साक्षात्कार इस बार: श्रीमती शशि खमेले

व्यक्ति विशेष संवाद साक्षात्कार

साक्षात्कार इस बार: श्रीमती शशि खमेले

साक्षात्कार इस बार की हमारी मेहमान हैं श्रीमती शशि खमेले , नागपुर व राष्ट्रीय अध्यक्ष, हैंहयवंशिय क्षत्रिय केंद्रीय संचालन समिति, नई दिल्ली ।

साक्षात्कार इस बार

नमस्कार शशि जी आप हैहयवंशीय समाज की सबसे प्रमुख संस्था की महिला प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, समाज की पहली राष्ट्रीय डिजिटल हमारी पत्रिका विमर्श में आपका स्वागत है। हम आपके आभारी हैं कि आपने आपसे साक्षत्कार का अवसर दिया, हमे उम्मीद है समाज, विशेष रूप से समाज की नारीशक्ति को आपके जीवन के विभिन्न पहलुओं को जानकर बहुत प्रेरणा मिलेगी और अधिक से अधिक मातृशक्ति सामाजिक कार्यों केलिये आगे आएंगी । इस आशा से आरम्भ करते हैं आज का प्रश्नोत्तर का सिलसिला।

शशि जी आपका जन्म और शिक्षा दीक्षा कहाँ हुई? अपने बचपन के बारे में कुछ बताइये।

मेरा जन्म नागपुर के प्रतिष्ठित परिवार में 23 फरवरी 1965 को हुआ । मेरे पिता प्रादेशिक राजनीति से सक्रियता से जुड़े और समाज के प्रतिष्ठित समाजसेवी श्री ताराचंद जी नायक थे । तीन बहनों और 4 भाईयों में सबसे बड़ी में हूँ । मेने अपने पिता को समाजसेवा करते हुए काफी करीब से देखा अतः बचपन से ही मेरे मन मे समाजसेवा का बीजारोपण हो चुका था । मेने अपनी शिक्षा हाई स्कूल तक पूर्ण की है ।

आपका विवाह किस उम्र में हुआ? आपके पति, परिवार और बच्चों के बारे में कुछ बताइये

जब में 16 वर्ष की थी मेरा विवाह नागपुर के श्री जसवंत सिंह जी खमेले परिवार में हुई । आजकल यह उम्र विवाह योग्य नही मानी जाती लेकिन उस समय यह मान्य थी । मेरे पति की उम्र 21 वर्ष थी और उनका ऑप्टिकल का व्यवसाय था । मेरी एक बेटी है जिसका विवाह जबलपुर के श्री पराग चंद्रभूषण जी पैग़वार के साथ हुआ जिससे 13 वर्ष की नातिन और 9 वर्ष का नाती भी है । मेरा बेटा अभी अध्यनरत है ।

जिस समय आपका विवाह हुआ था तब आपके परिवार में एवम समाज मे महिलाओं के प्रति कैसे विचार थे? उस दौर में महिलाओं को स्वतंत्रता मिलती थी और कितनी?

अस्सी के दशक के आरंभिक वर्ष में मेरा विवाह हुआ, यह कालखंड देश के अधिकांश हिस्सों में नारी स्वतंत्रता के लिहाज से बहुत उत्साहवर्धक नही था । उस समय समाज में महिलाओ का योगदान नही होता था । बाकी समाजों की तरह हमारा समाज भी पुरुष प्रधान समाज रहा है, समाज की सोच महिलाओ के प्रति संकुचित थी और महिलाओं को सार्वजनिक कार्य करने की, खास कर पुरुषों केलिए माने जाने वाले सामाजिक कार्यों में स्वतंत्रता भी कम थी तो उन्हें अपनी कार्य क्षमता दिखाने के अवसर ही नही मिलते थे । लेकिन इस मामले में मैं बहुत खुशकिस्मत रही । मेरा विवाह बहुत ही स्वतंत्र व खुली सोच वाले परिवार में हुआ, मेरे ससुराल का माहौल बहुत ही सकारात्मक था और मुझे किसी भी सामाजिक कार्य के लिए परिवार का पूरा प्रोत्साहन मिला जिसकी वजह से में सामाजिक क्षेत्र में यथासंभव कार्य कर पाई।

आप केंद्रीय समिति में महिला प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं आपका समाज के लिए कार्य करने के लिए रुझान कैसे हुआ? क्या किसी घटना विशेष ने आपको प्रेरित किया?

