डिजिटल विमर्श

फिर से

अपाहिज बनकर रह गये थे
मानो पक्षियों के पर काट दिए हो
पैर होते हूए भी
कदम रूक से गये थे
धरती मानो समा गई हो पाताल मे
आकाश भी
खामोश नजर आ रही थी
डर इस कदर घर कर गया था
मानो जंगल वीरान सा हो गया हो

कटीली झाड़ियां, सूखे वृक्ष
सूखे पत्ते , मानो झरना सूख गया हो
जीवन जहां खड़ी थी
पत्थर बनकर वहीं
ठहर गया हो,
हवायें भी भारी लगने लगी थी
अजीब सा घुटन महसूस हो रहा था
मानो जहर घोल दिया हो
मानव सिर्फ मूक दर्शक बनकर
रह गया है,
चाह कर भी कुछ न कर पा रहा,

बस चार कंधे
नजर आ रहे थे, ईश्वर भी मौन
समझ नही आ रहा था
क्या व क्यों हो रहा ये सब !
कि एक रोज नजर पड़ी
उस वृक्ष की टहनी पर
काट दिये थे जिसे
बेजान समझकर
कोमल, नन्हे ,मुलायम पत्ते
“फिर से “उग आए थे उनमे
कि मानी खुशी आने को है
देखकर मन प्रफुल्लित हो उठा,

आज एक छोटी सी आस
“फिर से “जगी मन मे
जीने के ख्वाब जगी मन मे
कल होगा, हमारा
जीतेंगे हम जंग से
“फिर से “झरने बहेंगे
जो कभी सूख गये थे
हां “फिर से ” ।।

प्रमेश ताम्रकार

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