फिर वसंत ने भेज दिया
एंक खत
मौलश्री के नाम !

सिलसिला फिर शुरु होगा
मनुहार का
नेह-निष्ठ भावों के
बढ़ते ज्वार का
राग-अनुराग

आस्था की हरियाली
में हैं फूटते
रिश्ते प्रेम के बनते
अचानक टूटते
पागल हवाएँ भेजतीं
मेघों को
कोई संदेश अनाम!

दहक उठे टेसुई यादों के
पलाश वन
युग बीते, नैन रीते
छूटा अपनापन
धूप-छाँही विरह-वेला
टूटता विश्वास
फिर सपनों का सूनापन
समझे न बावरी आस
अपनी मर्म-व्यथा
समझेगा कौन यहाँ
प्रीत हुई व्यर्थ बदनाम!

गिरिराज सुधा
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