बुराई की जड़

कहानी चुनौतियाँ और अवसर

बुराई की जड़

मूल कहानीकार अयोध्या प्रसाद “कुमुद”, बुंदेलखंड, प्रकाशन राष्ट्रधर्म लखनऊ

“बुराई नौका में छिद्र के समान है। वह छोटी हो या बड़ी, एक दिन नौका को डूबो देती है।“: कालिदास 

एक पंडित थे, बड़े धर्मी कर्मी, ज्ञानी l उन्होंने एक नगर के विषय मे सुना कि वह अत्यंत सुन्दर है l तो उसे देखने के लिए लालायित हो उठे, थोड़ा बहुत समान लेकर चल दिये l ज़ब नगर के बाहर पहुँचे और पूर्वी द्वार से अंदर जाने लगे तो द्वारपाल ने कहा महाराज इस द्वार से यदि आप अन्दर जाना चाहते है, तो सबसे पहले वेश्यागमन करना होगा धर्म भीरु पंडित उत्तरी दरवाज़े पर आये, वहां पहरेदार बोला, यदि आप इस द्वार से नगर मेँ जाना  चाहते है l तो पहले आप को माँस खाना पड़ेगा पंडित जी घूमकर पच्छिम द्वार पर आये तो वहाँ खड़े पहरेदार बोला पंडित जी यदि आप को इधर से जाना है तो पहले मदपान करना होगा अब पंडित जी दक्षिण द्वार पर आये तो उसने कहाँ पहले जुआ खेलिये तभी अन्दर जा पाओगे, पंडित जी बड़े दुविधा मेँ पड़ गये, इतनी दूर आकर लौट जाते है तो लोग हसेंगे l 

पंडित जी ने सोचा जुआ खेलने में क्या हर्ज है राजा नल और धर्म राज युधिष्ठिर ने भी तो जुआ खेला था l पंडित जी ने रछक से कहा शर्त मंजूर है l उन्हें फाटक के बगल बने जुआ खाने में ले जाया गया, जुआ चला पंडित जी जितना जीतते गये उनका लालच बढ़ता गया l उठने का नाम ही न ले, भूख लगी तो खाने को माँस आया पंडित जी ने सोचा एक बार खाने में कोई दोष नहीं फिर पंडित जी के लिए शराब आ गया l पंडित जी ने शराब भी पी ली, और तब उनकी इच्छा वेश्यागमन की भी हुई और उन्होंने वह कुकर्म भी कर डाला l लौट कर घर आये और पत्नी को सारी बाते बताई तो पत्नी ने कहा तुम इतना भी नहीं जानते कि एक बुराई से सभी बुराइयाँ पैदा होती है l

 “मनुष्य अपने अंदर की बुराई पर ध्यान नहीं देता और दूसरों की उतनी ही बुराई की आलोचना करता है, अपने पाप का तो बड़ा नगर बसाता है और दूसरे का छोटा गाँव भी ज़रा-सा सहन नहीं कर सकता है।“

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है की मनुष्य को कभी भी किसी कार्य या चीज़ के अच्छे या बुरे के लिए उस कार्य या चीज़ में यह गुण देखने के पहले  उस कार्य या चीज़ के मूल रूप से उस गुण (अच्छे या बुरे) का ज्ञान करना जरूरी होना चाहिए| जिससे उसे इस गुण (अच्छे या बुरे) कार्य या चीज़ की वास्तविकता का पता चल सके, इसके उपरांत जब हम उस गुण का हास्य या परिहास्य के साथ सफलता या असफलता का सन्दर्भ प्राप्त हो वह सुखद और फलीभूत हो, क्योकि अच्छाई का अभिमान बुराई की जड़ है।

“आप अपनी अच्छाई का जितना अभिमान करोगे, उतनी ही बुराई पैदा होगी। इसलिए अच्छे बनो, पर अच्छाई का अभिमान मत करो।“

संसार में हर वस्तु में अच्छे और बुरे दो पहलू हैं, जो अच्छा पहलू देखते हैं वे अच्छाई और जिन्हें केवल बुरा पहलू देखना आता है वह बुराई संग्रह करते हैं।यह एक सुखद स्थिति है कि किसी भी ब्यक्ति को  सर्वप्रिय बनने की इच्छा रखनी चाहिए। परन्तु ऐसा होना संभव नहीं है| क्योकि सर्वगुण संपन्न ब्यक्ति ईश्वर के तुल्य हो सकता है जो कि मानव के रूप के लिए हो पाना प्रकृतिक नहीं है| ब्यक्ति अपने सामर्थ्य अनुसार जरुर  ऐसा कर सकता है कि जिससे वह सामान्य लोग में  पसंद किया जा सके| 

“बुराई के बीज चाहे गुप्त से गुप्त स्थान में बोओ, वह स्थान किले की तरह चाहे सुरक्षित ही क्यों न हो, पर प्रकृति के अत्यंत कठोर, निर्दय, अमोघ, अपरिहार्य क़ानून के अनुसार तुम्हें ब्याज सहित कर्मों का मूल्य चुकाना होगा।“

—- स्वामी रामतीर्थ

श्रीमति रीता सिंह चंद्रवंशी
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