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श्री सहस्रार्जुन की माहिष्मति : विलुप्त होती हमारी गौरवशाली ऐतिहासिक विरासत

महेश्वर : मध्यप्रदेश के खरगोन जिला स्थिति मोक्ष-दायिनी माँ नर्मदा के पावन तट पर बसा यह नगर आज एक बार फिर से सुर्ख़ियों में है । दिनांक 01/07/2019 से 07/04/2019 तक यहाँ बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता सलमान खान एवं उनके प्रोडक्शन हाऊस की पूरी टीम फ़िल्म दबंग की सीक्वल “दबंग-3” की शूटिंग करने के लिये आई हुई है । भारतीय पुरातत्व विभाग, मध्यप्रदेश शासन एवं स्थानीय प्रशासन के निर्देशानुसार इस प्राचीन धरोहर को किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचाये जाने की शर्तों के साथ महेश्वर नगरी में शूटिंग की इजाजत दी गई है । 

महेश्वर के बारे में सूक्ष्मता से जानकारी करने पर स्पष्ट हो जाता है कि, इस पौराणिक एवं ऐतिहासिक रूप से विख्यात माहिष्मति का ही परिवर्तित नाम है । कलयुग, द्वापर और त्रेता युग से भी पहिले सतयुग में यह भगवान श्री हरि नारायण के प्रिय आयुध सुदर्शन चक्रावतार भगवान सहस्रार्जुन की राजधानी रही है । भगवान श्री दत्तात्रेय के शिष्य परम् शिव भक्त राजराजेश्वर भगवान श्री सहस्राबाहु सतयुग का एक महान, गौरवशाली, न्यायप्रिय एवं प्रतापी राजा के रूप में इतिहास में वर्णन मिलता है । यद्धपि समसामयिक परिस्थियों एवं व्यक्तिगत द्वेष के चलते इतिहास में, श्री सहस्रार्जुन के सन्दर्भ में बहुत से तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है । यहाँ हम उन सब बातों का जिक्र न करते हुए, इस पौराणिक एवं प्राचीन नगरी के सन्दर्भ में ही अपनी बात रखते हैं । 

माहिष्मति अधिपति भगवान श्री सहस्रार्जुन को कार्तवीर्यार्जुन, राजराजेश्वर, सप्तदीपेश्वर सहित सहस्रार्जुन के नाम से भी जाना जाता है । पृथ्वी सहित समस्त सात द्वीपों तक इनका शासन फैला हुआ था । आपने 85,000 वर्षों तक शासन करते हुए, एक गौरवशाली राज्य की स्थापना की थी । महेश्वर (माहिष्मति) को हैहयवंशीय क्षत्रिय वंश की धरोहर के नाम से जाना जाता है । यही वह पौराणिक स्थान है जहां श्री सहस्रार्जुन का त्रिलोक विजयी लंकापति रावण के साथ भीषण युद्ध हुआ था । इस युद्ध में रावण को हार का सामना करना पड़ा था । तब श्री सहस्रार्जुन ने रावण को 6 माह तक बंदी बनाकर उसे अपने अस्तबल (घुड़साल) में रखा था । इतिहास में वर्णित जानकारी के अनुसार रावण के सभी दस सिरों पर दीपक जलाये जाते थे । 

महेश्वर स्थित श्री राजराजेश्वर मंदिर के गर्भ गृह में 11 नंदा दीपक अखण्ड रूप से आज भी निरंतर प्रज्ज्वलित हैं । तत्संबंध में श्री राजराजेश्वर मंदिर के महंत पूज्य श्री चेतन गिरि जी के अनुसार उन्हें उनकी लगभग 5-6 पीढ़ियों की जानकारी है । अर्थात लगभग 500 वर्षों से भी अधिक समय की जानकारी मिलती है । किवदंतियों के अनुसार यह अखंड दीपक अनादि काल से इसी तरह प्रज्ज्वलित हैं । 

इसी पवित्र भूमि पर भगवान श्री सहस्रार्जुन और श्री परशुराम के बीच भीषण युध्द हुआ । जानकारी के अनुसार, भगवान श्री सहस्रार्जुन जी, श्री राजराजेश्वर मंदिर में बिराजमान सदाशिव भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग में सशरीर समा गये थे । वह आज भी अजर और अमर और महेश्वर (माहिष्मति) के अधिपति के रूप में बिराजमान हैं । भगवान श्री सहस्रार्जुन को भगवान श्री हरि विष्णु का 25 वां अंश अवतार भी माना जाता है । जानकारी के अनुसार श्री राजराजेश्वर मंदिर स्थित शिवलिंग पर आज भी बेलपत्र के साथ साथ तुलसी पत्र का चढ़ाया जाना इस बात की पुष्टि करता है । 

