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नाचा: नारी पात्रों की भूमिका

नाचा को पहले जमाने में पेखन कहा जाता था। पेखन का अर्थ है – प्रेक्षण । छत्तीसगढ़ में नाचा-गम्मत कहलाता है। ‘मालवा’ में नाचा, राजस्थान का ख्याल, महाराष्ट्र का यह है तमाशा। नाचा का संपूर्ण विकास गम्मत में  ही  देखने  को  मिलता  है।  डॉ.  मुकुटधर  पांडेय  इसे  मनोरंजन  कहते  हैं।  प्यारे  लाल  गुप्त  ने  इसे  विशुद्ध  लोक नाट्य की संज्ञा दी है। रामचंद्र देशमुख ने तो नाचा और गम्मत में जीवन दर्शन देखा है।

गम्मत का शाब्दिक अर्थ

वैसे गम्मत का शाब्दिक अर्थ है विनोद या हँसी दिल्लगी। गम्मत के दो भाग होते  हैं।  पहला – रास  और दूसरा  प्रहसन।  रास  में  सुत्रधार  भक्ति और प्रणय गीत गाते हैं। बाद में वे अपने विशय पर आ जाते हैं – तीज-त्यौहार, कृषि, श्रम, साक्षरता के नृत्यगीत प्रस्तुत किये   जाते   हैं।   प्रचलित   प्रहसनों   में   लोक   संस्कृति, आचार-व्यवहार, रहन-सहन, सभ्यता की छाप दिखाई देती है। नाचा रात भर चलता है, कोई उकताहट नहीं होती। 4-5 प्रहसनों में नाचा पूरा होता है। लोग हिलते-डुलते भी नहीं, रात भर मजा लेते हैं। नाचा का उद्देश्य मनोरंजन के साथ अपरोक्ष रूप से उपदेश भी निहित होता है।

इतिहास से पुष्टि होती है कि मराठा छावनियों से नाचा का उद्भव हुआ। मराठों के समय जो नाट्य सेना विकसित  हुई  थी  इसके  गम्मत  में  स्त्री  –  पात्र  की  भूमिका  पुरुष  ही  निभाते  थे।  दिन  में  लड़ाई  और  रात  में मनोरंजन। इसी आधार पर छत्तीसगढ़ में जो लोकनाट्य परंपरा विकसित हुई, उसे ‘नाचा’ कहा गया। नाचा  पर  बहुत  कुछ  लिखा  जा  चुका  है।  जहां  तक  मंदराजी  और  रामचंद्र  देशमुख  के  समय  विशेश समारोहों  में  नाचा  का  आयोजन  ही  होता  था।  उनकी  लोककला  का  अनुकरण  छत्तीसगढ़  के  अन्य  हिस्सों  के कलाकारों ने किया । पुरुष प्रधान समाज में नाचा के स्त्री-पात्रों की भूमिका पर समीक्षा नहीं हो पाई । जनाना पात्र जब मंच पर नृत्य करते हुये आते हैं और यही नाचा का प्राण फूंकते हैं। चैपाल हरिभूमि के साथ इसी विशय पर चर्चा हुई। क्यों न एक आलेख इन्हीं पात्रों पर प्रकाशित किया जावे। नाचा के वयोवृद्ध, बुजुर्ग कलाकार अभी भी छत्तीसगढ़ में जीवित है और अपनी कला का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।

एक  आकलन  के  अनुसार  सबसे  ज्यादा  कलाकार  दुर्ग  जिले  में  हैं।  नाचा कलाकारों से मिलने पर वे बताते हैं कि नाचा कला यह तीसरी पीढ़ी है।