मेरे पति सदैव समाज सेवा से जुड़े रहे, वे नागपुर समाज के युवक मंडल के अध्यक्ष थे, जब आज से 30 वर्ष पूर्व उन्होंने मुझे सामाजिक कार्यों केलिए समाज से जुड़ कर कार्य करने हेतु प्रेरित किया । मेरे सास-स्वसुर और देवर ने भी बहुत प्रोत्साहित किया जिससे प्रेरित हो कर मेने समाजसेवा आरम्भ की और फिर नागपुर समाज की अध्यक्षा बनी । लगभग 14 वर्षों तक अलग अलग चरणों मे मेने नागपुर समाज की महिला अध्यक्ष का पद संभाला और अलग महिला मंडल का अस्तित्व न होने के कारण समाज ने मुझे विशेष जिम्मेदारी देकर 2 वर्ष तक अतिरिक्त सामाजिक कार्य संपन्न करवाए । मेरे कार्यकाल में मैने समाज मे बच्चो व महिलाओ के साथ साथ पुरे समाज को ध्यान में रखकर विविध कार्यक्रमों का आयोजन कराया जिससे समाज मे एक जागृति आई एव सकारात्मक माहौल का निर्माण हुआ । यही सकारात्मकता और जागृति समाज मे आज भी समयानुसार बढ़ती जा रही है। नागपुर में मेरे इन्ही सामाजिक कार्यो को देखकर मुझे केंद्रीय समिति ने राष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ के महासचिव पद पर नियुक्त किया था । मेरे द्वारा एक वर्ष में किये गए कार्यों की समीक्षा केंद्रीय समिति के पदाधिकारियों द्वारा उस वर्ष नागपुर आकर नवरात्र महोत्सव के दौरान की और संतुष्ट हो कर मुझे राष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ की अध्यक्षा मनोनीत किया।

समाज में महिलाओं और बच्चों की स्थिति के बारे में आप क्या सोचती हैं?

आज समाज में महिलाओ की स्थिति बहुत ही सम्मानजनक है, महिलाएं पहले से ज्यादा आत्मनिर्भर हो गई है, समाजहित के कार्यों में भी महिलाओं का योगदान बढ़ रहा है, नारी शक्ति की सामाजिक कार्यों में लगनशीलता बढ़ी है। बालक-बालिकाएं उच्चशिक्षित होकर हर क्षेत्र में समाज का गौरव बढ़ा रहे है । बस जरूरत है उन्हें उचित मार्गदर्शन देने की जिससे वे अपनी क्षमता व कार्यकुशलता को पहचान कर जिस भी कार्य को वो करना चाहती उसमे वे सफल हों और एक अच्छा मुकाम बनाये ।

हमारे समाज में अब अपने पुश्तैनी व्यवसाय का चलन घटा है पढा लिखा वर्ग इस में नहीं आना चाहता इस बारे में आपका क्या कहना है?

