बेटी नहीं बचाओगे, तो बहू कहाँ से लाओगे

चुनौतियाँ और अवसर सामाजिक चिंतन

हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज और विवाह योग्य युवतियों की संख्या में कमी..

आज..मैं आप सभी के सन्मुख जिस विषय पर अपने विचार  प्रस्तुत कर का प्रयास कर रहा हूँ । वर्तमान परिप्रेक्ष्य की उस कड़वी सच्चाई से हम और आप भली भांति परिचित हैं ! यह अलग बात है, जिस विषय से हमें आज कोई समस्या नहीं उसे अक्सर ही हम नज़र अंदाज़ कर देते हैं । लेकिन, याद रखना देर-सबेर जब भी आपका उस समस्या से सामना होगा, बहुत देर हो चुकी होगी । आज के इंसान की व्यक्तिवादी सोच के अनुरूप ” जाके पाँव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई “ बुंदेलखंड की उक्त कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है । विषय के अनुरूप अपने व्यक्तिगत विचारों को साझा करने से पूर्व, मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि, किसी भी व्यक्ति विशेष, परिवार अथवा समूह की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का प्रयास किये बगैर मैं विषय को लेकर अपनी बात कहने जा रहा हूँ । विषय अन्तर्गत आपके विचार मुझसे सर्वथा भिन्न भी हो सकते हैं, अतैव यह आवश्यक नहीं कि आप मुझसे सहमत हों । 

क्या..हमारे हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज में अविवाहित विवाह योग्य कन्याओं की कमी है ?

चलिये इस समसामयिक, प्रासंगिक एवं वर्तमान परिवेश के ज्वलंत विषय के अनुरूप सत्यता तक पहुंचने का प्रयास शुरू करते हैं कि, क्या..हमारे हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज में अविवाहित विवाह योग्य कन्याओं की कमी है ? आप सभी इस विषय को किस रूप में लेते हैं ! स्वाभाविक है, विषय के अनुरूप आपके विचार भी वैसे ही होंगे । हर विषय के 2 पहलू होते हैं, यथा सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक ! विषय के अनुरूप मैं अपनी बात को पूर्णतः निष्पक्षता के साथ आप सभी के विस्तृत रूप से रखूं, आवश्यक होगा कि आप भी बिना किसी पूर्वाग्रह, मतभेद, द्वेष अथवा ईर्ष्या के सकारात्मक रूप से लेंगे । 

यथार्थ के धरातल को देखते हुए, शत-प्रतिशत हैहयवंशी मित्रों का विषय के अनुरूप जवाब *” हां “* ही होगा । लेकिन जब वस्तुस्थिति पर गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे तो लगेगा हम गलत थे । कुछ को छोड़ अधिकांशतः मित्रों का जवाब *” न “* ही होगा । हमारे समग्र हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज में, अविवाहित युवकों की संख्या बहुत ज्यादा दिखाई दे रही है । इनमें बहुसंख्यक अविवाहित युवकों की उम्र 35 से 50 वर्ष के बीच होगी । इनमें भी लगभग 15 से 20% ऐसें भी हैं, जो 40 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके हैं । यह स्थिति निश्चित रूप से गंभीर और चिंतनीय तो है ही, निंदनीय भी मानी जानी चाहिये ! 

इन चौंकाने वाले आंकड़ों को देखते हुए, निसंदेह जवाब *” हां “* ही होगा । लेकिन यह सत्य नहीं है । तस्वीर के दूसरे पहलू पर ध्यान दिये बिना कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी । अविवाहित युवकों की ही तरह अविवाहित युवतियों की संख्या भी लगभग उतनी ही निकलेगी । अंतर निकलेगा भी तो 5 से 10% का । 40 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुकी अथवा पूर्ण करने जा रही युवतियों की संख्या, कुल अविवाहित युवतियों की संख्या का 10% तो निश्चित रूप से होगी । इस स्थिति में अविवाहित युवकों की संख्या, अविवाहित युवतियों की तुलना में अधिक क्यूँ दिखाई दे रही है ? विषय के अनुरूप विचारणीय पहलू यही है । मेरा प्रयास विस्तृत रूप से जानकारी देते हुए आप सभी को सत्य के नज़दीक लाने का ही होगा ।

गंभीरता से चिंतन और मनन बेहद अनिवार्य

वर्तमान के उक्त सम-सामयिक और प्रासंगिक विषय पर गंभीरता से चिंतन और मनन बेहद अनिवार्य है । यह किसी व्यक्ति-विशेष अथवा समूह की ही नहीं हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विषय महज़ गंभीर है ! लेकिन अगर हम और आप अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझकर इसे नजरअंदाज करेंगे तो आने वाले कल की भयावह तस्वीर को देखने के लिये भी तैयार रहना होगा । 