नाचा  का  उल्लेखनीय  पहलू 

नाचा  का  उल्लेखनीय  पहलू  यह  है  कि  बिना  प्रषिक्षण  के  सारे कलाकार  गायन,  वादन,  लोकनृत्य,  अभिनय,  प्रहसन  व  रूपसज्जा  से लेकर  सब  कार्य  करने  में  सिद्धहस्त  होते  हैं।  मयारू  मोर  नाचा  पार्टी  के संचालक (लाटाबोड़) डोमार सिंह कुंवर 71 वर्षीय का कथन है कि नाचा जैसा आडंबरहीन मंच ढूंढना मुश्किल है। मैं स्वयं भी कभी जोक्कड़ की भूमिका निभाता, कभी जरूरत पड़ने पर परी का पाठ करता हूं। कुंवर ने बताया, वे हमेशा नाचा में व्यस्त रहते हैं। उनकी पार्टी में जनाना पात्र बहुत सारे मौजूद है। पूरा जीवन नाचा में गुजर गया है। राम ठाकुर, नरेश साहू, जितेन्द्र व जयकिशन ये पुरुष पात्र जनाना रोल शानदार ढंग से निभाते हैं। अभी 80 वर्षीय  बहुर  सिंह  साहू  (स्त्रीपार्ट)  बुजुर्ग  होने  के  बावजूद  जोरदार  भूमिका  निभा  रहे  हैं।

इसी  पार्टी  में  रत्तीराम  भी शामिल थे, उनका निधन हो गया। सचमुच ऐसे प्रतिभावान कलाकार को भूल पाना कठिन होता है। गुरूर क्षेत्र बाबूलाल पटेल  आमदी 72 वर्षीय नाचा का उल्लेख करते हुए कहते हैं, कि जब  नाचा से हम मन हा जुड़ेन, तब साधन नई राहाय। साईकिल चलाके दूरिहा दूरिहा गांव जावन। रात में नाचा करन, दूसर दिन फेर किसानी काम करन। सचमुच ये कला को कला की दृश्टि से देखते थे।

नाचा  पार्टीयाँ

इतवारी–  मुकुंद  नाचा  पार्टी  पूरे  क्षेत्र में प्रसिद्ध थी। बाबूलाल को अचरज हुआ कि इतने बरसों बाद कोई खबर लेने आया है। आजकल वे रामायण पार्टी में ढोलक-तबला बजाते हैं। पहली पार्टी तो नंदागे। वीही मा पुनीत पटेल 70 वर्षीय देवधर, दाऊलाल नारी पात्र के भूमिका करैं। परसुली ले जवाहर सिंह राजपूत अऊ ब्रजलाल हा संगे संग जावय। सब कोई शिकस्त होगे। कई झन सरग चले देईन। गुरूर क्षेत्र के एक बुजुर्ग नाचा कलाकार बेनूराम सेन 73 वर्षीय छत्तीसगढ़ में कौन  नहीं  जानता।  नाचा,  सांस्कृतिक  कार्यक्रम,  साक्षरता,  मया  के  मितान  व  कवि सम्मेलन के ये कलाकार कहते हैं कि वो जमाना लद गया, जब वे भी कभी परी बनते थे।

“सचमुच  सभी  जान  ते  है  कि  बेनूराम  कभी  मूंछे  नहीं  रखते  थे।  उनकी  ज्यादा भूमिका जोक्कड़ की होती थी। अब इस उम्र में कोई शोक नहीं रहा। देह शिथिल पड़ गई है। आंखों का ऑपरेशन हुआ है। कहते हैं कि सरकार से कई बार गुहार की, पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। अपनी याद ताजा करते हुए वे कहते हैं कि सबे गांव मा नाचा पार्टी रहिस। कर्ता-धर्ता मन हा चल देईन। कोई-कोई गांव मा अभी भी घलोक कलाकार जी जीयत हवै।“