मैं आपकी बात से पूर्णतया सहमत नही हूँ, पुश्तैनी व्यवसाय को बच्चे पढ़ लिख कर उसके स्वरूप में परिवर्तन कर के आगे बढ़ा रहे है। आज भी समाज मे 70% परिवार पुश्तैनी व्यवसाय करने वाले ही है, परंतु बर्तनों का चलन कम होकर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिकस उपकरणों का उपयोग बढ़ गया है जिससे बर्तनों की मांग कम तो हुई है अतः इसका प्रभाव पारंपरिक व्यवसाय पर पड़ेगा । समयानुसार हमारे युवाओं को नए स्वरूप में अपने पारंपरिक व्यवसाय को आगे बढ़ाने और अन्य व्यवसाय से प्रतियोगिता करने हेतु खुद को प्रशिक्षित करके तैयार करना होगा ।

समाज में पुश्तैनी व्यवसायरत बुजुर्गों के लिए जो अब बिना किसी आय के वृध्दावस्था गुजार रहे हैं उनके लिए केन्द्रिय समिति और महिला प्रकोष्ठ की क्या योजनाएं हैं?

आपके पिछले तीन प्रश्नों में आप जिन समस्याओं का जिक्र कर रहे हैं उन्हें करने के लिए फंड की आवश्यकता है । महिला प्रकोष्ठ अभी अपने शैशवकाल में है, इसके शुरुआती चरण में होने से अभी इन योजनाओं को लागू करने में समय लगेगा पर मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि इन पहलुओं पर कार्य करना हमारी पहली प्रथमिकता होगी। एक बात में जरूर आपके ध्यान में लाना चाहूंगी कि इस तरह की लगभग सभी योजनाएं विगत 20 वर्षो से नागपुर समाज मे सुचारू रूप से चल रही हैं, इसलिए इन्हें राष्ट्रीय स्तर पर करने में हमे बड़ी खुशी होगी ताकि सम्पूर्ण समाज को इसका लाभ मिल सके ।

समाज में कामकाजी लड़कियों महिलाओं की संख्या बढ़ी है। आप क्या सोचती हैं कि उन्हें घर का, समाज का समर्थन मिलता है? उनकी स्थिति के बारे में आपकी क्या राय है?

मैं आपकी बात से पूर्णतया सहमत हूं, समाज मे कामकाजी लड़कियों व महिलाओं की सँख्या बढ़ी है और उन्हें परिवार की तरफ से पूर्ण सहयोग मिलता है। समयानुसार समाज का भी समर्थन मिलने लगा है तभी तो आज परिवार अपनी बहू का चयन करते समय कामकाजी युवती की चाह रखते है। वैसे तो हमारे यहां पर महिलाओ व लड़कियों की स्थिति बहुत अच्छी है परन्तु शिक्षा के अभाव में कई जगह परिस्थितिया अनुकूल नही, विशेष रूप से छोटे शहरों और कस्बों में अभी इतनी चेतना नही आई है इस दिशा में हमे ध्यान देना होगा ।

समाज में महिला उद्यमियों के लिए क्या किसी प्रकोष्ठ की स्थापना करने की कोई योजना है?

हमारे पास योजनाए तो बहुत है परन्तु अभी इन योजनाओं का क्रियान्वयन नही हो पा रहा है, परिस्थितियाँ बहुत अनुकूल नही हैं । हमारी इस विषय पर राष्ट्रीय कार्यकरिणी में चर्चा हुई है लेकिन इसे राष्ट्रीय स्तर पर अमल में लाने में अभी बहुत समय लगेगा क्योकि अभी महिला प्रकोष्ठ शरूवाती चरण में है। हम स्थानीय स्तर पर जरूर महिलाओं केलिए कुछ कार्यक्रम बना कर कार्य आरंभ कर सकते है।

सुदूर गांवों में बसे समाजजनों के बच्चों की शिक्षा दीक्षा के लिए क्या करना चाहेंगी आप समाज के संगठनों के माध्यम से?

अभी महिला प्रकोष्ठ के गठन हुए ज्यादा समय नही हुआ है, अभी महिला प्रकोष्ठ के पास संसाधन भी नही है इसलिए अभी तो हम अपने स्तर पर कुछ नही कर पाएंगे पर हमारी कोशिश होगी कि क्या हम राष्ट्रीय कमेटी के माध्यम से कुछ कर सकते है।

समाज सेवा के इस क्षेत्र में आप क्या उद्देश्य या लक्ष्य लेकर कार्य करना चाहती हैं?

