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श्वासों की जुगलबंदी

जब योग सितार बजता है,
तन में सुर-ताल सजता है।
फ़िक्र करो उसकी यारों,
जो दिल के साथ धड़कता है।
संभावना है शिखरों की,
जब योग का जादू चलता है।
श्वासों की है जुगलबंदी,
मौन का संगीत झरता है।
गीता गा और दृष्टा बन,
क्यों घर-द्वार भटकता है।

शास्त्र, शब्द और सिद्धान्त,
चित्त के बंधन रचता है।
देह है सम्यक् घर उसका,
जो आकार में उतरता है।
चीजें पावन बन जाती हैं,
जब मन में बसे सजगता है।
ध्यान-योग बन जाते मधुबन,
तब जीवन की अमरता है।
भाव अनुग्रह का उठता है,
योग का बोध कृतज्ञता है।

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

गिरिराज सुधा

एम॰ कॉम॰, एम॰ फिल॰
कोटा, राजस्थान मे निवास
फोन: 9602054015

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