भोथली  के  सुखनंदन,  सुखदास,  कलीराम  साहू  ये  लोग  उम्र  का  हिसाब  नहीं  रखते।  सीधे  जनाना  पात्र बनने में हिचकिचाहट नहीं करते। नाचा की बात निकली, तब बगदई नाचा पार्टी का नाम भी सामने आया। तुलसी राम सार्वा ने ही यह पार्टी बनाई।  बरही-सांकरा नाचा पार्टी ने भी 70 के दशक में खूब धूम मचाई थी।  कार्तिक राम सिन्हा (जोक्कड़) के निधन के बाद यह पार्टी शिथिल हो गई। क्षेत्रीय पार्टियों में कुलिया-कनेरी का नाम भी यू-ट्यूब पर काफी उछला है। इसमें नाचा में सतीश यादव स्त्री पार्ट की भूमिका सराहनीय बन पड़ी  है। खैरवाही नाच पार्टी में जनाना पात्र घनश्याम साहू परी व संवाद सम्प्रेषण के लिये मशहूर है।

ठेकवाडीह के मनसा राम साहू ने वो जमाना देखा है, जब मशालों के बीच में लोक झांकियां प्रस्तुत होती थी। मोहरी, दफड़ा, खंजेरी, मांदर, चिकारा जैसे पारंपरिक वाद्य होते थे। दर्शक मंत्रगुग्ध   हो जाते थे। टेवना पथरा में दागड़ी ला घिस के मेकअप  करंय।  नाचा  का  श्री  गणेश  परी  के  आगमन  से  षुरू  होता था।  गांव  में  तुलसीराम  और  उदेलाल  जनाना  पात्र  की  भूमिका निभाते थे। उनकी कला जीवंत है कलाकार तो चले गये। बहुत दुख होता है कि कला को जीवंत करने वाले सदा के लिये हमसे दूर हो जाते  हैं।  इन्हीं  में  है  –  बऊआ  राम  धनेली  और  जागेष्वर  साहू जोरातराई।

थिरकन    और  लयबद्धता 

नाचा  की  समूची  प्रस्तुति  एक  थिरकन    और  लयबद्धता  के  आरोह-अवरोह  सें  बंधी  होती  है।  नाचा कलाकारों  मुद्राओं  में  हलचल  और  भावाभिव्यक्तियों  में अभिनय,  नृत्य  व  अदाकारी देखने  और  महसूस करने  की चीज है। नृत्य, गीत और संवाद कब खतम होकर गम्मत में परिवर्तित हो जाता है, इसका पता ही लगता।  नाचा धुन की प्रस्तुति से लोग झूम उठते हैं। नचकरहीन और लोटा लिये नजरियें की भूमिका पुरुष की अदायें देखते ही बनती  है।  हावभाव,  चाल-ढाल  और  भावभंगिमायें  इतनी  अधिक  होती  हैं  कि  क्या  कहना।  स्त्री  सुलभ  कोमलता और मोहकता ऐसी होती है कि शिनाख्त करना मुश्किल हो जाता है कि ये पुरुष है या नारी।

गांव तिलजा  (सारागांव)  के  अखिलेश  वर्मा  माटी  के  मितान नाचा पार्टी के  संयोजक  हैं। वे  बताते  हैं कि बचपन से नाचा का षौक था। कक्षा चैथी में थे, तब नाचा मंच पर पहली बार ‘परी’ बनकर आये थे। उसके बाद तो  सिलसिला  ही  चल  पड़ा।  अब  वे  हास्य  कलाकार  की  भूमिका  निभाते  है।  उनके  जोड़ीदार  है  भरत  सोनवानी। वर्मा जी ने नया प्रयोग षुरू किया है। उनके मंच पर नायिका या परी लोटा लेकर नहीं आती, बल्कि बैलगाड़ी का चक्का सिर पर लेकर, उस पर 8 या 10 दिये जलाकर प्रवेश करती है। नायिका का ऐसे प्रवेश करना बड़ा मनोरंजक और कौतूहल का केन्द्र होता है। फिर विषेश राग का अलाप देते हुए यह नृत्य में संलग्न हो जाती है –

