संघर्ष विजय का दुहराता हूँ मैं

by | काव्य, रंग बसंत | 0 comments

कदम से कदम मिलाकर लोगो सुबह के साथ चलता हूँ ।
लक्ष्य पर अपनी पैनी नजर रख भेदने का दम रखता हूँ । .
कदम से कदम मिलाकर

हम भी किसी से कम नहीं बार -बार विश्वासव दिलाता हूँ।
नाव अगर हमको डुबाये तैरकर निकलने का दम रखता हूँ ।
कदम से कदम मिलाकर

रह सकेंगे कब तक पानी में मगर से बैर क़र सुनता ही रहा हूँ ।
लोगों को हर जगह बस यही बात दुहराते हुये अक्सर पाता हूँ ।
कदम से कदम मिलाकर

मुठियों में कैद चंद लोगों की रह सकेगी स्वतंत्रता कब तक देखूंगा ।
लावा बनकर बह निकलेगी एक दिन आवाज़ बुलंद करते जाता हूँ ।
कदम से कदम मिलाकर

अतियों की आंधी में हर- दम साहस से घुस टकरा जाया करता हूँ ।
बार -बार पराजय मिलने पर भी संघर्ष विजय का दुहराता हूँ ।
कदम से कदम मिलाकर

लकड़ी से निकलता है धुआं जब तक संग अनेको लोगों को पाता हूँ।
सुलगते -सुलगते आग मगर अक्सर खुद को अकेला पाता हूँ ।
कदम से कदम मिलाकर

हर बार कुछ न कुछ किया करता हूँ कुछ करने न हो ऐसी बात नही।
जुल्म नहीं सह सकता कदम-कदम पर चुनौतियाँ खड़ी करता हूँ । .
कदम से कदम मिलाकर

प्रदीप वर्मा (हैहयवंशीय)