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मंड़ई: छत्तीसगढ़ी संस्कृति, लोक-जीवन की अभिव्यक्ति

हरेली,  भोजली,  सवनही,  मातर,  पहुंचानी  और  गांव  बनाई  की  तरह  मंड़ई  का  आयोजन  भी छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक परंपरा है । ग्राम्य जन-जीवन परंपराओं के धरातल पर टिका हुआ है। अंचल के किसान को उस दिन की बेसब्री की प्रतिक्षा रहती है जब उसकी कोठी धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाती है और गांवों मे मंड़ई का सिलसिला चल पड़ता है । इसके पूर्व जब किसान की फसल  कटकर  खलिहान  में  ‘खरही’  के  रूप  में  जमा  हो  जाती  है,  ग्राम्य  बैगा  द्वारा  गांव  बनाने  का कार्य किया जाता है । इस विधि-विधान  के बाद ही धान की मिंजाई गांव में शुरू की जाती है । छत्तीसगढ़ में धान की मिंजाई पूरी हो जाने के बाद मंड़ई या मेले का पारंपरिक रूप  से आयोजन किया जाता है ।

मंड़ई के आयोजन के पीछे पृष्ठभूमि

मंड़ई के आयोजन के पीछे एक और धार्मिक पृष्ठभूमि होती है, वहीं दूसरी ओर नयी फसल पाने की स्वाभाविक खुशी निहित होती है । लोक परंपराओं के जीवित रहने का कार ण यही है कि वे ग्राम्य जीवन की अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम है । इसलिये तो ग्रामीण जन-जीवन तनाव रहित उन्मुक्त एवं निर्लिप्त बना हुआ है । मंड़ई भी इनमें से एक है ।  प्राचीन ग्रंथों  में भी लोक  और  लोक परंपराओं की व्याख्या की गई  है । आदि  मानव  अपना शिकार पाकर  खुशी  से झूम  उठता था  और आग लगाकर  उसके चहुं ओर नाचता था । यह क्रिया उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम थी । उस समय से मनुष्य ने प्रसन्नता और  दुख  व्यक्त  करने  के  अलग-अलग  ढंग  अपनाये  ।

आज  सुख-दुख,  क्रोध-घृ णा,  आदि  भावों की  अभिव्यक्ति  के कई  साधन  हैं  । ग्राम्य  अंचल  में  मंड़ई  का  भी वही स्थान  है,  जो आदिमानव  के खुशी के समय होते थे ।

मंड़ई का अर्थ

हिन्दी में मंड़ई का शाब्दिक अर्थ है, कुटिया या झोपड़ी । छत्तीसगढ़ी भाषा में मंड़ई, मड़वा का अपभ्रंश है । इसका सहज  अर्थ बाजार का भव्य रूप ही मंड़ई है । डा. बलदेव प्रसाद मिश्र ने मंड़ई  को  इंद्रध्वज  की  संज्ञा  दी  है  ।  यह  सार्थक  भी  है  ।  यह  लोकभाषा  में  मंड़ई,  कंदई  डांग  को कहा  जाता  है  ।  मंड़ई  उत्सव  की  माई  (मुख्य)  मंड़ई  जिसे  कंदई  मंड़ई  कहते  हैं,  ढीमर  जाति  के यहां  होती  है  । ढीमर  लोग जल देवता  वरू ण के उपासक  होते  हैं  । यह  मंड़ई  उनकी देवी  प्रतीक मानी  जाती  है  ।  ऐसा  लगता  है  कि  जल  की  देवी  की  कृपा  से  अच्छी  फसल  होती  है  और मंड़ई-मेला  धान  के  बढ़ोना  (कटनी  की  समाप्ति)  के  बाद  का  समृद्ध-वृद्धि  होने  का  प्रथम  आयोजन है ।