अविवाहित युवतियों की तुलना में अविवाहित युवकों की संख्या का अधिक दिखाई देना मात्र भृम के अतिरिक्त कुछ नहीं । वस्तुस्थिति अथवा सत्यता सर्वथा विपरीत है । इस भृम के पीछे की सत्यता को समझने के लिये, सकारात्मक सोच के साथ पर्दे के पीछे जाना होगा । हमारा हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज प्रारब्ध से ही मेहनतकश और मजदूर वर्ग में आता है । तांबा-कांसा और पीतल बर्तनों के  निर्माण कार्य में लगे हमारे पूर्वजों ने शिक्षा को ज्यादा महत्व नहीं दिया । 

विगत 2 दशकों में शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुधार हुए हैं, जिन समाजों ने शिक्षा को महत्व दिया उनकी स्थिति हमसे कहीं ज्यादा बेहतर भी है । लेकिन हमारा हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज है कि, वक्त के अनुरूप होने वाले परिवर्तनों को आसानी से स्वीकार तो करने वाला है नहीं ! 

बर्तन निर्माण कार्य में शिक्षा का महत्व भी क्या है ? 

अपनी इसी नकारात्मक सोच के वशीभूत होकर हमने परिवार के युवकों को उच्च शिक्षा से दूर कर बर्तन निर्माण और व्यापार से जोड़ दिया । जितने ज्यादा काम करने वाले होंगे उतनी ज्यादा कमाई होगी । ज्यादा कमाई करने की नकारात्मक सोच रूपी कुल्हाड़ी तो हमने स्वयं अपने पाँव पर मारी है । जब तक दर्द नहीं उठा हमने ज़ख्म देखा ही नहीं, आज वही वर्षों पुराना ज़ख्म नासूर बन चुका है । 

वर्तमान में व्याप्त इस गंभीर समस्या के लिये निसंदेह हम शिक्षा के प्रति अपनी नकारात्मक सोच को ही दोषी मानते हैं । *” शिक्षा, किसी भी समाज की रीढ़ होती है, यह हमारे आचार-विचार-संस्कार के साथ साथ हमारी सोच, रहन-सहन और व्यवहार में भी व्यापक बदलाव लाती है “*  इस बात को व्यापक रूप से समझने की आवश्यकता है । जब अतीत पर चर्चा हो रही है, तो अतीत के कुछ अनछुए और नजरअंदाज किये जाने वाले पहलुओं पर भी चर्चा होनी चाहिये । *” यत्र नारियेस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता “* जहाँ नारी की पूजा होती है उस स्थान पर देवता निवास करते हैं । दुनियाँ को यह  संदेश देने वाले हमारे महान देश में मातृशक्ति को आज भी वह का स्थान नहीं दिया जा सका जिसकी वह हकदार है ! 

पुरूष प्रधान मानवीय सभ्यता से इसकी उम्मीद रखना भी बेमानी ही होगा । 

अपनी बात को विस्तार से समझाने के लिये ही मैं, आपको वर्तमान से उस कड़वे अतीत में ले जा रहा हूँ । इस पुरूष प्रधान समाज में, नारी को कभी पुरूष के समान बराबरी का दर्जा नहीं दिया गया । उसे हमेशा ही पुरूषों से कमतर आंका गया । नारी को महज उपभोग की वस्तु और पैरों के योग्य तक सीमित रखा गया । जो नारी आपके परिवार को आगे बढ़ाती है, घर-गृहस्थी के सारे कामकाज करती है, अपना परिवार छोड़ कर आपके परिवार को अपना बना लेती है, सुख-दुःख का पूरा ख्याल रखती है..उस नारी जाति की इस कदर उपेक्षा !  

क्या इसीलिये कि वह नारी है ? 