महेश्वर (माहिष्मति) की वर्तमान स्थिति पर अपने विचार आप सभी सुधि हैहयवंशीय क्षत्रिय जनों के समक्ष रखने से पहिले उसके ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्त्व के सन्दर्भ में जानकारी से आपको परिचित कराना अत्यंत आवश्यक था । महेश्वर हमारी आस्था एवं श्रद्धा के केंद्र है, हम हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज से संबद्ध ठठेरा, कसेरा, कंसारा, कांस्यकार और ताम्रकार के रूप में वर्गों में सैकड़ों वर्गों एवं समुदायों में विभक्त स्वजातीय बंधुओं की धरोहर है । 

हम स्वयं को सुदर्शन चक्रावतार, हैहयकुल भूषण माहिष्मति अधिपति भगवान श्री सहस्रार्जुन का वंशज कहकर फुले नहीं समाते । स्वयं को गौरवशाली हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज से जोड़कर गौरवान्वित होते हैं । अगर हमारे हैहयवंश कुल का कोई समुदाय विशेष महेश्वर का नाम बदलने का प्रयास करता है तो हमारा क्षत्रियों में श्रेष्ठ क्षत्रियों वाला खून उबाल मारने लगता है । महेश्वर स्थित सहस्रधारा पर बाँध बनाने की बात आती है तो हम अपनी इस प्राचीन विरासत के अस्तित्व पर आंच आने की बात लेकर चिंतित हो जाते हैं । 

क्यूँ..आखिर क्यूँ ?  

इस क्यूँ पर विचार कोई कभी विचार नहीं करता । क्या इस क्यूँ के लिये महज हैहयवंशीय क्षत्रिय होना ही जिम्मेदार है ? 

  • कभी यह भी विचार कीजिये कि अपने हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के लिये आपका क्या योगदान है !  विचार कीजिये ।
  • तीर्थराज महेश्वर के विकास के  लिये आपने क्या योगदान दिया ! विचार कीजिये ।
  • भगवान श्री सहस्रार्जुन की कीर्ति जन जन तक पहुंचे इस दिशा में अब तक आपने क्या किया ! विचार कीजिये । 
  • क्या आपका उत्तरदायित्व मात्र स्वयं को हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज, महेश्वर एवं भगवान श्री सहस्रार्जुन से जोड़कर हर्षित होने और गर्वित होने तक ही है ? विचार कीजिये । 

हम हैहयवंशीय क्षत्रिय स्वजातीय जनों में से अधिकाँश को तो अभी तक यह भी नहीं मालुम होगा कि महेश्वर क्या है, कहाँ है, इससे हमारा वास्ता क्या है ! कितने ऐसे हैहयवंशीय क्षत्रिय बंधु होंगे जिन्होंने इस हैहयवंशीय क्षत्रिय तीर्थ तक पहुँचने का प्रयास किया ! राजराजेश्वर माहिष्मति अधिपति को गाय के शुध्द घी का दीपक जलाना प्रिय है । यह   जानकारी भी अधिकाँश हैहयवंशियों को नहीं होगी ! कितने हैहयवंशीय बंधु भगवान श्री सहस्रार्जुन के चित्र अथवा मूर्ति के सन्मुख शुद्ध घी का दीपक अथवा धूपबत्ती प्रज्जवलित करते हैं ! 

कितने हैहयवंशीय बंधु होंगे जो हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज और भगवान सहस्राबाहु के बारे में जानकारी रखते होंगे ! अगर उक्त तथ्यों पर सत्यता के आधार पर आंकड़े जुटाये जायें तो संख्या कुछ हज़ारों तक सिमटकर रह जायेगी । जबकि हिन्दुस्तान के सकल हैहयवंशीय क्षत्रियों की कुल संख्या लगभग 1 करोड़ होगी । यथार्थ के धरातल पर अपना अस्तित्व खो चुके हमारे हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज में बस बातें ही होती हैं काम कुछ नहीं होता ! यह एक कड़वी सच्चाई है । हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के हित-लाभ से जुड़े हुए किसी भी विषय को हमने कभी गंभीरता से नहीं लिया । कितने ही महत्त्व का विषय हो हमने कभी उस पर चिंतन नहीं किया, एकजुटता नहीं दिखाई याकि सामंजस्य नहीं बैठाया । बल्कि अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग के अपने जन्मसिद्ध अधिकार के मार्फत हर विषय पर खुद श्रेय लेने का प्रयास करते हुए अब तक हम महज़ एक दूसरे की टांग खींचते आये है । 

आओ हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज का खोया हुआ गौरव वापिस लौटायें..महेश्वर को हैहयवंशीय क्षत्रिय धाम बनायें 

जय सहस्रार्जुन..जय महेश्वर..जय हैहयवंश 

क्रमशः-2 

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

हैहयवंशी चंद्रकांत ताम्रकार 

सेवक, चिंतक एवं विचारक
हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज
खुरई (जिला-सागर) मध्यप्रदेश
संपर्क : 8319385628

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