अई हो ….. बाटे ला छेके वो गजामूंग बांटे ला छेके
कइसे जावौ भरेला पानी ।।

साजिदें वाद्य वृन्द में मस्त हो जाते हैं। फिर नचैड़ी धुन शुरू हो जाती है। वर्मा जी बताते हैं कि हमारे यहां पुरुषों के रूप में नारी पात्र बहुत सारे हैं। सभी कला को समर्पित  है  –  जैसे  राधेश्याम  यादव,  विनोद  वर्मा,  रतन  वर्मा,  रितेश  सिन्हा।  नाचा  में ऐसे कलाकार भी हैं जिन्होंने पूरा जीवन दे दिया, इन्हीं में है – नारी पात्र नरोत्तम सिंह वर्मा 79 वर्शीय अभी भी सक्रिय है।

नाचा  की  त्रासदी,  कष्ट  और  समर्पण  नारी  पात्रों  को  ही  मालूम  है

एक  जीवंत  नारी  बनना,  भूमिका निवर्हन करना कितना जोखिमपूर्ण है। कभी केशविन्यास गड़बड़ हो जाता है, तो कभी अंगवस्त्र। मंच में आने के बाद  फजीहत  न  हो,  इसका  ख्याल  रखना  पड़ता  है।  दयाषंकर  साहू  नर्रा  (बागबाहरा)  की  दृश्टि  में  गांव  में  नाचा देखने के बाद अभिनय व नारी पात्र की इच्छा जागी। वरिष्ठ लोगों का आशीर्वाद रहा। परदेशी यादव व तानूराम चक्रधारी  के  सान्निध्य  में  नाचा  के  गुर  रहस्यों  की  जानकारी  मिली।  बस  यही  मेरी  नाचा  की  जिंदगी  है।  अभी नायिका (परी) के रूप में भूमिका अदा कर रहा हूं। लिटिया  (सेमरिया)  के  73  वर्शीय  जालीदास  माणिकपुरी  संत  समाज  नाचा  पार्टी  से  जुडे़  हैं।  वे  बताते  हैं कि गत 25 वर्शों से जनाना का जीवंत अभिनय कर रहे हैं। इन्हें भुलवा राम जनाना सम्मान प्राप्त हुआ है। सचमुच ऐसे  कलाकारों  को  पुरस्कृत  किया  जाना  चाहिये।  इन्हीं  में  शामिल  है,  धौरी  (सोमनी)  जय  जय  राम  साहू  80 वर्शीय। पिता की प्रेरणा से नाचा से जुड़े हैं। 60 वर्श हो गये हैं नाचते नाचते।

नाचा  का  आकर्षण  है  प्रमुख  प्रहसन

हंसी  हंसी  में  दुख  भरे  जीवन  में  मुस्कुराहट  पैदा  करना।  परी  और जोक्कड़ मिलकर संवाद-संवाद में इस विशय का प्रस्तुतीकरण करते हैं। जय भवानी नाचा पार्टी के आजूराम साहू बताते है कि कलाकारों के सम्प्रेषण का अभिनय देखकर ही मैं नाचा पार्टी में शामिल हुआ। अभिनय व लोकनृत्य में पारंगत हो गया। जनाना पात्र बनने लगा। बकतरा (केन्द्री) भगत सिंह धु्रव भी यही कहते हैं- “शुरुआत में नारी रोल करने लगा। भेंडरा (गुंडरदेही) के संतोश साहू चोर चरणदास नाचा पार्टी से जुड़े हैं। अपनी व्यथा बताते हुये वे कहते है कि जनाना पात्र बनना कितना कठिन होता है। लोग हंसी भी उड़ाते हैं। सबको बर्दाश्त करना होता है। प्रारंभिक दिनों में मुझे विषम परिस्थितियों से जूझना पड़ा। 40 वर्षों से जनाना पात्र बन रहा हूं। अब अभ्यस्त हो गया हूं।“

