समाज के प्रति नकारात्मक मानसिकता एवं सामाजिक अलगाव

ज्वलंत मुद्दे सामाजिक चिंतन होली

प्राय देखा जाता है कि समाज में कुछ लोग की नकारात्मक सोच, पृवृति होकर, यह कहते पाये जाते हैं कि समाज ने हमारे लिए क्या किया है जो हम समाज को समय दे, या समाज को सहयोग करे. ऐसे लोग प़ाय समाज में रिश्ते सिर्फ अपने स्वार्थ के आधार पर रखते हैं, जहाँ इनका स्वार्थ होता है वहाँ ये लोग समाज से अपेक्षा करते हैं, या किसी मुसिबत या किसी कार्य विशेष में समाज के लोग, उनके साथ खड़े होकर, उनका सहयोग करे. लेकिन यदि समाज में ही अन्य कोई व्यक्ति परेशानी में होता है तो ये लोग, अपना मूहँ मोड कर, आँखे बंद कर लेते हैं. ऐसे लोगों को अक्सर, अपने धन का, अपने पद् का, अपनी विशेष योग्यता वुद्धि या अन्य किसी तरह अंहकार होता है. और इसी अंहकार व स्वार्थ के कारण, समाज की, वा समाज के अन्य व्यक्तियों की उपेक्षा करते हुए, अपने आप को श्रैष्ठ समझने लगते हैं. अपनी इसी अंहकारी प़वृति के परिणाम स्वरूप कुछ समय बाद, समाज के लोगों द्वारा इनकी उपेक्षा होने लगती है तो समाज को भला बूरा कहकर अपनी भडास निकलते देखें जातें हैं. और कालांतर में स्वंय परिवार सहित एकाकी जीवन जीने के लिए मजबूर हो जातें हैं. 

मनुष्य जन्म से ही सामाजिक प़ाणी होकर, समाज में रहकर ही, अपनी सामाजिक, आर्थिक, वोध्दिक, शैक्षणिक, व्यवसायिक आदि गतिविधियां करते हुए, अपनी उन्नति प़गति, विकास करता है. समाज में ही रहकर ही प़तिस्पर्धा करते हुए, अपनी उन्नति विकास की प़ेरणा प़ाप्त करता है. कभी कभी आर्थिक सामाजिक प़तिस्पर्धा में यदि आगे निकल जाता है या पिछड जाता है तो तो इस कुंठा की भडास को अहंकार के कारण या उपेक्षा के कारण समाज को दौष देते हुए, समाज को भला बुरा कहना अपना परम् कर्तव्य समझता है. जबकि सम्पूर्ण दोष की स्वार्थी प़वृति का होता है. समाज में कईं व्यक्तियों की सोच होती है कि भौतिक सुख सुविधा, धन सम्पत्ति ही सब कुछ होती है और इसी भौतिक धन सम्पत्ति के कारण अंहकार इतना अधिक हो जाता है कि वह समाज वा समाज के लोगों को तुच्छ समझने लगता है. 

मनुष्य के सामाजिक जीवन में धन सम्पत्ति, पद् विध्या ज्ञान, प़तिष्ठा, सामाजिक जीवन में सम्मान प़दान करतीं हैं और समाज भी इन योग्यताओं के आधार पर विशेष सम्मान भी करता है परन्तु कभी कभी धन पद ज्ञान, प़तिष्ठा का अंहकार इतना अधिक हो जाता है कि वह अपने आप को समाज से उपर समझकर समाज की अवहेलना करते हुए, समाज की उपेक्षा करने लगता है. परिणामस्वरूप एक समय ऐसा आता है कि समाज वाले, उस व्यक्ति के लिए कहने लगते हैं कि ” बडा़ हुआ तो क्या हुआ, जेसे पेड़ खजूर, पंथी को छांया नहीं, फल लगे अति दूर ” . और एक समय ऐसी स्थिति बन जातीं है कि यही धन सम्पत्ति पद् प़तिष्ठा व्यक्ति को कुप मंडुक बना देती है. और व्यक्ति अपने आप को समाज से अलग थलग, कटा हुआ पाता है. ऐसे समय में व्यक्ति गहरे अवसाद से ग़सित हो जाता है और समाज में भी उपेक्षित अनुभव करता है.

सामाजिक अलगाव के कुछ कारण

समाज के कुछ व्यक्तियों, परिवारों के समाज से पृथक होने व अलगाव के लिए निम्न कुछ तथ्य उत्तरदायी होते हैं:–