विषय के अनुरूप मैं अपनी बात को आगे बढाऊँ, अतीत के उन काले अध्यायों को खोले बिना विषय पर चर्चा, मातृशक्ति का अपमान भी होगा और युक्तिसंगत भी नहीं । पुरूष महिलाओं की तुलना में अधिक ज्ञानवान, बुद्धिमान और शक्तिवान होते हैं, अपनी इसी स्वयंवादी एवं संकीर्ण सोच के वशीभूत होकर इस पुरूष प्रधान समाज ने मातृशक्ति को आगे बढ़ने के सारे रास्ते बंद कर रखे थे । महिलाओं को स्वतंत्रता से जीने का अधिकार नहीं था । स्वकछन्दता से घूमने-फिरने की आज़ादी नहीं थी । सजने-संवरने से लेकर पुरूषों से मिलने और बात करने की आजादी नहीं थी । पढ़ने-लिखने, व्यवसाय एवं नौकरी करने का अधिकार नहीं था । जुल्म के विरुद्ध आवाज उठाने का अधिकार नहीं था । और..यह सब इसलिये कि महिलाएं पुरूषों से कभी आगे न निकल सकें । महिलाओं को विवाह से पहले और विवाह के बाद बस गुलाम के तौर पर ही देखा जाता था । बिना देखे-बिना मर्जी जाने किसी अंजान के साथ चुपचाप अपनी पूरी ज़िन्दगी, ज़ुल्म और अत्याचार की कैद में गुज़ार देने वाली मातृशक्ति के विरुद्ध इतना कठोर रवैया ! 

1950 से 1990 तक दहेज रूपी दानव के लिये हज़ारों-लाखों बेटियों की बलि चढ़ा दी गई । इनमें हमारी और आपकी बहिन और बेटियाँ भी शामिल थीं । यही उनका नसीब रहा होगा कहकर हमने इस अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध कोई आवाज नहीं उठाई । इस पुरूष प्रधान समाज ने हमेशा दोहरे मानदंड का पालन किया । अपने लिये और तो दूसरों के लिये और, पुरूषों के लिये और तो महिलाओं के लिये और, बेटे के लिये और तो बेटियों के लिये और, अपनी बेटी के लिये और तो दूसरे की बेटी के लिये और । 

” स्वयं को इस प्रधान समाज का हिस्सा जानकर, कभी कभी तो स्वयं से भी घृणा होने लगती है “

कन्या को देवी के रूप में पूजने वाले समाज को, नारी को फाँसी पर चढ़ाते और आग में जलाते ज़रा भी लज़्ज़ा नहीं आई !  आपको लग रहा होगा भला इन सब बातों से विषय से क्या लेना देना ? लेकिन, यक़ीन कीजिये अतीत के इन काले अध्यायों का जिक्र किये बिना, विषय के  अनुरूप जानकारी को समझाना और समझ पाना दोनों ही मुश्किल होता । 

अतीत की तुलना में वर्तमान परिवेश बेहद सुदृढ़, परिपक्व और परिवर्तित दिखाई देता है । आज का इंसान व्यक्तिवादी सोच एवं व्यावसायिक दृष्टिकोण से ग्रस्त है । हर बात में स्वयं का नफा और नुकसान देखता है । इस बदली हुई सोच के साथ ही लगभग हर पहलू बदला हुआ दिखाई देने लगा है । शैक्षणिक स्तर में व्यापक सुधार हुआ है । अतीत के काले अध्यायों से सीख लेकर, आज का पिता अपनी बेटियों को उच्च शिक्षित कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दे रहे हैं । कल जहाँ 13-15 वर्ष की उम्र में ही बेटियां बोझ समझी जाती थीं । उनके हाथ पीले कर दिये जाते थे, लेकिन आज ऐसा नहीं है । 80% से ज्यादा बेटियाँ आज उच्च शिक्षित हैं । 40-50% शिक्षित बेटियाँ आत्मनिर्भर हैं । आज की बेटियों को भी बेटों की तरह समान अधिकार हैं । यही कारण है कि, आज महिलाएं लगभग हर क्षेत्र में पुरूषों से आगे हैं । उन्हें स्वैक्छा से अपना भविष्य एवं जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता है । 

वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता । 

जहां अतीत के काले अध्याय बेटे वालों के अहंकार और अत्याचार रूपी स्याही से लिखे गये हैं तो वर्तमान बेटियों के सुखद भविष्य की कल्पना एवं निश्चिंतता रूपी स्याही से लिखा जा रहा है । अतीत ने महिलाओं को कभी सम्मान के योग्य नहीं समझा, महिलाओं के महत्व और उपयोगिता को नजरअंदाज किया, वहीं वर्तमान में महिलाओं ने अपने कार्य व्यवहार से यह जता दिया कि *” मातृशक्ति के महत्व एवं अस्तित्व को स्वीकार किये बिना मानव सभ्यता की कल्पना निराधार है “* 

