युवकों की वैवाहिक समस्या का दानव

चुनौतियाँ और अवसर सामाजिक चिंतन

युवकों की वैवाहिक समस्या का दानव

आज समाज में सबसे बड़ी समस्या समाज के युवकों के विवाह की है अक्सर सवाल किये जा रहे हैं समाज में अविवाहित युवकों की बढ़ती हुई संख्या पर  -^^समाज मौन ,जिम्मेदार कौन **पहले लड़की  के परिवार वाले अपनी बच्चियों के विवाह के लिए चिंचित रहते थे  जब किसी की लाड़ली बेटी का विवाह तय हो जाता था उसे लगता था उसने गंगा नहा ली हो। क्योँकि जिनके लड़के होते थे उनके पैर जमीन पर नहीं पड़ते थे ,आसमान में उड़ते रहते थे। जब कोइ अपनी बच्ची का रिस्ता लेकर जाता तो जबाब मिलता लड़का अभी पढ़ रहा है। अपने पैरों पर खड़ा हो जाने दो। नौकरी की तलाश कर रहा है। भारी भरकम दहेज की मांग ने जोर पकड़ा जो समाज में नासूर बन गई। हम उलाहना देते थे लड़के वालों को समझना चाहिए । आज लड़के वालेअपंने लड़कों  की शादी के लिए  चिंचित  हैं संख्या लगातार बढ़ती जा रही है  आज कहा जा रहा है ,लड़की  वाले परिवार वालों को समझना चाहिए ,आखिर ऐसी स्थिति का निर्माण कैसे हुआ विचारणीय है।

मेरे मत से शैक्षिक  प्रगति इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है ,समाज के सभी वर्गों के लोगों ने अपनी बेटियों की शिक्षा पर कुछ पRज्यादा ध्यान दिया रूचि ली । बनिस्पत  बेटों  की  शिक्षा  पर  कम  ध्यान दिया। उन्हें या तो व्यापार में लगाया है  । पैतृक धंधे में लगाया ,फलस्वरूप लड़कियाँ शिक्षा के क्षेत्र में आगे निकल गयीं और लड़के पिछड़ गए।  शिक्षा ने लड़कियों को अपने अधिकारों के प्रति जागृत किया समानता के अधिकार से परिचित हुईं। हर युवती / युवक  /उनके माता पिता  चाहते है ,उसका जीवन साथी/दामाद  उसके सम -कक्ष  योग्यता वाला हो । पहले माँ बाप के द्वारा तय किये रिश्तों को अहमियत दी जाती थी लड़कियों को तब पता चलता था जब उनकी शादी तय हो जाती थी जिसे सहर्ष  स्वीकार कर लेतीं  थी। समाज पुरुष प्रधान था  पर अब ऐसानहीं है । पहले  जब मां -बाप  लड़की देखने जाते थे  वे लड़के वाले परिवार के साथ साथ मामा पक्ष पर  भी गौर करते थे ।  कुंडलियां मिलाते थे। लड़की को पसंद करने का नजरिया अलग था ,मां-बाप की नजर चेहरे की बजाय बच्ची के चरणों पर रहती थी वे देखते थे १-बच्ची के तलवों व जमीन  के बीच खाली स्थान तो नहीं। अगर खाली स्थान होता तो रिश्ते से परहेज करते थे ऐसा माना जाता था  इससे घर की समृद्धि पर पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। २- खड़ी /बैठी लड़की के पैरों पर गौर क्र देखते की लड़की कहीं अपने अंगूठे /अँगुलियों से जमीन खुरचती तो नहीं। अगर ऐसा होते देखते तो रिश्ते से परहेज करते। ऐसा माना जाता था इससे घर लड़के के परिवार की एकता /अखंडता पर आंच आती है। अब ऐसी पारखी निगाहें कहा रहीं।

बेटियों की शिक्षा पर जोर दिया, बेटों को नजर अंदाज किया  

अब शिक्षा ने समाज को नारी/स्त्री प्रधान बना दिया है आजकल युवतियां अपना जीवन साथी अपने नजरिये से चुनना पसंद करतीं हैं। एक पिता अपनी पत्नी से खाना खाते हुए कहता है -मैंने अपनी लाड़ली बेटी के लिए एक सूंदर सुशील l सम्पन्न परिवार का लड़का देखा है बर्तनों का बड़ा व्यापार है दो भाई  और एक बहन है। पर लड़का बिटिया की तुलना में कम पढ़ा है ऐसा रिस्ता मिलना मुश्किल है। बेटी ध्यान से बातें सुन रही थी बोली -पापा लड़का कम पढ़ा लिखा है शादी के बाद उसके मन मैं हीं भावना नहीं रहेगी ,व्यापार का क्या भरोसा आज भाई मिलकर कर रहे हैं  कल किसने देखा है व्यापर आज अच्छा चल रहा है कल न चले । लड़का आपकी नजरों में  सुंदर सुशील है  ये  तो शादी के बाद ही पता चलता है ।  पुराने उसूल बेमानी हो गए हैं , जिसका असर घर ,समाज पर स्पष्ट  देखा  जा सकता है। संयक्त परिवार विरले ही नजर आते हैं लड़कियां   / माँ -बाप  सक्षम ,पढ़ा लिखा / नौकरी  पेशा  लड़का खोजना चाहते हैं,ताकि उन्हें बेटियों को शामिल  परिवार में न रहना पड़े सास ससुर की सेवा भाव अब नहीं के बराबर रहा । वे भूल जाते हैं कल उनके भी साथ ऐसा हो सकता है।         