(1) कभी कभी व्यक्ति के साथ कुछ आकस्मिक घटना क़म ऐसा घट जाता है, कुछ घटना इस प्रकार की हो जाती है कि जिससे समाज में नींदा होने की संभावना होती है. ऐसे समय में लोक नींदा, समाज नींदा से बचने के लिए एवं अपने कर्तव्यों की अवहेलना से बचने के लिए, व्यक्ति समाज से किनारा कर, समाज में आना जाना बंद कर, एवं समाज की सक्रिय गतिविधियों से पृथक होकर, व्यक्ति से कट जाता है.
(2) कई बार व्यक्ति छल कपट, कुट रचना का व्यवहार करते हुए, अपने ही बंधु बांधबौ के हिस्से की धन सम्पत्ति प़ाप्त करने के लिए षड्यंत्र, कुटनीति रचता है लेकिन ऐसी बातें, तथ्य सार्वजनिक हो जाती है तो व्यक्ति अपमानित अनुभव करते हुए अपने आप को समाज से अलग कर लेता है.
(3) यदि परिवार के सदस्य द्वारा किसी तरह का सामाजिक, आर्थिक आदि किसी भी तरह का आपराधिक कृत्य हो जाता है तो ऐसी स्थिति में वह परिवार सामाजिक रूप से वहिष्कृत होकर, समाज में पृथक हो जाता है.
(4) कुछ अवसरों पर व्यक्ति द्वारा, आ धार्मिक या आसामाजिक, समाज द्वारा वर्जित कृत्य किये जाने के कारण, ऐसे व्यक्ति, परिवार समाज से अलग होकर समाज की मुख्य धारा से अलग थलग हो जाता है.
(5) कभी कभी समाज में अलग अलग गुट, समूह बन जाते हैं, एवं उनके मध्य बाद विवाद उत्पन्न होकर, गाली गलौज, हाथापाई तक की धटना धट जाती है. ऐसे में निश्पक्ष, तटस्थ, सभ्य व्यक्ति इन गुटबाजी के कारण, सक्रिय सामाजिक गतिविधियों से किनारा करके, अपने आप को समाज से पृथक कर, समाज में रहकर भी अलग हो जाता है.
(6) कुछ बर्षो पुर्व तक यदि किसी परिवार के युवक या युवती द्वारा यदि अंतरजातीय, गेर समाज में विवाह कर लेते थे तो ऐसी स्थिति में वह परिवार समाज की मुख्य धारा से पृथक हो कर एकाकी परिवार हो जाता था और समाज की मुख्य धारा, सक्रिय सामाजिक गतिविधियों से कट जाता था.

सकारात्मक सोच के लिए आत्ममंथन:–

मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र होकर, स्वयं ही अपना शत्रु भी स्वयं ही होता है. मानव समाज में रहकर ही अपने आंतरिक विचारों एवं बाहरी परिस्थितियों में समन्वय स्थापित करते हुए, सामाजिक सदभाव से जीवन निर्वाह की प़ेरणा प़ाप्त करता है. अतः समाज में रहकर, नकारात्मक विचार एवं समाज द़ोह, सामाजिक जीवन के तानेबाने को उलझाकर रख देता है. ऐसी स्थिति में समाज से विद़ोह, नकारात्मक विचार वाला व्यक्ति, अपने सामाजिक अस्तीत्व को ही समाप्त कर लेता है. ऐसे व्यक्तियों को अपने सामाजिक जीवन में अपेक्षित सुधार कर, सामाजिक जीवन में आत्ममंथन करना चाहिए. परंतु व्यक्ति अपने अहंकार के कारण, समाज की अवहेलना करते हुए, स्वयं ही समाज से वहिष्कृत हो जाता है. 

सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत ही व्यक्ति अपने व्यक्तिगत विकास, अपने चरित्र निर्माण एवं अपने सामाजिक संबंधों का विस्तार करतें हुए, अपनी उन्नति विकास का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए. आवश्यकता इस बात की होती है कि व्यक्ति अपने अहंकार को शिथिल कर, अपने स्वार्थों को सिमित करके, अपने सामाजिक हितों के बिषयो में मनन करते हुए, अपने जीवन में सुधार करते हुए, आत्ममंथन करें. यदि व्यक्ति अपने अहंकार को शिथिल करता है तो समाज भी उसके व्यक्तिगत, पारिवारिक विकास के लिए, स्वच्छंद विचारों पर नियंत्रित करतें हुए, आत्मिक विकास, आंतरिक उर्जा शक्ति प्रदान, सामाजिक उतर दायित्व को पुर्ण करने की प़ेरणा स्वता ही प़दान करता है. 

समाज में रहकर ही व्यक्ति को अपनी शक्तियों, कमज़ोरियों व विकास के अवसरों के अध्ययन विश्लेषण कर, सुधार करना चाहिए. सामाजिक व्यवस्था में रहकर ही अपनी आंतरिक एवं बाहरी कमीयों को दूर करते हुए, अपने सामाजिक उतर दायित्वों, समाज के प्रति प़तिवृधता, सामाज के प्रति सकारात्मक, मानसिक जुडाव, लगाव, समाज के लिए सेवा भाव हीं व्यक्ति का सर्वांगीण विकास का पथ निर्धारित कर सकता है.

इस प्रकार व्यक्ति स्वयं ही अपने पारिवारिक, सामाजिक, उत्थान पतन के लिए स्वयं उतरदायी होता है
उसके साथ जो धटता है, उसका किसी अन्य पर दोषारोपण ना करते हुए स्वयं अपने कर्मों कर्तव्यों में सुधार करते हुए, सामाजिक बंधनों संबधों को स्वीकार करते हुए, आत्ममंथन करना चाहिए.