देश के हर प्रान्त में जहाँ भी समाजबन्धु रहते है वहां महिलाओ का एक संगठन तैयार हो और समाज मे महिलाओ की सक्रियता बढाकर उनमे जागरूकता लाना मेरा लक्ष्य रहा है, मेने इस दिशा में बहुत कार्य किया है । मैं इस उद्देश्य में सफल भी रही, महिला प्रकोष्ठ की अध्यक्ष बनने के बाद मैंने पूरे भारत वर्ष में रहने वाली हैहयवंशीय महिलाओ को जोड़ने का प्रयास किया और उसके परिणाम स्वरूप कुछ प्रदेशों को छोड़ कर अन्य सभी जगह महिलाएं काफी उत्साह से महिला मंडल के माध्यम से समाजकार्य में रुचि ले रही है।

राष्ट्रीय महिला अध्यक्ष के रूप में आपका अभी तक का कार्यकाल कैसा रहा, राष्ट्रीय और सामाजिक स्तर पर केंद्रीय नेतृत्व के रूप में आपकी भूमिका क्या रही?

राष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ की अध्यक्ष के रूप में मेरे इस दो वर्षीय कार्यकाल से मैं संतुष्ट हूँ, इन दो वर्षों में देश मे सभी हैहयवंशीय बहने एक दूसरे को पहचानने लगी है, महिला प्रकोष्ठ के नाम से अलग अलग ग्रुप बनाकर उसमें महिलाओ को जोडा, हमारे ग्रुप में 500 महिलाए जुड़ी हैं। इस माध्यम से सबका आपस मे परिचय हुआ एवं समाज मे सभी जगह हो रही सामाजिक गतिविधियों की जानकारियाँ सभी को मिलने लगी हैं । महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश इन तीन प्रान्तों में प्रकोष्ठ का विस्तार कर विभिन्न प्रांतिय महिला प्रकोष्ठ बनाए गए जिनमे प्रांतिय महिला अध्यक्षों की नियुक्तियाँ की गई है, ये सभी अध्यक्षाएँ अपने सामाजिक दायित्व को बहुत अच्छे से निभा कर समाज मे नई चेतना का निर्माण कर रहा है। मैं इसके लिए केंद्रीय समिति को धन्यवाद देती हूँ कि उन्होंने मेरी सामाजिक कार्यक्षमता पर विश्वास कर के यह जिम्मेदारी सौपी जिससे मेने ईमानदारी से निभाया और इसी बदौलत मुझे राष्ट्रीय पहचान मिली।

समाज में महिलाओं की शिक्षा और परिवार नेतृत्व के विषय में आप की क्या विचार है?

एक परिवार की बुनियाद स्त्री है, परिवार की धुरी स्त्री है, समाज कैसा होगा या कैसा है यह इस बात पर निर्भर करता है परिवार में परवरिश कैसी है । अगर परिवार की मुखिया, परिवार की बेटी और बहू शिक्षित होगी तो आने वाली पीढियों का भविष्य ज्यादा बेहतर होने की संभावना है । कहते हैं न लड़के की शिक्षा लड़के की होती है और लड़की की शिक्षा पूरे परिवार की होती है । अगर इस आधार पर देखें तो महिलाओं की शिक्षा परिवार के श्रेष्ठ पालन हेतु अत्यंत आवश्यक है । आज शिक्षा का स्तर पहले से बहुत बेहतर है लेकिन गरीब परिवारों में बच्चियों की शिक्षा में बहुत कठिनाई आती है । आर्थिक स्थिति ठीक न होने से परिवार सभी बच्चों की शिक्षा पे ध्यान नही दे पाता है और यहीं पर लड़कियों को समझौते करना पड़ते हैं । समाज को कोशिश करनी होगी कि शिक्षा सहायता हेतु कोई योजना बनाए जिससे लड़कियों को उच्च शिक्षा के अवसर प्राप्त हो सके।

एक महिला होने के नाते आप का समाज के महिलाओं खासकर युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगी?

