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पृथ्वी पर जीवन समाप्त हुआ तो

विश्व पर्यावरण दिवस 

पृथ्वी पर जीवन समाप्त हुआ तो उसका कारण प्रदूषण होगा.. 

5 जून को 1974 में सयुंक्त राष्ट्र महासभा ने विश्व पर्यावरण दिवस मनाना शुरू किया पृथ्वी और वायुमंडल को बचाने के लिए यह सबसे बड़ा वार्षिक आयोजन हैं। इस आयोजन के आरंभ होने की तिथि पर मेरा जन्म दिवस भी आता है अतः   मैं अपना कर्तव्य समझकर सामर्थ्य अनुसार पर्यावरण संरक्षण के लिए लोगों को समय-समय प्रेरित करता हूँ….. यह कार्य प्रत्येक व्यक्ति को अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानकर करना ही होगा तभी प्रदूषण से धरती  वायु मंडल को मुक्ति मिल सकती है ।कोविड- 19 में लाक डाउन की वजह से कुछ प्रदूषण नियंत्रण हुआ… किंतु वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है…पर्यावरण चिंतकों के अनुसार यदि कभी पृथ्वी से जीवन समाप्त हुआ तो उसका कारण प्रदूषण होगा.. और उसका जिम्मेदार विश्व का वह प्रत्येक नागरिक होगा जो संकट की घड़ी में जानबूझ  मूकदर्शक बना हुआ है। जिसने समाधान के लिए कोई प्रयास नहीं किया। 

जून माह में सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरण दिवस को लेकर साप्ताहिक पाक्षिक कार्यक्रम होतें  हैं। इसमें लगभग 143 से अधिक देश शामिल होते हैं। अनेक सरकारी, गैरसरकारी सांस्कृतिक, सामाजिक, व्यावसायिक संगठन संस्थानों के लोग पर्यावरण संरक्षण की रक्षा और सुरक्षा के लिए चिंतन-मनन करते हैं।  भारतीय संस्कृति और जीवन दर्शन में पर्यावरण और उसके संरक्षण का महत्व प्राचीन काल से अत्यंत गहनता से हैं । प्राचीन भारतीय संस्कृति और आयुर्वेद में वट वृक्ष आंवला, पीपल, नीम, तुलसी, आम, अशोक, पपीता, जामुन, ईमली को आध्यात्मिक एवं धार्मिक मान्यताओं से जोड़कर पर्यावरण को बचाने का सबसे महत्वपूर्ण प्रयास किया है।

इससे स्पष्ट होता है कि हमारे ऋषि मुनियों चिंतक मनीषियों ने पर्यावरण के महत्व को हजारों वर्ष पूर्व जान लिया था और उसके संरक्षण के लिए प्रयास किए। किंतु विज्ञान के निरंतर विकास, अंधाधुंध जंगल की कटाई, भौतिक सुखों के लिए इंसान के स्वार्थ लोभ-लालच लालच ने जल थल एवं वायु प्रदूषण फैलाकर समूचे धरती  को प्रदूषण रूपी महा दैत्य को सौंप दिया.. जो बहुत ही दुखद व निंदनीय है। 

परिणामस्वरूप प्राकृतिक परिवर्तन हो रहे हैं… 

अंटार्कटिका में घास, दुबई में बर्फ, रेगिस्तान में बाड़, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि, भारत में समय से पूर्व ही आम के वृक्षों में बौर आने जैसी विचित्र किंतु सत्य घटनाओं ने वैज्ञानिकों को चौंका  दिया है। कुछ वर्षों पूर्व विश्व के लगभग 8 देशों के 300 से ज्यादा पर्यावरण विशेषज्ञों वैज्ञानिकों ने आर्कटिक की जलवायु के अत्यंत चौकाने वाले निष्कर्ष निकाले उन्होंने बताया कि सन 2100 तक आर्कटिक की बर्फ में लगभग 60 %तक की कमी आने की संभावना है। 

