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दानशीलता की अच्छाई और बुराई

दानशीलता का विषय अच्छाई/बुराई के बीच शुरु से झुल रहा है  फिर भी कोई भी सामाजिक अथवा धार्मिक  और सार्वजनिक कार्य बिना चंदे के नही चलते हैं | समाज से दान प्राप्त होता है  तभी आज तक बदस्तुर चल रहे हैं |

अधिकतम, देने वाला एक परंपरा मान निर्वाह करता है तथा “इसका क्या होगा” पर अधिक विचार नही करता है — इसी आड़ मे अच्छाई के साथ बुराई भी पनपती है जो एक लिमिट तक क्षम्य तथा शुन्य समझ लिया जाता है — परंतु सामाजिक स्थिति थोड़ी भिन्न हो जाती है – यहां “ना तो निगलो जाए नाही उगली जाए” -कारण रिश्ते बने रहते हैं |

बृजमोहन जी चंद्रवंशी, भोपाल 

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

प्रदीप वर्मा (हैहयवंशीय)

मास्टर इन कम्प्युटर एप्लिकेशन (MCA), मास्टर इन हिन्दी लिट्रेचर (MA, साहित्य), पी॰एस॰एम॰ (scrum॰org, यूएस), बेचलर ऑफ लॉं (LLB ऑनर), बेचलर ऑफ कॉमर्स, एम.एस.पी.सी.ए.डी.

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