मकर संक्रांति: खेल

काव्य चुनौतियाँ और अवसर

खेल में छुपे हैं
कितने रंग, गंध
और किलकारियाँ!
तितलियों के पीछे भागना
सुबह से शाम,
जुगनुओं की रोशनी को
मुट्ठी में कैद कर
बतियाना तालाब की मँुढेर पर!

खेल है हृदय का स्पंदन
बच्चों की निश्छल हँसी
जीवन का ज़्ाज्बाती संगीत
और कलियों का बचपन –
आँख-मिचैली
अकड़म-बकड़म
कंचा, गोली
हु-तु-तु-तु ।

खेल है वसंत
खेल है झरना
खेल है ज़्ाद्दोज़्ाहद
तूफानों से भिड़ना
खेल है पर्वतों को छूना
आकाश में सितारे टांकना!

खेल है ‘‘मौत का कुआँ’’
और सर्द रातों में नंगे बदन
मन्सूबे बाँधना
खेल ढोता है बोझ जि़्ान्दगी का!

खेल है रेत के घरोंदों में
जीवन के अर्थ तलाशना
और सागर में छुपे रत्न ढूँढ लाना!
खेल है गौरैया का
डाल-डाल पर फुदकना
श्रम में नहाया हुआ यौवन
कोमल मृग-छौने सा स्पर्श
और चिलमिलाती धूप का एहसास!

खेल है पलटू की गुलेल
रतनू का रिक्शा
और दीनू का कुदाल
खेल न हिन्दू है न मुसलमाँ
खेल है इंसानी रिश्तेदारी
अहमद की रामू से यारी
खेल है खुशियों का पिटारा
रिश्ते जीते, स्वार्थ हारा
खेल है उमंगों का उजाला
ताजगी की कबड्डी
उदासी पर ताला
खेल है उम्र का चढ़ना-उतरना
बचपन की सीढ़ी पर
वक़्त का फिसलना!

खेल है – कृष्ण की बाँसुरी
भीम की गदा
शकुनी के पाँसे
राम की मर्यादा
और अर्जुन का साक्षी भाव!
खेल में आकंठ डूबी है राजनीति
खेल से चलता है व्यापार
खेल है धर्मों का कारोबार
खेल से आदमी फलता-फूलता है
मुसीबतों से जूझता है
चुनौतियों को ढूँढता है
खेल है क्रिकेट की बाल
कौन जाने, कब कोई
‘आउट’ हो जायेगा
खिलाड़ी है वही
जो नाम छोड़ जायेगा!

गिरिराज सुधा
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