मानवीय सभ्यता का भविष्य मातृशक्ति को महत्व दिये जाने पर ही सम्भव है । अफसोस कि, यह सब जानते हुए भी हमारा पुरूषवादी समाज आज भी महिलाओं को उपेक्षित भाव के साथ देखता है । वर्तमान परिवेश में अपने अविवाहित बेटे का विवाह तय में उनके अभिभावकों को पसीना छूटने लगा है । उच्च शिक्षित एवं उच्च पदों पर आसीन अविवाहित युवक का विवाह तय हो पाना भी आज के दौर में आसान नहीं । अतीत की तुलना में आज का पुरूष महिलाओं की दया और कृपा का पात्र बनकर रह गया है । 

आज बेटियाँ कोई गाय नहीं जिसे उनके अभिभावक चाहे किसी भी खूँटे से बांध देंगे और न ही इतनी कमजोर हैं कि, अपने बाबुल की पगड़ी की इज्जत के लिये चुपचाप जुल्म और अत्याचार सहती रहेंगी । वर्तमान परिवेश में अविवाहित युवकों को आख़िर विवाह में इतनी कठिनाई क्यूँ आ रही है ! पुरूषवादी समाज व्यवस्था को इस पर चिंतन करना चाहिये । 

” यह श्राप है उन हज़ारों-लाखों बेटियों का जिन्हें दहेज के लिये आग के हवाले और फाँसी पर झूलने के लिये मजबूर कर दिया गया “

आज अविवाहित युवतियों की संख्या, अविवाहित युवकों के अनुपात में कम क्यूँ है ? हमें इस पर भी मनन करने की आवश्यकता है ! *” यह श्राप है उन बेटियों का जिन्हें जन्म लेने से पूर्व ही इस पुरूषवादी समाज ने कोख में मार दिया “* क्या कोई यह बतायेगा उनका कुसूर क्या था ? 

” बेटी नहीं बचाओगे, तो बहू कहाँ से लाओगे “

अतीत के काले अध्यायों से सबक लेकर आज की बेटियों ने स्वयं को शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाया है । और बेटियों के आगे बढ़ने में उसके माता-पिता और परिवार ने हृदय से सहयोग भी किया है । कल तक बेटियों के जन्म को दुर्भाग्य और अभिशाप समझा जाता था, लेकिन आज स्थिति ऐसी नहीं है । बेटियाँ आज अपने माता-पिता और भाई पर बोझ नहीं बल्कि परिवार के विकास में बेटों की तरह की सहयोग कर रही हैं । 

एक अविवाहित युवक अथवा उसके अभिभावक के रूप में, मैं  आपकी पीढ़ा को समझ सकता हूँ..लेकिन, एक बेटी का पिता बनकर सोचिये.. *” माता-पिता, हमेशा ही अपने बच्चों का उज्ज्वल भविष्य चाहते हैं । फिर चाहे वह बेटी ही क्यूँ न हो..अपने कलेजे के टुकड़े को जुदा करने से पूर्व, बेटी के वैवाहिक जीवन से संतुष्ट होना कौन नहीं चाहेगा “*  

आज की बेटियाँ.. कल की तरह, अपने जीवनसाथी के रूप में किसी *सपनों के राजकुमार* का ख़्वाब नहीं देखती हैं । उन्हें चाहिये एक ऐसा सच्चा साथी, जो उनकी भावनाओं और विचारों को समझकर सुनहरे भविष्य के लिये स्वतंत्रता दे । सुख-दुःख में बराबरी का साथ दे । उनके माता-पिता और परिवार को भी उतना ही सम्मान दे जितना वह अपने माता-पिता और परिवार को देता है । 

अभावों और संघर्षमय जीवन से बाहर निकलकर क्या आप दुबारा भी अपने लिये वही चाहेंगे ? कदापि नहीं ! *”बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से पाय “* सीधी सी बात है, इस पुरूषवादी समाज व्यवस्था ने अतीत में जो बीज बोये थे, आज उसी की फसल काट रहा है । और अगर अब भी मातृशक्ति के प्रति ऐसा ही रवैया रहा तो आने वाले कल की भयावह तस्वीर देखने को तैयार रहना होगा । 

हैहयवंशी चंद्रकांत ताम्रकार 

1 thought on “बेटी नहीं बचाओगे, तो बहू कहाँ से लाओगे

  1. सामाजिक रिश्तों का अभाव, इस समस्या का एक बड़ा कारण है। दूसरा हम अपने सामाजिक मूल्यों को भी भूल रहे है। तीसरा हम परिवार और समाज के बजाय स्वयं के बारे में सोच रहे है। चौथा बुजुर्गो के सत्य और कडू वचन को पचा नहीं पा रहे है, जो कि जीवन का मिठास है। पांचवा हम हमारे संस्कृति और संस्कार का लगातार छय कर रहे है।

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