मील का पत्थर बनें

चुनौतियाँ और अवसर सामाजिक चिंतन

मिले साथ सभी का

करते  हैं  हम इंतजार यार सभी का। चाहते  हैं मिले  हमे साथ सभी  का।
करते हैं हम हर पल सम्मान सभी का।  खुशियों से भरा हो घर संसार  सभी का।
मुश्किल में भी लोगो  हिम्मत मत  हारो ।अवसर हैयारो सभी के साथ में चलने का।
अंत भला तो सब भला कहता हैजग सारा। भूलो उन सबको जो भी इक दिन था काला।
अंत निकट उनका जिनका  दिल  है काला । करो  हिसाब अब  लोगो नेकी और बड़ी का।
काम करो लोगो अब  इक भी  जो हो अच्छा। सच है होना है लोगो इक दिन  अंत सभी का।

मील का पत्थर बनें

समाज बट बृक्ष है  इसकी छत्र -छाया  मैं विमर्श  करें
समाज तो  सबके लिए  है समाज  के  लिए कितने हैं ,

समाज  संगठन और उसके पदाधिकारियों का फर्ज  है, सबको साथ लेकर चलें, सबकी सलाह से काम करें । सबकी बात सुने। पारदर्शिता से काम करें। समाज की सम्पत्ति का ईमानदारी से सरक्षण करें । देखने मैं आ रहा हैं,संगठनों के पदों पर लोग कब्जा जमा कर  बैठे हैं। ऐसे लोग अपने अंध भक्तों के बल पर अध्यक्ष का पद हथिया लेते हैं,जो मीटिंग मैं / मंच पर खड़े होकर दो शब्द नहीं बोल पाते रबर स्टम्प बनकर रह जाते हैं। लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं की बहुत सी खूबसूर्तियों मैं एक  यह भी है जब चाहो पेनल  बनाकर संगठन पर कब्जा जमालो उनको जितवा लो जिहे समाज सेवा से कोइ  मतलब नहीं अपने रुतबे को कायम रखने से  मतलब है। समाज के लोगों को चाहिए वे ऐसे लोगो के हाथों मैं समाज की बागडोर सौंपें जो  निष्पक्ष हों, सबको साथ लेकर चलने वाले हों,जिनके पास समाज को देने के लिए समय हो जनहित की योजनाएं बनाने मैं, उनको लागु करने मैं सक्षम हों रुचि रखते हों । उनकी निष्ठा संदिग्ध न हो।  समाज के लोगों के सुख दुःख मैं खड़े रहने वाले हों।

समाज की प्रगति तभी संभव है जबतक  समाज के  सबसे पिछड़े  व्यक्ति का विकास नहीं हो जाता। लोग दावा  करते हैं समाज प्रगतिशील है अब पिछड़ा नहीं रहा।  पहले लोगों को समाज का भय रहता था , हर व्यक्ति चाहे छोटा हो बड़ा समाज की रीती रिवाजों नियमों का पालन करता था। बंधन मैं रहता था। अब किसी को समाज संगठन का ,बंधन नहीं रहा। दंड का भय नहीं रहा  अब लोग अपनी मर्जी के मालिक हैं, हाँ ये प्रगति  जरूर हुई है, समाज के बंधनों से मुक्ति दिलाने वाली सोच में  / दंड का भय ख़त्म करने  वाली सोच में / पाश्चात्य सभ्यता का रंग चढाने  वाली सोच में प्रगति हमने जरूर की है ।मानो  या न मानो, जिसे कतई जायज नहीं ठहराया  जा सकता। क्या ये समाज की प्रगति के माप  दंड हैं।/ क्या प्रगति का  दावा  हवा हवाई नहीं है ?

रमाकांत बडारया
Latest posts by रमाकांत बडारया (see all)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *