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जात न पूछो साधु की

किसी भी तालाब के पानी को गंदा होने में ज्यादा वक्त नही लगता, जबकि नदी का पानी अपनी रवानगी, अपने बहाव के कारण शुद्ध होता रहता है ।

हमारा मस्तिष्क भी पोखर हो सकता है, तालाब हो सकता है, नदी हो सकता है और समुद्र भी हो सकता है । समुद्र उससे मिलने वाली सैकड़ों हजारों नदियों के अलग अलग तरह के पानी को स्वीकार कर लेता है और अपना बना लेता है, और इसीलिए कभी सूखता नही, वैसे ही हमारा जीवन है, अगर हम अपने ज्ञान के स्रोतों को बढ़ाएंगे नहीं और विभिन्न धाराओं से मिलने वाले ज्ञान को स्वीकार नही करेंगे तो हमारे जीवन मे लघुता बनी रहेगी और हम सांस्कृतिक, बौद्धिक और व्यक्तिगत समृद्धि के मामलों में अपने समकक्षों से पिछड़ते जाएंगे ।

प्रदीप वर्मा

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प्रदीप वर्मा (हैहयवंशीय)

मास्टर इन कम्प्युटर एप्लिकेशन (MCA), मास्टर इन हिन्दी लिट्रेचर (MA, साहित्य), पी॰एस॰एम॰ (scrum॰org, यूएस), बेचलर ऑफ लॉं (LLB ऑनर), बेचलर ऑफ कॉमर्स, एम.एस.पी.सी.ए.डी.

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