मड़ई की पूर्व तैयारी

मंड़ई  का  हाका  पड़ते  ही  आयोजन  की  पूर्व-तैयारियां  प्रारंभ  हो  जाती  है  ।  निर्धारित  स्थान पर  दुकानों  के  लिये  जगह  घेर  ली  जाती  है  और  समय  पर  उन्हें  सजा-संवार  दिया  जाता  है  । मेजबान  बैगा  ही  आसपास  के  ग्रामीणों  को  यथा-विधि  निमंत्र ण  दे  आता  है  ।आसपाास  के  ग्रामीण कुछ निर्धारित डांग को लेकर  मंड़ई  में  भाग  लेने  पहूँच  जाते हैं  । मंड़ई  में  पहुंचने पर  वे ध्वजधारी एवं मेहमान बैगा सम्मान के पात्र होते हैं । मेजबान बैगा यथाशक्ति उनका स्वागत करता है । इस अवसर  पर  मेहमानों  को  नारियल,  कपड़े  एवं  फूलमालायें  भेंट  दी  जाती  है  ।  स्वागत-सत्कार  के पश्चात्  सभी  डांगधारी  मंड़ई  का  फेरा  लगाने  के  लिये  भीड़  में  कूद  पड़ते  हैं  ।  फेरे  के  समय लोक-वाद्य  एवं  रा  तों  के  दोहे  मंड़ई  की  भारी  भीड़  को  चीर  कर  रख  देते  है।  भेंट  की  सामग्री पालों में बांध दी जाती है । विभिन्न गांवों से आये विविध रंगों के ध्वज जब मंड़ई में मटकने लगते हैं,  तब  दर्शकों  का  सहज-सरल  मन  भी  पुलकित  हो  उठता  है  ।  खरीददारी  करते  नर-नारियों  के पैर स्वाभाविक रूप से थिरकने लगते हैं ।

क्या-क्या होता है मंड़ई में

मंड़ई  के  आयोजन  में  सबसे  बड़ा  महत्व  ग्राम्य  देवी-देवताओं  का  है  ।  जितने  गांव  के देवता,  उतने  ही  मंड़ई  के  डांग  ।  मंड़ई  के  दिन  सभी  देवताओं  का  आह्वान  किया  जाता  है  एवं उनसे विनती की जाती है कि वे सब मिलकर गांव की विघ्न-बाधाओं को दूर करें एवं जन-जीवन में खुशहाली की रोशनी भर दें । यह उपक्रम बैगा ही करता है । वह देवी-देवताओं के नाम बनाये गये विभिन्न ध्वजों का रूप-सौंदर्य निखारता है । मंड़ई में निर्धारित स्थान पर पूजा-अर्चना करने के बाद भीड़ के सात फेरे  लिये जाते हैं । ये सात फेरे, विवाहोत्सव के समय वर-वधू द्वारा लिये जाने वाले फेरों से काफी समानता रखते हैं।

ये वे ही सात बचन होते हैं, जो वर-वधू द्वारा लिये जाते हैं । फेरे समाप्त होने पर ही माना जाता है कि मंड़ई हो गई या मंड़ई का ब्याह हो गया । विलंब से मंड़ई में आये लोग यह पूछे बगैर नहीं रहते-मंड़ई  बिहागे  ?  मंड़ई  के  आयोजन  में  पहले  कंदई  डांग  आवश्यक  अंग  माना  जाता  था,  पर अब  यह  दिखाई  नहीं  देता  ।  फिर  कंदई  डांग  के  बनाने  में  भी  पर्याप्त  समय  की  आवश्यकता  होती है, जिसकी कमी जन-जीवन को सालती है । ग्राम्य  अंचल  में  कंकालीन  देवी  की  सबसे  बड़ी  मान्यता  है  ।  इसके  बाद  क्रमशः  भंगाराम, दंतेश्वरी,  दंतेवाड़ा,  बस्तरहीन  बैहादेव,  अंगादेव  प्रमुख  है  ।  उत्तरी  छत्तीसगढ़  में  महामाया  की  पूजा ज्यादा लोग करते हैं । इनके ध्वज तैयार किये जाते हैं और पूजा की जाती है । प्रतिष्ठित बैगाओं के भी ध्वज बनाकर पूजा होती है ।  मंड़ई में देवी की डोली, माची और आंगा  निकालकर परिक्रमा की जाती है । इनका सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन मंड़ई के दिन ही होता है ।

