वसंत गीत: वसंत ने ली अंगड़ाई

by | काव्य, रंग बसंत | 0 comments

गात अद्भुत प्रकृति निज सजाई, वसंत ने ली अंगड़ाई।
ठंड खेल गई छुपन-छुपाई, वसंत ने ली अंगड़ाई।

अल्हड़ बयार छू-झोर हौले-हौले,
मदन रस आमों व महुओं में घोले,
प्रीति-गीति कोकिलों ने गाई, वसंत ने ली अंगड़ाई।
गात अद्भुत प्रकृति निज सजाई, वसंत ने ली अंगड़ाई।
ठंड खेल _ _ _

अरहर व सरसो की पीत चुनर सोहे,
अलसी ले कलशी रची रास मोहे,
गुदगुदी क्यारियों में समाई, वसंत ने ली अंगड़ाई।
गात अद्भुत प्रकृति निज सजाई, वसंत ने ली अंगड़ाई।
ठंड खेल _ _ _

गेहूँ, खेसारी, मसूर, चना झूमे,
पवन पत्ती से खिलवाड़ करे चूमे,
बार-बार सित्कारें सुनाई, वसंत ने ली अंगड़ाई।
गात अद्भुत प्रकृति निज सजाई, वसंत ने ली अंगड़ाई।
ठंड खेल _ _ _

कलियों पर लगे नित भौरों के फेरे,
तितलियों ने बदले नए नित बसेरे,
सुध-बुध अहा! चराचर गवाँई, वसंत ने ली अंगड़ाई।
गात अद्भुत प्रकृति निज सजाई, वसंत ने ली अंगड़ाई।
ठंड खेल _ _ _

बगिया में यौवन अब उन्मुक्त झूले,
सुखद सपनों के रंगीन फूल फूले,
काम रंग में वसुधा पगाई, वसंत ने ली अंगड़ाई।
गात अद्भुत प्रकृति निज सजाई, वसंत ने ली अंगड़ाई।
ठंड खेल _ _ _

दीप कुमार 'दीप' कसेरा