भ्रामरी प्राणायाम

चुनौतियाँ और अवसर

भ्रामरी प्राणायाम

(क) सावधानी – जिन लोगों के कान में इंफेक्शन होता है उन लोगों को भ्रामरी का अभ्यास नहीं करना चाहिए,  जिन लोगों को हाई बीपी ज्यादा होता है उनको सावधानीपूर्वक स्वास भरना चाहिए ।
(ख) चक्र  – कम से कम पांच चक्र तक का अभ्यास करना चाहिए ।
हाई बीपी ह्रदय रोग या हाइपरटेंशन में (5 Rest 5) 10 चक्र तक अभ्यास करने से ज्यादा लाभ प्राप्त होता है ।
(ग) स्वास – कानों को बंद करके स्वास को गहरा भरेंगे और भंवरे जैसी गूज वाली आवाज के साथ नासिकाओं के माध्यम से स्वास को बाहर छोड़ते हैं ।
(घ) लाभ – भ्रामरी प्राणायाम के अभ्यास से मानसिक  तनाव क्रोध चिंता और मानसिक विक्षिप्त दूर होते हैं ।    हाई बीपी और हृदय रोग में विशेषकर लाभदायक है गले के रोग ठीक होते हैं और स्वर में मधुरता आती है ।
(ड.) सजगता अभ्यास के दौरान भंवरे जैसी गूज और स्वास छोड़ने पर सजगता रखना चाहिए ।
(च) विधि ध्यान के किसी आरामदायक आसन में बैठीए । रीड सीधा सिर सीधा और आंखों को बंद रखिए  । ध्यान रहे की मुंह बंद रखते हुए दांत अलग रहे इसके लिए जीभ को हल्का सा दोनों दांतो के बीच में लगा देना चाहिए । अब दोनों नसिकाओ से गहरा स्वास अंदर भरिए तत्पश्चात भौरे जैसी कुछ करते हुए धीरे धीरे नासिकाओ से स्वास को छोड़िए पुनः दोनों नसिकाओ से स्वास भरिए, यह एक चक्र हुआ। इसी प्रकार 5 से 10 चक्र तक अभ्यास कीजिए ।

आसन – यहां 2 आसनों के बारे में बताया जा रहा है ।

(1) पद्मासन

(क) सावधानी – केवल उन लोगों के लिए थोड़े सावधानी की जरूरत है जिनके रीढ के निचले भाग में दर्द हो अन्य सभी लोग कर सकते हैं ।
(ख) चक्र/समय – पद्मासन का अभ्यास प्राणायाम या ध्यान के लिए लंबे समय तक किया जा  सकता है ।
(ग) स्वास – पद्मासन के अभ्यास के दौरान स्वास को सामान्य रखते हैं।
(घ) लाभ –  पद्मासन के लंबे समय तक अभ्यास से पूर्ण स्थिरता आती है क्योंकि शरीर और मस्तिष्क आपस में संबंधित है तथा एक दूसरे को नियंत्रित करते हैं । ध्यान के अभ्यास के लिए पद्मासन बहुत ही अच्छा अभ्यास माना जाता है , शारीरिक मानसिक एवं भावनात्मक समस्याओं से छुटकारा दिलाने में पद्मासन सहायक होता है इसके अतिरिक्त जठराग्नि तीव्र होती है और भूख बढ़ जाती है ।
(ड.) सजगता – अभ्यास के दौरान रीढ और सिर को सीधा रखने के साथ-साथ स्वास के आवागमन पर सजगता रखनी चाहिए।
(च) विधि – किसी चादर या बिस्तर पर बैठ कर पद्मासन का अभ्यास किया जाता है । अब पैरों को सामने फैला कर बैठ जाइए । एक पैर को मोड ले और उसके पंजे को दूसरी जांघ पर इस प्रकार रखिए की एड़ी और कूल्हे की हड्डी का स्पर्श हो तलवा ऊपर की ओर रहे । इसी प्रकार दूसरे पर को मोड़कर  पंजे को दूसरी जांघ पर रखिए । यह अभ्यास के अंतिम स्थिति है ।

सुखासन –

(क) सावधानी – इस अभ्यास को ध्यान के लिए सभी लोग कर सकते हैं ।
(ख) चक्र/समय – सुखासन का अभ्यास प्राणायाम या ध्यान के लिए लंबे समय तक किया जा सकता है ।
(ग) स्वास – सुखासन के अभ्यास के दौरान स्वास को सामान्य रखते हैं ।
(घ) लाभ – सुखासन के सारे लाभ लगभग पद्मासन से मिलते जुलते हैं लेकिन इसके लाभ पद्मासन से थोड़े निम्न स्तर के होते हैं ।
(ड.) सजगता – अभ्यास के दौरान रीढ और सिर को सीधा रखने के साथ-साथ स्वास के आवागमन पर सजगता रखनी चाहिए ।
(च) विधि – किसी चादर या बिस्तर पर बैठकर पैरों को सामने फैलाइऐ ,पहले दाहिने पैर को मोड़कर पंजे को बाएं जांघ के नीचे रखिए ।

बाऐ पैर को मोड़कर पंजे को मोड़ कर दायी जांघ के नीचे रखिए । दोनों हाथों को घुटनों पर चीन मुद्रा या ज्ञान मुद्रा में रखिए । अब सिर गर्दन एवं रीढ़ को सीधा रखते हुए आंखों को बंद कर लीजिए यह अभ्यास की अंतिम स्थिति है ।

 

योगाचार्य प्रदीप साहा
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