डिजिटल विमर्श

विपस्सना

साक्षित्व भाव का योग है विपस्सना
आतिजाति श्वास को बस देखना ।
इस पर देह उस पर है चैतन्य
श्वास के हर छंद पर नज़र रखना।

स्वयं में फिर हो जाएं मौन सागर
भाव तरंगों का छोड़ यह झुनझुना।
में देह नही, मैन नही, न श्वास हूँ
में हूँ प्रत्यक्ष प्रतीति आत्म-चेतना।

श्वास झरोखे में बसे परमात्मा
यह मुक्तिदायी दर्शन की संवेदना।
श्वास की सरगम पर महारास हो
ये मान्यताएं, पूर्वाग्रह हैं वेदना।

अखंड लय इस स्वास की जबतक चले
बरसेगा अनासक्ति का आनंद घना।
स्वास के हर पड़ाव को अनुभव करो
जब तलक हो जाये ना जीवन घना।

छोड़ जगत की व्यर्थ आपाधापी को
ले श्वास की आराधना व रचना।

श्वास की गंगोत्री में ले आत्मसात
श्वास सेतु तप, श्वास ही अभ्यर्थना।
जिंदगी एक चक्रव्यूह है श्वांसों का
एक डोर पर आवागमन, फिर फिसलना।

श्वासों के इस झूलते, पुल को देख
इस पुल पर रोज़, तनावों का गुजरना।
कब से हम कैद हैं, इस कांच महल में
स्वर्ग के भी पर जाने की तमन्ना।

इस क्षण जीवन, इस क्षण मृत्यु घट जाए
हर श्वास में छुपी यही संभावना।
आओ कुछ दिन बिन श्वास जी कर देखें
सुनें धड़कने फिर, कोई विषाद ना।

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

गिरिराज सुधा

एम॰ कॉम॰, एम॰ फिल॰
कोटा, राजस्थान मे निवास
फोन: 9602054015

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