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सहस्रबाहु अर्जुन के जीवन ऐतिहासिक विश्लेषण

भागवत पुराण में किर्तिविर्य सहस्रबाहु अर्जुन का राज्यकाल 85 हजार बर्ष एवं एक हजार भुजाओं होना बताया गया है, जोकि कल्पनिक, अविश्वसनीय होकर सत्य प़तित नहीं लगता है | इस प्रकार हमारे पुराणों में सहस्रबाहु का जीवन चरित्र अतिशयोक्तिपूर्ण होकर सहस्रबाहु की छवि को अत्याधिक महिमामंडित किया गया है | इस प्रकार अविश्वसनीय तथ्यों के कारण सहस्रबाहु के व्यक्तित्व, जीवन चरित्र को जानने की ज़िज्ञासा ध्यान आकर्षित हुआ | परिणामस्वरूप उज्जैन के प | सुर्य नारायण जी व्यास (पदम् विभुषण) के प़तिनिधि रचनाओं की पुस्तक  अनुष्टुप  , तारतम्य सथापित करने में सहायक रहीं हैं |

 

अवतारी युगपुरुष हैहय कुलश्रेष्ठ परम् पूज्य किर्तिविर्य राजराजेश्वर सहस्रबाहु अर्जुन को अत्यंत पराक्रमी सप्तदिव्पो के एक छत्र चक्रवर्ती हुए | भगवान दत्तात्रेय की तपस्या से उन्होंने अनैक सिध्दियां प़ाप्त की | भागवत पुराण में किर्तिविर्य सहस्रबाहु अर्जुन को सप्तदिव्पो का एक छत्र चक्रवर्ती सम्राट निरुपित करते हुए, यज्ञ, दान, ज्ञान, तप, योग, श्रृतीमान, पराक्रम और विजय में सहस्रबाहु के समान दुसरा प़तापी सर्माट नहीं हुआ, लिखा गया है | हरिवंश पुराण में उल्लेख है कि हैहयवंशी बडे़ शक्ति सम्पन्न होकर, उन्होंने अनुप देश में अपनी सत्ता स्थापित महिष्मति को अपनीं राजधानी बनाया | अनुप देश वर्तमान में नीमाड जिले में होकर महिष्मति को महेश्वर नाम से जाना जाता है |

दिग्विजय अभियान    

किर्तिविर्य सहस्रबाहु ने अपने दिग्विजय अभियान के अन्तर्गत, भृगु कच्छ के भृगु बंशी बार्हम्ण राज्य अपने आधिन कर लिया | भृगु बंशी जमदग्नि बृहमण होने के कारण, एवं अपने साढू भाई होने के कारण, संभवतः राजपुरोहित बना लिया |(अनुष्टुप पेज 91) लेकिन जमदग्नि को अपने जाने की पीड़ा, दुख, होकर महिष्मति में ही रेहकर, अपने राज्य को पुनः के लिए प़यत्न करने लगे | परिणामस्वरूप किर्तिविर्य सहस्रबाहु ने जमदग्नि को महिष्मति से हटा कर, जानापाव पर्वत की भूमि आश्रम आदि के लिए दान कर दी | यही सहस्रबाहु के एक सेनिक के हाथों जमदग्नि की हत्या हो गई और सहस्रबाहु पर ब़ह्म हत्या का दोष लगाया गया | उक्त व अन्य कारणों से श्री परशुराम जी ने प़तिशोध भावना से गृसित होकर, बदला लेने की प़बल हो गई | 

