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प्राणों को अर्पित करें – भारत माँ के नाम

स्वतन्त्रता संग्राम था, प्राणों का बलिदान,
आज़ादी अब हो गई, सियासी घमासान।

मुल्क, मशालें, अलविदा, प्राणों की थी सेज,
सरफरोशी हसरतें, आज़ादी लबरेज़।

बम, धमाके, इन्क़लाब, क्रान्ति, जाँ-निसार,
आज़ादी देकर गये, कुर्बानी के यार।

ज़ेल, सलाखें, हथकड़ी, स्वाधीनता की गर्ज़,
गौरव यही शहीदों का, मातृभूमि के फर्ज़।

शीश गवाँ देकर चले, खूँ के कुछ उपहार,
कर्ज चुकाने दूध का, अस्मिता की तलवार।

आज़ादी की नींव में, दफ़्न कई बलिदान,
शीश, लहू के समंदर, शौर्य के तूफान।

आज़ादी या मौत दो, अपना यह पैगाम,
प्राणों को अर्पित करें, भारत माँ के नाम।

आदर्शों के बन्दीगृह, लोकतंत्र श्मशान,
सत्ता मोह की जंग में, कफ़न की खींचतान।

लिख दीं अपनी ख्वाहिशें आज़ादी के नाम,
पहन सियासी हथकड़ी, देश हुआ गुमनाम।

विगत शताब्दी में उठे, शहीदों के उफान,
नेता निकम्मे जोड़ते, सत्ता के खानदान।

आज़ादी के लिए हुए, वीर अनेक शहीद,
नेता बेचें देश को, गणतंत्र हुआ गरीब।

आओ फिर से देख लें, आज़ादी के मंजर,
दहशतगर्दी, जख्म और तिरस्कार के खंजर।

नेता परजीवी भक्षक, मुर्गबाज़ अनमोल,
राजनीतिक तलवारें, षडयंत्र के ढोल।

लोकतंत्र की शपथ मरी, घपलों के भूचाल,
देश अपनी जागीर है, जनता हुई हलाल।

समीकरण के सामने, फीके सारे रण,
लोकतंत्र की जड़ कटी, रूह मरे प्रति क्षण।

कोरोना के दौर में, नेता क्वारेंटीन,
स्वार्थों के जोड़-तोड़, सत्ता संवेदनहीन।

जनता एक ‘सामान’ है, रखें स्वयं ही ध्यान,
राजनीति अंतर्कलह, साजिशों की दुकान।

नेता बिकें बाजार में, अरब खरब के दाम,
सियासती ये करवटें, देश बचाए राम।

सौदे, दंगल, पैंतरे, करतब कई कमाल,
लोकतंत्र गिरवी पड़ा, नेता बने दलाल।

आज़ादी अब ध्वस्त हुई, बदरंग हुए जनहित,
गुटबाजी व पटखनी, जनता हो गई चित।

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

गिरिराज सुधा

एम॰ कॉम॰, एम॰ फिल॰
कोटा, राजस्थान मे निवास
फोन: 9602054015

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