निष्काम कर्मयोगी: श्री हरीनारायण जी ताम्रकार

by | रंग बसंत, व्यक्ति विशेष | 0 comments

26 जनवरी 2021 (15 वीं पुण्यतिथि पर विशेष)

मध्यप्रदेश के सागर की पहचान शिक्षाविद डॉ सर हरिसिंह गौर विश्वविधालय के लिये देश और दुनियाँ में होती है । झीलों की नगरी सागर के केशवगंज वार्ड में हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के ” पायगा वाले ” परिवार में चांदी के आभूषणों का निर्माण कार्य से जुड़े श्री दुर्गाप्रसाद जी ताम्रकार की धर्मपत्नी श्री मुल्हा बाई की आखिरी और पांचवीं संतान के रूप में 18 मार्च 1943 को जिस बालक जन्म हुआ । उन्हें श्री हरिनारायण ताम्रकार ” हरीश सागरी “ के नाम से पहचाना जाता है । 

इसे विधि का विधान ही कहिये कि जिस उम्र में एक अबोध बालक को माता-पिता क्या होते हैं ! महज़ 3 वर्ष की उम्र में सिर से पिताश्री और 5 वर्ष की उम्र में माताश्री का साया उठ गया । दमोह के प्रतिष्ठित हैहयवंशी परिवार के श्री बाबूलाल जी ताम्रकार (बुकसेलर्स परिवार) की धर्मपत्नि श्रीमति नन्ही बाई (आपकी मौसी) आपको अपने साथ दमोह ले गईं । उन्होंने अपने बच्चों के साथ साथ आपका भी लालन पालन किया । अपने 3 भाई-2 बहिनों में आप सबसे छोटे थे ।

शिक्षा दीक्षा और पाणिगृहण 

आपने प्रारंभिक शिक्षा के साथ साथ माध्यमिक स्तर की शिक्षा दमोह में पूरी की । वर्ष 1959 में आपके मझले भाई श्री लक्ष्मीनारायण जी ताम्रकार जो भारतीय सेना की सर्विस से सागर लौट आये । मझले भैया आपको सागर ले आये, सागर के सी आर माडल हायर सेकेंडरी स्कूल से हायर सेकेंडरी करने के पश्चात आपने वर्ष 1962 में सागर के श्री हरिसिंह गौर विश्वविध्यालय में बी एससी में प्रवेश ले लिया । इसी वर्ष आपकी मलेरिया विभाग (स्वास्थ्य) में प्रयोगशाला तकनीशियन के रूप शासकीय नियुक्ति मिल गई । आपकी प्रथम पद्स्थापना छिन्दवाडा हुई । छिन्दवाडा से कुछ ही वर्षों बाद आपका स्थानांतरण बालाघाट हो गया । वर्ष 1964 में आपका विवाह लश्कर (ग्वालियर) के कसेरा ओली निवासी स्व श्री भूरेलाल जी ताम्रकार की सबसे छोटी पुत्री श्रीमती रामकिशोरी ताम्रकार के साथ संपन्न हुआ । जिनसे आपको चंद्र और सूर्य के रूप में 2 पुत्र रत्न प्राप्त हुए । 

आपके ज्येष्ठ पुत्र का जन्म संस्कारधानी जबलपुर में 17 फरवरी वर्ष 1968 को हुआ जिन्हें हम-आप हैहयवंशी चन्द्रकांत ताम्रकार के नाम से जानते हैं । 1 मई 1970 को सागर में छोटे पुत्र का जन्म हुआ । जिनकी सूर्यकांत ताम्रकार ” सुवन ” के रूप में अपनी एक विशिष्ट पहचान है । 

साहित्यिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक परिचय 

आपके व्यक्तित्व में धर्मपरायण मौसी से प्राप्त संस्कारों की झलक साफ दिखाई दी । आप बाल्यकाल से प्रभु भक्ति, आध्यात्म और सामाजिक सेवाकार्यों में संलग्न रहे । आपको रामायण मंडली में भजन गाने में रूचि थी । आप स्वयं अपने लिखे हुए बुंदेली गीतों और फिल्मी गीतों पर आधारित भजन लिखते थे । आपने कई शिक्षाप्रद और सामाजिक गीत भी लिखे जो सामाजिक पत्रिका हैहयवंश, नवज्योति, कसेरा-समाचार और श्री सहस्रबाहु ज्योति कलश में अनवरत प्रकाशित होते रहते थे । गीतकार और कवि के रूप में भी आपने अपनी अमिट छाप छोड़ी ।  

