फाग फुहारें होली की

काव्य होली

गिरिराज सुधा, कोटा

हैहयवंशी रंग में, भीगे जूही पलाश,
होली की बौछारें पहुँचीं, रंगों के आकाश।

दिलों में ले पिचकारियाँ, संकल्पों के रंग,
सपनों की अठखेलियाँ, चाहतों के चंग।

फागुन का नर्तन हुआ, वसंत के दस्तूर,
होली हैहयवंश की, प्रीत लुटी भरपूर।

अबीर, गुलाल कुंकुम उड़े, गूँजे पाहुन-गीत,
उर में मधुरिम प्यास उठी, तन में जगा संगीत।

शब्द-चित्र बनने लगे, कवियों के दरबार,
रस मृदंग की थाप पर, ढुलका सबका प्यार।

चन्दन हिंडोले सजे, बहकी फिरे बयार,
मौलसिरी की बरजोरी, पलकों के अभिसार।

अँखियों के ओसारे में, एक झीनी दीवार,
उड़े प्रणय स्वर रंगों के, होली का त्यौहार।

बरसाने की गोपियाँ, डोले ग्वालों संग,
अमलतास उपटन मले, खनके बाजू बन्द।

ले पीतल की डोलची, चटक हल्दयी रंग,
हँसी, कहकहे, ठिठोली, होली की हुड़दंग।

पीतल की पायल छनकी, रंगों के पैबंद,
अधमूँदी अँखियाँ लगे, जैसे चढ़ा ली भंग।

रंगों में सब धुल गए संस्कारी सम्बन्ध,
लाज के पहरे टूटते, मौन हुए प्रतिबन्ध।

पीतल नगरी में हुई रंगों की बरसात,
इंद्रधनुषी हो गये, ये अनकहे जज़्बात।

गिरिराज सुधा