परशुराम ने संगठन बना कर सहस्रबाहु से युद्ध किया

कालांतर में परशुराम ने संगठन बना कर सहस्रबाहु से युद्ध किया | इस युद्ध में चक्रवर्ती सम्राट की सप्तदिव्प विजेता सेना ब्रह्ममाणो की सेना से ब्रह्म हत्या के दोष से बचने के लिए, छीतर वितर हो गई | उस समय बृह्म हत्या को सबसे बड़ा पाप, अधर्म, व अपराध माना जाता था (इसी कारण महाभारत युद्ध के समय अश्वस्थामा द्वारा अर्जुन के अवोध पुत्रों की हत्या की जाने के उपरांत भी अर्जुन ने अश्वस्थामा का वध नहीं किया था) श्रीराम ने रावण करने के वाद पश्चात किया | परिणामस्वरूप सहस्रबाहु की पराजय होकर, महिष्मति तहस नहस हो गई | किर्तिविर्य सहस्रबाहु ने नर्मदा तट पर अपनी देह त्याग दी | यह स्थान आज भी महेश्वर किले में स्थापित होकर जागृत स्थान है | यही पर आदि काल से घी के 11 दिये की ज्योति निरन्तर प़ज्योलित है | महेश्वर में ही एक शिला पट्टी पर पर राजराजेश्वर सहस्रबाहु अर्जुन को वंशजों, अनुयायी, उनकों पुज्य मानने वाली 100 से अधिक उत्तर भारत की जातियों की सुची अंकित है | इसके अतिरिक्त दक्षिण भारत में राजराजेश्वर सहस्रबाहु को अपना आराध्य व पुज्य मानने वाली अनेक जातियों एवं करोड़ों अनुयायी होकर, कर्नाटक राज्य में भगवान राजराजेश्वर का जन्मोत्सव एक त्योहार के रूप में मनाते हुए, जुलुस जलसों का आयोजन किया जा कर पुजा की जाती है | 

पुराणों की मिथ्या व्याख्या की गई

अब प़श्न यह है कि भारत बर्ष में वेदिक काल से देव असुर संग़ाम, राम रावण युद्ध, महाभारत जेसे अनेक युद्ध हुए लेकिन एक युगपुरुष किर्तिविर्य सहस्रबाहु की किर्ति को विद्वेष, से ग़सित होकर षडयंत्र पूर्वक, कामधेनु को प़शंग बनाकर, कलकिंत करने के उद्देश्य से, पुराणों की गलत मिथ्या व्याख्या की गई | इस प्रकार सहस्रबाहु अर्जुन की किर्ति को धुमिल करने के लिए कुचर्क रचा गया, और यह प़यत्न सफल भी रहा, |  कारण उस काल में शिक्षा, लिखने पढने अधिकार व पात्रता एक वर्ग विशेष तक सीमित थीं | ऐसी स्थिति में धर्म ग़ंथो में, पुराणों में क्या लिखा है, उसका क्या अर्थ है, इसका ज्ञान सामान्य लोगों को नहीं होती थी | ऐसी स्थिति में पुराणों की गलत मिथ्या की जाकर, इस युगपुरुष कि किर्ति को धुमिल किया गया है |

वुद्धि जीवियों, गुणीजनो, विद्वानों के समझ कुछ तथ्य रख रहा हूँ कृपया इन तथ्यों पर विचार कर, मंथन कर, अध्ययन किया जा कर सहस्रबाहु अर्जुन के जीवन चरित्र के सत्य को आम जनता, व उनके अनुयायियों के समक्ष स्पष्ट हो सकतें है: 

(1) हमारे पुराणों में कल्पवृक्ष, कामधेनु, शेषनाग, ऐरावत हाथी, स्वर्ग नर्क आदि अनेक काल्पनिक पात्रों का उल्लेख किया गया है | जबकि वास्तविकता में ये सब इस धरती पर कभी हुए ही नहीं | यदि इनमें से कोई भी इस धरती पर हुए होते तो मानव जाति इतनी स्वार्थी है कि उनके आस्तित्व को, उनकी नस्ल को, उनकी संसती को कभी भी नष्ट नहीं होने देतीं, उनकों सुरक्षित रखतीं, संरक्षित करतीं | इस प्रकार कामधेनु गाय प़ाणी का कभी भी आस्तीव ही नहीं रहा है तो उसकी केसी चोरी, उसके लिए केसा संधर्ष | 

