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दुःख और सुख मिल-बाँटकर हलके करें

हम सभी में एक ही आत्मा समाई हुई है। एक धागे में पिरोए हुए मनकों की माला की तरह हम सब परस्पर जुड़े और गूँथे हुए हैं। सुख को अकेले हजम करने वाला अंतरात्मा की धिक्कार का, परमात्मा के कोप का और विश्वात्मा के प्रतिशोध का भाजन बनता है। निष्ठुरता, कृपणता और संकीर्ण-स्वार्थपरता से युक्त ऐसे व्यक्ति को ईश्वर के कानून पतित ही घोषित करते रहेंगे। मिल-बाँटकर खाने की नीति जिसे सुहाती नहीं, उदारता के लिए जिसकी भावना उमगती नहीं, उसे नर-पशु से अधिक और कुछ नहीं क़हा जा सकता। ऐसे लोग आनंद से सर्वथा वंचित रहते हैं, जो मानव जीवन का उद्देश्य समझने वाले और उदार आचरण करने वालों को सहज ही मिलता रहता है।

कपास बेचकर पैसा जमा कर लेने में बुराई कुछ नहीं, वरन् सुविधा ही रहती है। सुख को बेचकर बदले में लोक-सम्मान और आत्म-संतोष खरीद लेना “दूरदर्शिता” का चिन्ह है। “आत्म-संतोष” से अनेकों ऐसे सद्गुणों का विकास होता है जो व्यक्तित्व में प्रखर प्रतिभा उत्पन्न करते हैं। “लोक-सम्मान” पाकर मनुष्य जितना गौरवान्वित होता है उतना लालची के लिए कल्पना कर सकना भी संभव नहीं। सुख को बाँटकर खाना घाटे का काम दीखते हुए भी वस्तुतः अतिशय लाभदायक ही सिद्ध होता है।

📖अखण्डज्योतिफरवरी१९७५पृष्ठ१२

 

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

गौरव सिंह हैहयवंशी

(लो.पायलट सेंट्रेल रेल) महाराजगज रायबरेली ।

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