समाज में पढ़े लिखे लड़कों का आभाव है दोषी हम खुद हैं क्योँकि हमने लड़कों की पढ़ाई की और ध्यान नहीं दिया। लड़कियों के साथ भेदभाव की बात को समाप्त किया पर पर बेटों के साथ शिक्षा के मामले में भेदभाव कर बैठे। लड़कियां ज्यादा पढ़ी लिखी हैं इसलिए लड़कों के रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं अविवाहित युवकों की संख्या बढ़ रही है। ,और जो लड़के पढ़े लिखे हैं वे अपने सह कर्मियों के साथ अंतर्जातीय विवाह कर रहे हैं कमाऊ पत्नी की चाहत में ताकि उनकी आधुनिक जरूरतें पूरी हो सकें शानो शौकत की जिंदगी जी सकें।कुंडली मिलान का इनके लिए महत्वहीन हो गया।  समाज/माँ- बाप  भी मौन है/ असहाय हैं  इसे मौन स्वीकृति मना जा रहा है। नतीजा घातक सिद्ध हो रहा है योग्य बच्चियों को भी स्वाजातीय वर नहीं मिल रहे हैं वे भी /उनके माँ-बाप भी अंतर् जातीय विवाह के लिए अग्रसर हो रहे हैं समाज से शिक्षित युवक युवतियां दूर हो रहे हैं  ।

आज स्वाजातीय पढ़ी  लिखी लड़कियां ससुराल में ऐसे हालात पैदा कर रही हैं । लड़के  बेबस हैं अब  एक ही घर में सास  का खाना  अलग बन रहा है   बहू  -बेटे  का  खाना अलग बन रहा है। बंधन उन्हें बिलकुल स्वीकार नहीं है। संस्कारी परिवार प्रताड़ित हो रहे हैं काश माँ- बाप ने उन्हें शिक्षा के साथ साथ  अच्छे संस्कार भी दिए होते। धीरे धीरे समाज खंड खंड होता चला जायेगा अपना अस्तित्व ही खो देगा। बेटा बहू अमरीका मैं रहते हैं। ऐसों से समाज की चिंता की उम्मीद रखना जिन्हे अपने घर परिवार माँ बाप  की चिंता नहीं।पहले  पहले फोन आता था/पैसे आते थे फिर ओ भी बंद ।  समाज संगठन ऐसे मामलों में पीड़ित परिवार का साथ देता तो आर्थिक मदद करता  तो ,लगता संगठन अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए है,मंदद  के लिए है। पर ऐसा देखने में नहीं मिलता। । समाज संगठन में बैठे लोग सिर्फ सहस्त्राबाहु जयन्ती मानाने को ही  असली समाज सेवा समाज सेवा मान बैठे हैं।  कुछ तथाकथित समाज सेवी ताम्रकार /कसार /कसेरा परिवार के लोगों को अपने पाप धोने इज्जज्त कायम रखने अन्य समाज में वैवाहिक सम्बन्ध करने की सलाह दे रहे हैं क्योंकि उनके बच्चो ने उनकी मर्जी के खिलाफ ऐसा कदम जो उठा लिया है । ताकि उनका सम्मान रूतबा कायम रहे । बताने दुसरा उदाहरण भी रहे।

एक दिन मुझे मेरे बचपन के साथी से कई साल बाद मिलने का मौक़ा मिला बच्चों के बारे में पूछा तो उनका चेहरा उत्तर गया बोले हाँ सब अच्छे हैं।  अगले  माह बेटे की शादी है इंटरकास्ट मैरिज है,उनकी  मनोदशा को समझा जा सकता है। क्योंकि बेटा पिता का व्यापार में हाथ बटा रहा है पढ़ा लिखा है उसे समाज में रिस्ता होता नजर नहीं आ रहा था कई जगह रिश्ते की बात चली पर हर जगह यही जबाब मिलता हम नौकरी वाला लड़का देख रहे हैं।  उम्र बढ़ते जा रही थी मजबूरी में न चाहते हुए सहमति देना पड़ा । अफ़सोस एक संस्कार वान परिवार के लोगों के दिलों में  समाज  / तथा लोगों के  विरुद्ध नफरत ने घर क़र लिया ।   लड़कों  के  विवाह की समस्या  इतना विकराल रूप ले चुकी है ,इससे निजात पाना मुश्किल लगता है फिर भी कोशिश करना हम सबका दाइत्व बनता है हार मानने वाला काबिल इंसान नहीं हो सकता ऐसी कोइ समस्या नहीं जिसका कोइ निदान  / हल न हो। निष्ठा के साथ कोशिश जरूरी है । समाज संगठन के लोगों को आगे आना होगा इससे बढ़कर दुसरी कोइ समाज सेवा नहीं है ।

रमाकांत बडारया
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