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रामचरित आनंद: परशुराम संवाद

गातांक अंतिम पंक्ती …

सकुचन सहित अब सीता आयीं,
सखियां गावे मंगलाचार बधाई!
कमल नयनी पलक ऊठायीं,
प्रेम सहित वरमाला पहनाई !

चरण रघुवर के मस्तक लगायीं,
रघुवर भी सिय हृदय बसाई !
अब सिय जिवन आधार हूँ,
अनुपम जोड़ी सियाराम हूँ!

अविचल हूँ, अविराम हूँ,
मैं राम हूँ, मैं राम हूँ!

गातांक से आगे –

प्रभु परशुराम आगमन व संवाद :-

सभा में हुई गर्जना भारी,
प्रकट हुये महा अवतारी !
तारे पृथ्वी बहुत ही बारी,
कहलाते हैं परशुधारी !

मण्डप में कोहराम है,
ये तो श्री परशुराम हैं!
आँखे क्रोध से लाल हैं,
लगता है, स्वयं काल हैं!

धनुष-बाण कंधो में शोभित ,
तन पर मृग का छाल है !
जटा -जूट से केश सवांरे ,
यज्ञोपवीत , त्रीपुंड तिलक, गले में तुलसीमाल है !

कुल समेत सब नाम बताये,
डर कर सब जन शीश नवांये !
आशिष रुप प्रभु हाथ ऊठाये ,
देख जनक भी सम्मुख आये!

स्वयंबर का परिणाम सुनाये,
सीता को फिर अग्र बढ़ाये!
विश्वामित्र भी नहीं पिछड़ाये,
राम-लखन को चरण लिटाये !

शुभ आशिष दे फिर गर्जाये,
प्रभु धनु तोड़े, उसे प्रकटायें !
जो था कठिन महा विकराल,
कौन बुलाया अपना काल !

अविचल हूँ, अविराम हूँ,
मैं राम हूँ, मैं राम हूँ!

ऐसा साहस कौन जुटाये ,
प्रभु को प्रभु परिचय बतलाये!
मैं स्वयं ही सम्मुख आता हूँ,
स्वामी का दास कहाता हूँ!

सुनकर महामुनी रिसियाये,
सहस्त्रबाहु सा द्रोही बतलाये!
शिव धनु तोड़े, शत्रुता दिखलाये,
फिर कैसे तुम दास कहाये ?

अब लक्ष्मण बोले मन्द मुस्काये,
बहु धनुहिया तोड़ी पर कोऊ न आये!
जीर्ण धनुष पे ममता अधिकाये,
मुनिवर हैं अति मोह समाये!

राजपुत्र तुम होश गवांये ,
महाप्रभु प्रसाद को धनुही बतलाये!
मुनिवर हम क्षत्रीय कहलाते,
हर धनु एक समान ही पाते!

अविचल हूँ, अविराम हूँ,
मैं राम हूँ, मैं राम हूँ!

प्रभु देखे इसे शस्त्र जान,
छूते ही टूटा , तृण समान!
भ्रात श्री का दोष नहीं कोई,
सो तात आप रुष्ट न होई!

परशुधारी फिर परशु दिखलाये,
सहषबाहु संग युद्ध सुनाये!
भांति -भांति से लखन डराये,
ये परशु महा अतिकाय !

सुन लखन अब क्रोध समाये,
ब्रह्म पुरूष का रक्षण बतलाये!
भक्त गौ देव पे शस्त्र न ऊठाये ,
आपको मारे पाप समाये!

विश्वामित्र इन्हें रोक लो आय ,
बल मोरा प्रताप सुनाये!
बालक जान क्षमा कर दूँगा,
अन्यथा मुझे न दोषी बतलायें !

आपकी गाथा आप सुनायें ,
आप से सुंदर कौन बखाये !
अब महामुनी ईठलाये ,
ये मारन योग्य न बालक बतलायें !

विश्वामित्र कहे समुझाय ,
महामुनी थोड़ी कृपा दिखायें!
परशुराम परशु चमकाये ,
सभा हृदय सहम सी जाय !

अविचल हूँ, अविराम हूँ,
मैं राम हूँ, मैं राम हूँ!

लक्ष्मण फिर कटु वचन सुनाता,
तुरत प्रभाव मैं आगे आ जाता!
बालक कुछ चपलता दिखलाता ,
क्या वृद्ध जनो से क्षमा न पाता?

आपका अपराधी मैं कहलाऊं,
ये तो निरपराध है ,
किस विधि क्रोध मैं शांत कराऊं ,
खड़ा जो सम्मुख दास है !

शिव द्रोही छल विनय बहुता,
क्या तुमसे भी युद्ध न होता?
परशु सहित हैं परशुधारी ,
मैं तो हूँ बस दो अक्षरधारी!

गूढ़ रहस्य मैं विप्र सुनाऊ,
भयभीत होकर निर्भय हो जाऊं !
नारायणास्त्र का चाप चढ़ाऊ,
महामुनी का संदेह मिटाऊं !

आशीष दे प्रभु भये विदा,
जयकार हो रघुवर की सदा!
विश्वामित्र कहे सुनो राजन,
विवाह सम्पन्न जब भये धनु भाजन !

गुरु कुल की मर्यादा निभाओ ,
भेज आमंत्रण दशरथ बुलवाओ !
नगर उत्सव में डूब गया ,
लक्ष्मी का पुर दिव्य सजा!

अविचल हूँ, अविराम हूँ,
मैं राम हूँ, मैं राम हूँ!

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

आनंद कुमार कांस्यकार

फाइबर अभियंता, रिलायंस जियो इंफोकॉम, शिक्षा: इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग से प्रोधोगिकी मे स्नातक, इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग मे डिंप्लोमा, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश

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