(एक)
कचनारी देह में
पलाश रख गयी बयार
वसंत आते आते!

अंतस् के आँगन में
अमलतास बौराए
चाह के हिरन मचले
पलकों से बतियाये
रतनारे नयनों में
तलाश कर गयी बयार
वसंत आते आते!

उत्पाती भ्रमरों के
सम्मोहन छोर-छोर
वनवासी कलियों में
गंध उठी पोर पोर
फगुनायी श्वासों में
मिठास भर गयी बयार
वसंत आते आते!

(दो)
ले आया वसंत फिर
फूल, गंध, इच्छाएँ!

सिंदूरी सम्मोहन
हरसिंगार सपने
अन्तर्मन गुलमोहर
दृश्य झरे कितने
अधरों पर तैर गईं
रूप, रंग तृषाएँ!

तरुओं ने बाँध लिए
केसरिया साफे
पुरवा के अनब्याहे
अवलोभन जागे
प्राणों में आलेखित
गीत, छंद, ऋचाएँ!

(तीन)
देह वसंत
मन को
पलाश होने दो!

गंध, महुआ, जुही बाँटें
खुशबू रोपें भर कुलाचें
छोड़ दो आक्रोश सारे
सपनों को
बस एक खुला
आकाश होने दो!

रजनीगंधा-स्वर उकेरें
किरनों की सरगम बिखेरें
हुलस सरसों से बहें हम
धड़कनों का
नेह से
संभाष होने दो!

टेसुई रसगंध घोलें
बाँसुरी के गीत हो लें
प्रीत की इन टहनियों पर
पाँखुरी-सा
अनवरत
मधुमास होने दो!

गिरिराज सुधा
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