परिवार में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका एक महिला की होती है, उनसे मैं कहना चाहूँगी की आप अपने बच्चों को सुशिक्षित और सुसंस्कारित करें क्योकि वे ही अपने परिवार के, समाज के और देश के भविष्य हैं, वे आने वाले कल के कर्णधार है। युवाओ से मेरा कहना कि वे लड़के हों या लड़कियाँ, आज जिस तरह पाश्चात्य जीवन शैली के दुष्प्रभाव में आकर भारतीयता को भूल कर हम जो तथाकथित असभ्य आधुनिकता से आकर्षित होकर अपने जीवन से खिलवाड़ ना करे, हमारी भारतीय संस्कृति को अपनाइए यह प्राचीनतम सभ्यता होने के साथ साथ वैज्ञानिक आधार भी रखती है ओर एक सभ्य सुसंस्कारित समाज के निर्माण में अपना योगदान दें।

समाज में विभिन्न स्तरों पर समाज की सामाजिक और राजनैतिक स्थिति पर चर्चाएं चलती रहती हैं, महिला प्रकोष्ठ की अध्यक्षा होने के नाते इस विषय पर आपकी क्या राय है?

एक महिला अध्यक्षा होने के नाते सामाजिक राजनैतिक चर्चाओं के विषय मे मेरा मानना यह है कि पित्र सत्तात्मक समाज मे भी जिस तरह प्राचीन काल मे स्त्रियों का विशेष आदर था उसी प्रकार वर्तमान में भी राजनैतिक या सामाजिक संगठनात्मक चर्चा में समाज की महिलाओं को समुचित स्थान दिया जाना चाहिए । जितनी अधिक महिलाएं सामाजिक चर्चाओं में हिस्सेदार बनेंगी उतनी ही सकारात्मकता समाज मे आएगी। दूसरी बात यहकि हमें हमेशा सकारात्मक रूप से सामाजिक मुद्दों की चर्चा पर ध्यान देना चाहिए, चाहे हम अपने वैचारिक विरोधी से चर्चा करें, हमारा ध्यान मुद्दों और समस्याओं को सुलझाने में होना चाहिए । जब हम सामाजिक कार्य करते है तो हमें हमेशा नकारात्मकता का सामना करने केलिय तैयार रहना चाहिए और दूसरों की नकारात्मक सोच के कारण हमे अपना मनोबल कमजोर नहीं होने देना चाहिए क्योकि जिसने अपनी इस कमजोरी को अपने पर हावी नही होने दिया वह अपनी पूर्ण क्षमता से सकारात्मक कार्य कर सकता है । आज के समय मे समाज के विकास के लिए राजनीतिक सहयोग बहुत अनिवार्य है और हमे इस पर भी ध्यान देना होगा।

वर्तमान में समाज के केंद्रीय सीमित दिल्ली के कार्य का किस रूप में आकलन करना चाहेंगी व यह कितना सफल हुआ?

केंद्रीय संचालन समिति पिछले तीन वर्षों से अखिल भारतीय स्तर पर हैहयवंशीय समाज को संगठित करने का प्रयास कर रही है। इन 3 वर्षों में केंद्रीय समिति दिल्ली ने देश के लगभग सभी प्रान्तों के हैहयवंशीयो को जोड़ने का कार्य किया, जिसमे वह सफल रहे, आज देश के हर प्रान्त में केंद्रीय समिति दिल्ली को सभी हैहयवंशी जानते है । केंद्रीय समिति की यही राष्ट्रीय पहचान समाज को मजबूती प्रदान कर आनेवाले समय मे समाज हित के कार्यो को गतिशीलता देगी |

सम्पूर्ण भारत में समाज के विभिन्न नामों और उपनाम जो संभवतः समाज को पूर्ण संगठित करने में एक बाधा है तथा शहर स्तर से राज्य स्तर तक बने तमाम छोटे बड़े संगठनों के संबंध में आप के क्या विचार हैं?