(2) हम हिटलर, नादिरशाह, चंगेज़ खा, तेमुर लंग, आदि को बहुत बुरा कह कर, उनके कृत्यों की आलोचना करते हैं | कारण इन्होंने कत्लेआम, हत्याऐं कराकर मानव जाति का बहुत अधिक अहित किया गया है | इनके द्वारा कतलेआम हत्याऐं करने के लिए इनके स्वार्थ, इनके उद्देश्य, सत्ता, लुटपाट, अथवा धर्म प़चार आदि रहा होगा लेकिन परशुराम जी द्वारा 21 बार इस धरती को क्षत्रिय विहीन करने की प़तिज्ञा मानव मस्तिष्क की समक्ष से परे है | यदि किसी व्यक्ति की किसी से दुश्मनी भी हो तो दो तीन पीढियों में दुश्मनी समाप्त हो जाती है | और इस धरती को 21 बार क्षत्रिय विहीन करने के लिए कईं अवोध बच्चों का भी वध किया गया होगा | इस प्रकार मानव जाति का इतना अधिक अहित करने वाले को हम केसे महिमामंडित कर सकते हैं |  

(3) भारतीय संस्कृति एवं जनमानस मानता है कि “पुत कपुत हो सकता है लेकिन माता कुमाता नहीं हो सकती है” | अता परशुराम जी ने अपनी माता जी रेणुका जी की हत्या क्यों की | यह विचारणीय प़श्न है | संभवतः परशुराम जी कि माता अपनी बड़ी बहन के पति सहस्रबाहु से दुश्मनी, बेर भाव, संधर्ष नहीं चाहतीं होगी और इस बेर भाव का विरोध करतीं होगी | इस कारण श्री जमदग्नि ने क़ोध में परशुराम जी को माता की हत्या का आदेश दिया होगा | 

(4) पुज्य परशुराम जी का प़शंग त़ेर्ता युग में सहस्रबाहु से संधर्ष के रूप में, तत् पश्चात श्रीराम के भाई लक्षण के साथ सिता स्वंवर में वाक युद्ध, में, महाभारत काल द्वापर युग में, भिष्म से युद्ध में एवं करण की जंधा पर परशुराम जी द्वारा सर रखने में आता है | जबकि श्रीराम श्री कृष्ण जेसे अवतार भी मानव की सामान्य आयु के वाद मृत्यु को प़ाप्त हुए | अता तीनों युगों में जीवित रहने वाले परशुराम जी आयु कितनी रहीं होगी | तीनों युगों में जीवित रहने वाला अन्य अवतार क्यों नहीं हुए | 

(5) जब परशुराम जी के रुप में भगवान विष्णु जी इस धरती पर उपस्थित थे तो पुनः भगवान विष्णु को श्री राम, श्री कृष्ण के रूप में अवतार लेने की आवश्यकता ही नहीं थी | जबकि भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं गीता में कहा है कि आत्मा अजर अमर हो कर, ना इसे छेदा जा सकता है, ना वांटा जा सकता है, ना जलाया जा सकता है, इस प्रकार भगवान विष्णु जी कि आत्मा भी एक ही समय में दो भागों में विभाजित नहीं हो सकती है | (6) श्रीराम अवतार श्री कृष्ण अवतार सहित 24 अवतार हिन्दू धर्म में सर्वमान्य है और पुज्य है | लेकिन सिर्फ परशुराम को अवतार मानकर सिर्फ एक वर्ग विशेष द्वारा ही पुज्यनिय है, वाकि हिन्दू धर्मालम्बियो द्वारा स्वीकार नहीं होकर, अवतार नहीं माना जाता है | अता परशुराम जी सर्व स्वीकार नहीं है | 

(7) भारत में लगभग ऋषि मुनियों के आश्रम नदियों के तट के आसपास होकर उनके क्षेत्र में ही स्थित रहे हैं जबकि ऋषि जमदग्नि का आश्रम सधन वन क्षेत्र, प़सिध्द नदियों से दुर, अपने गृह क्षेत्र से दूर, आश्रम किन परिस्थितियों में किया गया |