धरती का पारा इसी तरह बढेगा तो वर्ष 2070 में उत्तरी ध्रुव पर गर्मियों में बर्फ दूर दूर दिखाई नहीं देगी। बर्फ पिछलने से 10 से 90 सेंटीमीटर पर बसे अनेकों द्वीप जैसे माॅरिशस, सीशेल्स, माल दीव, इंडोनेशिया, सोमालिया, मेडागास्कर, मलेरिया, भारत का पड़ोसी श्रीलंका के अधिकांश तटों को समुद्र ने डकना आरंभ कर दिया है। पिछले लगभग 40 वर्षों में सुंदर वन के लिए प्रसिद्ध मैंग्रोन वनों का 1,85,000 एकड़ क्षेत्र समुद्र के आगोश में समा चुका है। यदि सागर का जल स्तर एक मीटर ऊपर आ गया तो विश्व प्रसिद्ध ‘राॅयल बंगाल टाइगर’ से हम वंचित हो जायेंगे।

गंगोत्री ग्लेशियर 100 फीट प्रति वर्ष की दर से गल कर पीछे जा रहा है। केदार नाथ त्रासदी से सारा संसार परिचित हो चुका है। 

समस्या के  समाधान की शुरुआत जल प्रदूषण से हो… 

जल, थल एवं वायु प्रदूषण के भीषण दुखद परिणाम एवं प्रमाण  अनगिनत हैं जो संसार से छिपे नहीं है उन पर चर्चा करने से ज्यादा जरूरी है जल प्रदूषण की समस्या का समाधान हो और उसकी शुरुआत व्यक्ति परिवार और समाज से हो..

मैं कई वर्षों गंगा की गोद और हिमाचल की छाया में  गायत्री तीर्थ शांतिकुंज हरिद्वार में रहा हूं जहाँ वेदमूर्ति तपोनिष्ठ आचार्य श्रीराम शर्मा जी एवं वंदनीया माताजी एवं आदरणीय शैल दीदी डॉ प्रणव पण्डया जी (अखण्ड ज्योति के सम्पादक कुलाधिपति देव संस्कृति विश्व विद्यालय) के सानिध्य में रहा जहाँ पद्मविभूषण श्री सुंदर लाल जी बहुगुणा जैसे पर्यावरण विद आये वहीं से मेरे जीवन में पर्यावरण प्रेम की ज्योति जली..

सभी से जल संरक्षण की अपील.. 

यह कैसी विडम्बना है कि हम गंगा, यमुना, नर्मदा, क्षिप्रा चम्बल नदियों में सफाई पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं दूसरी ओर हम धर्म के नाम पर उन्हें प्रदूषित कर रहे हैं। विभिन्न धर्म सम्प्रदायों पर्व त्योहार उत्सव की सामग्री से लेकर अस्थि विसर्जन  इन पवित्र नदियों में होता हैं। प्लास्टिक सिंथेटिक रंग से पानी प्रदूषित हो गया है।

कल कारखानों का गंदा प्रदूषित पानी नालों के माध्यम से गंगा यमुना के पवित्र जल में मिल रहा है जिससे हमारा और जल में रह रहे प्राणियों का जीवन संकट में पड़ गया है। हर व्यक्ति एक शपथ-पत्र भर कर शुरूवात करे कि मैं और मेरा परिवार अंतिम संस्कार के बाद अस्थि विसर्जन के लिए सरकार के साथ वैकल्पिक समाधान में सहयोग करेंगे। 

मोक्ष कुंड का निर्माण का सुझाव… 

विश्व पर्यावरण दिवस दिवस के अवसर पर भारत सरकार और राज्य सरकारों एवं सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से अस्थि विसर्जन के लिए अपने अपने क्षेत्र की प्रत्येक नदी पर मोक्ष कुंड का निर्माण कराने का सुझाव प्रेषित करता हूँ। ताकि प्रति दिन अस्थि विसर्जन उसी मोक्ष कुंड में किया जाएं..  पवित्र नदियां प्रदुषित न हों।

देवेंद्र कुमार सक्सेना
तबला वादक, संगीत विभाग राजकीय कला कन्या महाविद्यालय कोटा 94142 91112

 

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श्री देवेंद्र सक्सेना

तबला वादक, संगीत विभाग राजकीय कला कन्या महाविद्यालय कोटा 94142 91112

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