर नहीं है

जहर को अमृत कहकर अब फिर बाँट रहे हैं लोग
आज हमारा दिल है घायल कैसे रिश्ते घाव भरेंगे
हमने किया है खून पसीना
हमने चलाया है हल खेतों मैं
हमने बोये हैं श्रम के दाने
लेकिन काफिर काट रहे हैं फसलें

छलनी किया हमारा दिल स्वार्थ मैं अंधे लोगों ने
किस्मत अपनी दगा दे गई बुरे फसे हम दल-दल मैं
सन्नाटे ने कैद कर लिया
पल भर की हलचल देकर
घेर रहे हैं हमको अंधियारे
बोलो हमको अब कौन उबरे

इतिहासों ने जिनकी की गाथाओ ने रंग डेल हैं पन्ने
कहते उसको जोश जवानी जोश जवानी मारेगी कब
काँटों पर चलने वाले तुम
तूफानों पर चलने वाले तुम
इतना भारी संकट छाया हम पर
जाने कहाँ छुपे हुई हो तुम

निर्भय होकर बढ़ो जवानो बात भीरूता की त्यागो अब
साबित करके फिर दिखला दो जवानी वक़्त बदलती है
उठा रहे विध्वंशक अपना सिर
देख तुम्हारा शै-थिल पौरुस
बिखर गई है जो भी शक्ति
उस शक्ति को फिर से एक करो

तुम ही गीता तुम ही रामायण तुम ही तुलसी तुम ही सूर
चाहो यदि जवानो तुम तो पल मैं कर दो सरे संकट दूर
जहाँ बढ़ेंगे कदम तुम्हारे
आंधी वहां चलेगी
डॉल उठेंगी देशों दिशाएं
अंबर डॉल उठेगा

उठो जवानो तुम फिर से जागो अब करो न कुछ भी देरी
देर अगर कर दी तुमने कुछ तो हाँथ लगेगी रख की ढेरी
कदम -कदम पर मौत मिलेगी
“बेताब “मत घबराना साथी रे
बाहरी दुश्मन कितना भी शक्तिशाली
है मुश्किल नहीं हराना
भीतरी दुश्मन कितना भी मामूली
पड़ता सब पर बहुत ही भारी

जयचंदों ने अपने सिर फिर से उठाना शुरू किया है
जागो पृथ्वीराजो जागो देश तुम्हे फिर पुकार रहा है

रमाकांत बडारया
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