ग्राम्य जीवन का सीधा संबंध

मंड़ई  का ग्राम्य जीवन  से सीधा  संबंध  होता  है  ।  मंड़ई  एक  लक्ष्य है,  जिसका  संबंध  लोगों के  रहन-सहन  से  है  ।  कोई  शुभ  कार्य  शुरू  करने  या  समाप्त  करने  के  लिये  मंड़ई  एक  प्रतीक चिन्ह  होता  है  ।  मंड़ई  या  मेले  आस्था  का  प्रतीक  है  ।  यथा-यदि  किसी  किसान-पुत्र  ने  अपनी फरमाइश की कि बाबूजी-हमें कलाई घड़ी चाहिये, स्कूल जाने में देर हो जाती है । बाबूजी किंचित मुस्कुराये और झट कह दिया-फिकर झन कर रे मंड़ई बर लेबो । बेटा संतुष्ट हो गया और बाबूजी मूंछे ऐठनें लगे ।

मंड़ई  किसान  का  सपना  होती  है 

मिंजाई  हो  जाने  के  बाद  वह  अपनी  जरूरतों  एवं इच्छाओं  को  मंड़ई  के  कलेजे  से  निकालता  है  ।  उस  समय  उसका  कलेजा  भले  ही  कमजोर  हो कोई  फर्क  नहीं  पड़ता  ।  कुछ  खास  गांवों  की  मड़इयों  की  उसे  बेसब्री  से  प्रतीक्षा  रहती  है  ।  उस समय बड़ा आश्चर्य होता है, जब देखा जाता है कि जरूरतों को पूरा न कर सकने वाले लोग मड़ई के  लिये  बोरा-दो  बोरा  धान  बेचकर  सैकड़ों  रूपये  व्यसनों  पर  खर्च  कर  देते  हैं  ।  लोगों  की मानसिकता  ही  बन  जाती  है  चाहे  किसी  प्रकार  का  खर्च  हो  मड़ई  पर  या  मड़ई  के  दिन  करने  में नहीं हिचकते । किसी को गांव जाना हो, तब भी बहाना बना दिया जाता है अमुक गांव की मड़ई होगी, तभी पहुंचेगे ।

रिश्तों के चिरस्थायी बनाने  की कल्पना

मड़ई  में  युवक-युवतियां,  बच्चे  और  बड़े-बूढ़ों  सबका  नजरिया  अलग-अलग  होता  है  । बड़े-बूढ़े रिश्तों के चिरस्थायी बनाने  की कल्पना करते हैं ।  युवक अपने मित्र बनाने में वक्त जाया करते  हैं,  युवतियां  परस्पर  हंसी  ठिठोली  में  व्यस्त  होती  है  ।  विवाहितायें  पारिवारिक  समस्याओं  पर आपस मंे चर्चा करती है । मड़ई बच्चों के लिये बड़े कौतुहल का केन्द्र होती है । उनकी गलियां मिठाइयां  और  रंग-बिरंगे  खिलौनों  की  ओर  सहज  ही  उठ  जाती  है  ।  धूल-धूसरित  मिठाईयां  भी खुशी के कार ण गले उतर जाती है, औरों की क्या कहें ? किसी को होटल का भजिया-बड़ा भाता है, तो किसी को सर्कस-तमाशा ।

ठेकवाडीह के प्रवीण कुमार साहू पंडित ने बताया कि मड़ई का आयोजन आपसी संबंधों को प्रगाढ़  बनाने  के  लिये  किया  जाता  है  ।  प्रतिष्ठित  बैगाओं  के  समीप  अपना  काफी  समय  गुजारने वाले  कोलिहामार  के  सेवानिवृत्त  शिक्षक  श्री  धिराजी  राम  सोरी  ने  कहा  कि  मड़ई  की  झांकी  काफी साफ  स्वच्छ  है,  इसके  आयोजन  के  पीछे  गहराई  है,  यह  वह  फूल  है,  जिसे  मनोमालिन्य  न  रखकर सबको  स्वीकार  करना  चाहिये,  केवल  कुछ  विद्रुपताओं  ने  ही  इसे  बदनामी  का  धब्बा  दे  दिया  है  । स्थानीय  पूर्व  बी.ओ  टी.आर.  महमल्ला  के  विचारों  में  मड़ई  गांवों  का  वह  अनुष्ठान  है,  जो  मनुष्य  के संस्कारों के समान आवश्यक है ।

