नववर्ष: मैं सनातन समय हूँ

काव्य चुनौतियाँ और अवसर

मैं समय योग हूँ, काल पुत्र हूँ,
तिथियों के बंधन से मुक्त हूँ।

दिन, वर्ष, महीनों में बँटा नहीं,
मैं नदियों की धार विरक्त हूँ।

मैं सहस्त्रार से सुषुम्णा तक दिव्य,
आलोक से ऊर्जस्वित संकल्प हूँ।

मैं अन्तरंग-बहिरंग के मध्य स्थित,
एक ओज, एक गति, एक प्राणचक्र हूँ।

मैं हूँ शाश्वत समय, विश्वनियन्ता,
नूतन प्रति पल, विशुद्ध अग्नियुक्त हूँ।

मैं हूँ ब्रह्मऊर्जा का आविर्भाव,
उध्र्वस्फुरण, प्राण से संयुक्त हूँ।

स्व योग प्रज्ञा से अभिभूत हो,
मैं देहातीत प्रतीति अद्भुत् हूँ।

मैं श्वाँस-श्वाँस में व्याप्त अदृश्य
धड़कनों से बँधा अन्तःकरण हूँ।

मैं सनातन समय हूँ इस लोक में,
मैं सूर्य-सा गतिशील जाग्रत हूँ।

गिरिराज सुधा
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