वर्ष 1976 में आपका स्थानांतरण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र खुरई हो गया । आपने खुदा राम ईसा की पावन भूमि को अपनी कर्म भूमि बना लिया । खुरई के लगभग सभी रामायण मंडलों से जुड़े रहे । खुरई नगरी के स्वाजातीय बंधुओं से आपके मधुर संबंध रहे । आप श्री रामसहाय जी हयारण की साहित्यक एवं काव्य संस्था ” हिन्दी साहित्य समिति और ” प्रतिभा संगम ” के सक्रिय सदस्य एवं पदाधिकारी रहे । काव्य गोष्ठियों और कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते रहे । रामायण मंडलों, साहित्यिक संस्थाओं के साथ साथ आप सामाजिक संगठनों के साथ जुड़कर, सामाजिक रचनात्मक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बड़ चढ़ कर हिस्सा लिया करते थे । 

कर्म प्रधान व्यक्तित्व 

आपने जितना महत्व धर्म को दिया उतना ही कर्म को भी दिया । शासकीय सेवा के साथ साथ जिल्द-साजी, पेंटिंग आदि का कार्य किया करते थे । आपको गायन और काव्य लेखन की तरह आपको तैराकी, उपन्यास और ताश खेलने का भी बहुत शौक था ।  

धुन के पक्के और दृढ संकल्पी

आप एक बार जो मन में ठान लेते थे तो उसे पूरा करके ही दम लेते थे । शासकीय सेवा से निवृत होने के पश्चात आपने राहतगढ़ में निजी पैथोलॉजी शुरू की । राहतगढ़ के बनेनीघाट स्थित भगवान शिव और खुरई के किला गेट स्थित माँ सिंहवाहिनी बगुलामुखी के प्रति आपकी अनन्य आस्था रही । जिम्मेदारी के साथ मंदिर के जीर्णोद्धार कार्य के लिये धनराशि संग्रह के लिये आपने अथाह मेहनत की । भव्य मंदिर निर्माण के पश्चात मंदिर में माँ महा-सरस्वती, माँ-महालक्ष्मी और माँ महा-गौरी की पीतल की मूर्तियों के साथ, माँ बगुलामखी (पीतांबरा पीठ दतिया), माँ महामाया (रतनपुर) और काल भैरव जी सहित भगवान भोलेनाथ की प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा के लिये अथक परिश्रम किया । आप मंदिर ट्रस्ट के सचिव और मंदिर के निर्माण कार्य में श्री लक्ष्मण प्रसाद जी हयारण के विश्वस्त और महत्वपूर्ण सहयोगी रहे । 

सूर्या पैथोलॉजी लैब 

गृह नगर खुरई में स्वास्थ्य संबंधी जांच की कोई व्यवस्था नहीं होने से आप बेहद चिंतित रहा करते थे, आपने अपने दोनों बेटों को डी  एम एल टी कोर्स करवा कर खुरई  में सूर्या पैथोलॉजी और राहतगढ़ में ताम्रकार पैथोलॉजी लैब का शुभारंभ किया । 

तीर्थ यात्रा एवं श्रीमद भागवत 

आपको घूमने का भी बहुत शौक था, आपने अपनी धर्मपत्नि श्रीमति रामकिशोरी जी के साथ विविध तीर्थयात्राएं की । अपने घर में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया । 

प्रमुख गीत 

– सुबह हो बनारस अवध की हो शाम 

– बहिना काहे को होत अधीर (सामाजिक)

– भाई भाई में नफरत क्यूं (एकता)

– रूप बनो एसों तुम्हारो भारत माता (राष्ट्र प्रेम)

– प्यारे ननदोईया सरोंता कहाँ भूल आये (बुंदेली) 

आदि बहुत लोकप्रिय हुए । 

26 जनवरी वर्ष 2006 को जब पूरा राष्ट्र गणतंत्र दिवस की वर्षगांठ मना रहा था । राष्ट्र, समाज, आधायत्म, धर्म और साहित्य के प्रति समर्पित आपकी दिव्य आत्मा देवलोक गमन कर गई । आपको पुण्य सलिला माँ नर्मदा के प्रति विशेष अनुराग था । आपकी अन्तिम इक्छा के अनुरूप आपकी अस्थियों को माँ नर्मदा को विसर्जित कर दिया गया । 

आपकी पुण्यतिथि (26 जनवरी) के अवसर पर आपके जीवंत जीवन दर्शन को लिपिबद्ध कर सार्वजनिक करते हुए हम आपको हृदय से नमन करते हैं । 

 

सादर प्रस्तुति : 

लक्ष्मीनारायण ” उपेन्द्र ” 

वरिष्ठ समाजसेवी, कवि एवं साहित्यकार

भोपाल मध्यप्रदेश

प्रदीप वर्मा (हैहयवंशीय)