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प्रकृति के साथ एकाकार

तबला वादक एवं प्रकृति उपासक श्री देवेंद्र सक्सेना, कोटा के जन्मदिवस पर एक भेंट
गिरिराज सुधा, कोटा

माँ की कोख से
प्रकृति की गोद में
पल्लवित, पोषित हो
तुम हुए दिव्यता के साथ एकाकार
सांसारिक रिश्तों के पार
तुम्हारे अवतरण की
हरित रोशनी में आतृप्त हुई
यह सम्पूर्ण प्रकृति
दिव्यता के आगोश में लीन है।

ताल मिलाते तुम्हारे
मधुर थाप के स्वर
प्राकृतिक अभिव्यंजना के साथ
वाद, नाद व पर्यावरण की थाप से
देते सुर तुम
कोई लक्ष्य साध।

समस्त अद्भुत प्रकृति संगीत को
ताल-ध्वनि से गुंजित
यह पर्यावरण और तुमने छेड़ीं
ताल की अनेक गतियाँ –
तीव्र और मध्यमा
के बीच करते
सभी रागों का वादन
सध सके ताकि
पर्यावरण की लय
मानव-प्रकृति का नृत्य।

खोजीं तुमने अनेक रागनियाँ
शिव के डमरू से
शंख के दिव्य नाद से
गंगा की लहरों से
वीणा के कंठ से
तबलों से तब्दील करते
इस कायनात को
प्रकृति की सांगतिक संरचना का
तालवाद्य हो तुम
डफ़-खँजड़ी का
प्राकृत साम्य हो तुम
‘ओम’ से प्रकट
तालों का महारास हो तुम
दिव्याकर शास्त्रीय-वादन
की परवाज़् हो तुम
चंग, मृदंग की अमृत धड़कन
और पर्यावरण का प्रफुल्लित
घनवाद्य हो तुम
मानव के मोह-सम्मोहन
स्वार्थ भूचाल से उपजे
पर्यावरण प्रदूषण पर
एक झाँझरूपी नादेश्वरम्
प्रहार हो तुम।

प्रतिदिन प्रकृति से
व्यक्ति-समष्टि को
जोड़ते, जुड़ते तुम
मानव-प्रकृति सेवा का भाव लिये-
एक शिक्षण, अभ्यास लय
लक्ष्य – हौंसला एवं
प्रकृति का दरवेश हो तुम
जो इस विस्तारशील जगत को
अपनी प्रयास-तालों, बंदिशों
से एक नया सौंदर्य प्रदान करते हो
आरोग्य कटोरे में तुम
प्रकृति की चासनी घोलते
गायत्रिक मंत्र-उपासनाओं से
ध्यान-योग की प्रेक्षा तक
तुम बन आत्म-साधक
एवं प्रकृति की आहट
उस दिव्य के द्वार तक
क्या तुम जन्मों-जन्मों
इसी तरह प्रकट होते रहोगे –
‘रमैया वस्तावैया’
नियति के तुम खिवैया
प्रकृति की ताल हो तुम
सुरों की मीठी सवैंयाँ।

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गिरिराज सुधा

एम॰ कॉम॰, एम॰ फिल॰
कोटा, राजस्थान मे निवास
फोन: 9602054015

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