उपरोक्त दिये गये तथ्यों का अध्ययन किया जाना चाहिए ताकि वास्तविक तथ्यों की जानकारी होकर परशुराम एवं सहस्रबाहु के संधर्ष के बिषय में सत्य को जाना जा सके |

महिष्मति के पतन के बाद

महिष्मति के बाद सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था छिन्न भिन्न होकर चारों ओर आराजकता फेल गईं | क्षत्रियों के पराजय के बाद, सहस्रबाहु ने देह त्याग के बाद महिष्मति तहस नहस कर दी गई | युद्ध में हजारों क्षत्रिय मारे गए चारों ओर मृत्यु क्षत्रियों के रक्त रजिंत शव इधर उधर छितरे पडे थे | कोई उठाने वाला नहीं था गिध्द मांस भक्षीय जीवों का साम्राज्य नज़र आने लगा | देह सँस्कार के लिए लकड़ियाँ कम पड़ गईं | विधवाएं इधर उधर भटककर विलाप कर रहीं थी | राजा और रक्षक क्षत्रियों के अभाव में चोर लुटेरों द्वारा जन सामान्य को लुटा जाना आम हो गया | क्षत्रिय युवाओं के मारे जाने से नव यौवनाऔ ने कुछ समय बाद ने अन्य जातियों के युवाओं से विवाह किया जाने के कारण भविष्य में जो ससंति हुईं उससे एक नई जाति आस्तिव में आई जिसे खत्री नाम से जाना गया | अनैक क्षत्रिय, परशुराम जी के भय से जीवन रक्षा के लिए अपने क्षत्रिय कर्म को छोड़कर पहाडों व अन्य सुरक्षित स्थानों पर रहकर जीवन निर्वाह के लिए अन्य निर्माण कार्य एवं खेती आदि कर्य करने लगे |कालांतर में वही कर्म कार्य, उनकी जातियों में परिवर्तित होकर, उन्हें उस जातियों समाज से जाने जाना लगा |

बह्मणो के आश्रय दाता, राजा एवं क्षत्रियों के अभाव में, बाह्मण कर्म, एवं नित्य होने वाले यज्ञ अनुष्ठान बंद हो गयें, यजमान की इच्छा, मनोकामनाऔ के लिए विशेष प़योजनो के लिए यज्ञ अनुष्ठानों करने की परम्परा प़ारंभ हुई | जो बह्माण विद्वत्ता, ज्ञान श्रैष्ठता प़तिक थे, उन्हें आजीविका जीवन यापन के लिए याचक बनकर वाणिक वर्ग पर निर्भर होना पड़ा | वणिक समाज पर निर्भर होने के लिए वणिक वर्ग को दान धर्म, पाप पुण्य का महत्व बताते हुए, सत्यनारायण की कथा एवं अन्य तीज त्योहारों की कथाओं की पुस्तकों व कथाओं का प़चलन प़ारंभ हुआ | वाणिक वर्ग को सत्यनारायण की कथा के माध्यम से अप़त्यक्ष भय बता कर, उन्हें दान धर्म के लिए प्रेरित किया गया |कालांतर में भागवत पुराण के अनुसार युद्धों में जो क्षत्रिय परशुराम जी से भयभीत होकर विभिन्न स्थानों, पर्वतों पर छिप गये थे, उन सभी क्षत्रियों को कश्यप मुनि ने साआदर आमंत्रित किया गया | कारण शासन व्यवस्था सम्हालना बह्मणो के वश की बात नहीं थी | परशुराम जी द्वारा विजित राज्य को कश्यप मुनि ने क्षत्रिय कुलों में विभाजित कर दिया |

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

प्रदीप वर्मा (हैहयवंशीय)

मास्टर इन कम्प्युटर एप्लिकेशन (MCA), मास्टर इन हिन्दी लिट्रेचर (MA, साहित्य), पी॰एस॰एम॰ (scrum॰org, यूएस), बेचलर ऑफ लॉं (LLB ऑनर), बेचलर ऑफ कॉमर्स, एम.एस.पी.सी.ए.डी.

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