सन्  70  के  दशक  में  छत्तीसगढ़  की  सांस्कृतिक  धरती  पर  नाचा  के  समानांतर  कुछ  अनूठे  प्रयोग  हुये। दाऊ  रामचंद्र  देशमुख  और  महासिंह  चंद्रकार  जैसे  साधकों  ने  क्रमश:  चन्दैनी  गोंदा  और  सोनहा  बिहान  जैसे युगांतरकारी छत्तीसगढ़ी मंचीय प्रस्तुतियों प्रदान की । हबीब तनवीर का एक अलग किस्म का लोकमंचीय प्रयोग चलता  रहा।  लोककला  मर्मज्ञ  दाऊ  रामचंद्र  देशमुख  ने  रिंगनी  और  रवेली  दोनों  पार्टियों  को  एक  मंच  पर  लाकर खड़ा कर दिया। इसका प्रभाव गांवों की नाचा पार्टियों पर भी पड़ा। लिटिया के शिवप्रसाद बर्मन ने बताया कि पिताजी की प्रेरणा से मैं नाचा कलाकार बना। जोकर बनता था, फिर नायिका (जनाना पात्र) भी बना। तिलखैरी के  तोरण  लाल  साहू  का  मानना  है  कि  पिताजी  ने  नाचा  की  शुरूवात  की  थी।  तभी  तो  रोशन  मानसिंह  नाचा पार्टी,  मोहंदीपाठ  में  कई  बरसों तक  ‘परी’  (जनाना  पात्र)  का  पाठ  करता  रहा  हूं।  मैंने  बाद  में  अन्य  पात्रों  की  भी भूमिकायें की है।

नाचा के धरोहर गांव

छुरिया  तहसील  का  गांव  दुर्रे  बंजारी  कलाकारों  के  नाम  से प्रसिद्ध  है।  पहले  यहां  राम  सप्ताह  और  रामलीला  का  आयोजन  होता रहा । सन् 1997-98 में यहां के कुछ कला साधकगणों ने नाचा पार्टी बनाई। उनमें है – व्यास नारायण सिन्हा, देशवर कोर्राम, उत्तम साहू, चम्मर सिंह यादव। नाचा का प्रारंभ इन्हीं कलाकारों ने किया। ग्रामीण बताते हैं पहले पहल साईकिल से यात्रा करके दूसर गांव जावय।

बलदेव यादव कहिथे कि – “जेन नई समझे तेखर बर नाचा ह खेल तमासा ऐ अऊ जेन भी समझे तेखर बर नाचा हा सोजहा तमाचा ऐ। गांव म जुड़े नाचा के प्रारंभिक दिन ल सुरता करके हरि प्रसाद सिन्हा हा कथे – पहिली के बेरा म नाचा पार्टी म जिनिस के अभाव होवय त परी डांस करे बर पड़ोस के बहिनी मन ले कपड़ा मांग के  प्रस्तुति  देवय।  अपन कला  जीवन के  बीते  बेरा  ल  सुरता  करके  रोमलाल साहू  ह  कथे  कि कोनों  भी  नाचा म जनाना,  नजरिया  ह  नाचा  गम्मत  के  कौमिक  के  परमुख  पात्र  होथे,  जेन  समे  गांव  के  माटी  म  नाचा  के  सिरजन होइस  तब ले  पार्टी  म जनाना  के  किरदार ल मंच म जियत रेहेव अऊ कला साधना करत अपन पूरा जिनगी ल लगा देवंय।“

छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में अभी भी पुरानी नाचा पार्टियां विद्यमान है। सियान होने के बावजूद भी अपनी कला को जीवन बनाये रखे हुए हैं। क्षेत्र में ऐसे ही ये पार्टियां है-जय संतोषी नाचा पार्टी गुरूर, धरती के सिंगार मोखा, तुलसी चैरा उतई, सत्य कबीर नाचा पार्टी मोहदीपाट, माटी के मितान नाचा पार्टी मांठकेसला, भुईया के सिंगार होयेटोला, राधाकिसन नाचा पार्टी साल्हेटोला। नाचा के माध्यम से सभी कलाकार जन-जागरण कर रहे हैं।  नाचा एक अभियान है। नाचा एक उत्कृश्ट संगठन है। यह अंधेरे से उजाले तक ले जाने का एक संग्राम है।

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