यह सही है कि सम्पूर्ण भारत मे हैहयवंशीय एकता स्थापित नही हो पाई है । हमारा देश बहुत बड़ा है, हैहयवंश भी बहुत बड़ा है और सम्पूर्ण राष्ट्र में इसका विस्तार है, यह सरल कार्य नही है, बहुत श्रमसाध्य और धैर्य से किया जाने वाला कार्य है । पूरा देश विभिन्न उपजातियों में विभक्त है, हर कस्बे और शहर में एक से अधिक संगठन है अर्थात उपजातीय भेद के साथ साथ वैचारिक मतभेद भी चरम पर हैं । इसलिए विशेष सावधानी से काम करना होगा । हमे सर्वप्रथम क्षेत्रीय स्तर पर जो भी समितियाँ है उन्हें आपस मे जोड़कर, मतभेद मिटा कर, राज्य स्तर की समितियाँ बनाना चाहिए, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर समाज के सदस्यों को क्या समस्या है वो सामने आयेंगी, फिर उसका निदान राज्य स्तर की समिति सबके साथ विचार विमर्श कर के करेंगी, इस तरह कार्य करने से संपूर्ण भारत मे अपना समाज संगठित हो पायेगा। साथ ही केंद्र में उन्ही व्यक्तियों को व्यक्ति पद, प्रतिनिधित्व और जिम्मेदारियां दी जाय जो अपने क्षेत्र व राज्य की समिति में कार्य कर रहा हो और क्षेत्रीय समिति में सामाजिक लोकतंत्र, एकता और कार्यनिष्पादन में पारदर्शिता स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हो।

अंतिम पर महत्वपूर्ण सवाल, क्या आप राष्ट्रीय स्तर पर समाज का नेतृत्व समग्र रूप से करना चाहेंगी? वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार क्या आपको ऐसा नही लगता कि एक महिला नेतृत्व समाज को सही दिशा दे सकेगा?

एक बड़े समाज का नेतृत्व चाहे महिला करे या पुरुष, उसमे कार्यकुशलता से कार्य करने की क्षमता, समन्वय स्थापित करने की क्षमता, संगठन बनाने की क्षमता, लोगों का नेतृत्व सामने आकर करने की क्षमता होनी चाहिए, साथ ही सभी सदस्यों को समरूपता के साथ संगठित कर संगठन के कार्य पूर्ण करने की क्षमता होनी चाहिये और सबसे अनिवार्य उसमे स्वयं निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए। अगर ये नेतृत्व गुण हो तो स्त्री-पुरूष के भेद को सोचने की क्या आवश्यकता है कोई भी नेतृत्व कर सकता है । इसलिए अवसर मिलने पर मैं अवश्य सम्पूर्ण समाज का नेतृत्व करना चाहूंगी। इसमे एक बात और जोड़ना चाहूंगी कि महिलाओ को स्त्रियोचित सम्मान संगठन में मिलना चाहिए क्योकि मैं यह भी जानती हूं पुरुष वर्ग कभी भी महिला नेतृत्व स्वीकार नही करेगा। वर्तमान परिस्थितियों में महिला नेतृत्व महिला प्रकोष्ठ के लिए ही सही है । भविष्य में क्या होता है वह हम सब देखेंगे।

इस साक्षात्कार की तेयारी मे श्रीमति कविता वर्मा, इंदौर एवं डॉ॰ विष्णुस्वरूप जी गौरखपुर का विशेष योगदान रहा |
इस साक्षात्कार से संबन्धित आप अपने फीडबैक 9926619949 पर भेज सकते हैं

प्रदीप वर्मा (हैहयवंशीय)
Latest posts by प्रदीप वर्मा (हैहयवंशीय) (see all)