मड़ई  एक  ओर  तो  संबंधो  को  प्रगाढ़  बनाती  है,  वहीं  संबंधों  में  दरार  भी  पैदा  करती  है  । बड़े-बूढ़े  तो  यही  सोचकर  मड़ई  आते  हैं  कि  उनकी  फला  संबंधी  से  भेंट  होगी,  पारिवारिक  बातें होगी,  आपस  की  समस्याओं  का  समाधान  होगा  ।  यह  तो  होता  ही  है,  पर  मड़ई  के  दिन  मेहमानों की  संख्या  ज्यादा  होने  पर  अनावश्यक  तनाव  बढ़ते  हैं  ।  मेजबान  को  व्यर्थ  में  परेशानी  होती  है  । ‘अतिथि  देवो भव’  का  विचार-किंचित  ही लोगों  में  रहता  है  और  अगर  यह  भावना कायम रहती  है, तब  सचमुच  कंुडली  मारकर  बैठा  जा  सकता  है  और  कुटुंब  की  समस्या,  जीवन  के  उतार-चढ़ाव आदि पर व्यापक चर्चा करने में एतराज नहीं ।

नाचा मुख्य आकर्षण

छत्तीसगढ़ी नाचा मड़ई का एक आकर्षण होता है । गांवों में प्रतिस्पर्धा की भावना बलवती होने  के  कारण  एक  से  बढ़कर  एक  बढ़िया  नांच-गम्मत  बुलाकर  रात्रि  में  प्रदर्शन  किया  जाता  है  । जितना  प्रसिद्ध  नाचा,  उतनी  ही  मड़ई  में  चमक  ज्यादा  ।  मड़ई  के  दिन  संर्पूण  ग्रामीण  वातावर ण थिरकन  भरी  होती  है,  इसलिए  नाच  के  आयोजन  की  परंपरा  बनी  है  ।  सामथ्र्यानुसार  छत्तीसगढ़ी नाचा  कराया  जाता  है  ।  नाचा  के  दौरान  मोजरा  देने  की  प्रथा  है  जिसे  सभ्य-सुसंस्कृत  समाज स्वीकार नहीं करता । जुआ, फड़ एवं शराब की खुली बिक्री के कार ण असामाजिक तत्वों को पनाह मिलती है । अंततः  कहा  जा  सकता  है  कि  मड़ई  लोक  जीवन  को  मधुर  और  रसमय  बनाती  है  । इसमें लोक समूह का सारा श्रम एवं आनंद प्रतिध्वनित होता है । खुशी का प्रतीक है, यह मड़ई एवं मानवीय संवेदनाओं की अनुभूति है मड़ई । इसके औचित्य-अनौचित्य पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगता ।

राज्य की कुछ प्रसिद्ध मंड़ई

छत्तीसगढ़ में पितृमोक्ष अमावस्या के बाद पहले मंगलवार को कंकालीन मंड़ई (गुरूर) होती है  ।  इसे  कंकालीन  दशहरा  के  रूप  में  भी  जाना  जाता  है  ।  दीवाली  के  बाद  चंवर  ग्राम  और रानीतराई  मंड़ई  होती  है  ।  धमतरी  जिले  की  कुंदई-बोरई  और  कांकेर  की  सरोना  मंड़ई  भी  काफी प्रसिद्ध है । मोहंदीपाट की मंड़ई में भी खचाखच भीड़ रहती है । पौष शुक्ल र्पू िणमा को होने वाली पांडुका मंड़ई में भी हजारों की भीड़ उमड़ती है । धमतरी, गुरूर, चारामा, करहीभदर, बालोद, पुरूर, कंवर की  मंड़ई क्रमानुसार थोड़े-थोड़े  अंतर  से ही आयोजित  की जाती  है  । छत्तीसगढ़  की  सबसे लंबी  यानी  ज्यादा  दिनों  तक  चलने  वाली  और  सबसे  अंत  में  होने  वाली  मंड़ई  दंतेवाड़ा  की  फागुन मंड़ई होती है । लगभग हर मंड़ई में रात्रि का प्रमुख आकर्षण नाचा गम्मत होता है । बड़ी मंड़इयों की विशेषता यह होती है कि वहां दूसरे दिन छोटी यानी हटरी मंड़ई भी होती है ।

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