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सावन के स्वागत में

सावन के स्वागत में, बाँसुरी की तानें,
कोयल भी कूक उठी, राग पूर्वा गाने।

बूँदों की खुमारी से, अम्बुआ भी बहका,
सृष्टि के यौवन से, मन उपवन दहका।

घटा, मोर, पपीहे लगे गीत सुनाने,
मनुहारें इन्द्रधनुषी, मधुरम मुस्कानें।

तोड़ तट जज़्बाती, पावस नीर बरसा,
सावन की झरमर में, आषाढ़ भी तरसा!

कामना की करधनी, छेड़ती है रागिनी,
अंतर्मन प्रवाहित, स्नेह की मंदाकिनी।

जल संतूर बजाते, मयूर मन मृदंग,
उतरे मेघ धरा पर, घटाओं के संग।

हरित परिधान पहन, पुरवाई डोलती,
अवनि के अंग-अंग, नवजीवन घोलती।

तोते, सारस, टिट॒हरी, बाँटते गुड़धानी,
हिरन कुलाचें भरते, वर्षा की अगुवानी।

झूलों के मिलन गीत, सावन के हिंडोले,
अल्हड़ घटायें बहक, प्रणय स्वर में बोलें।

सावन का सम्मोहन, विचलित कर अतृप्त मन,
बूँद पड़े कोमल तन, मुग्ध हो मूँदे नयन।

वनपाँखी विमुक्त हुए, अनुरागी धड़कन,
नागफनी कर बैठी, सपनीली चितवन।

हमजोली दूँढती हैं, बेफिक्र हवाएँ,
पाने को प्रेम नीर, देती हैं सदाएँ।

आषाढ़ी बीज पके, वसुधा के द्वार,
प्राणों में प्रेम दृष्टि, देह में सिंगार।

नदियों की सांसों में, सागर की ध्वनियाँ,
सावनी उमंगों में, फल गई मनौतियाँ।

सावन सरसब्ज प्रेम, अश्रु नीर चन्दन,
पर्यावरण का तिलक, प्रकृति का वंदन।

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

गिरिराज सुधा

एम॰ कॉम॰, एम॰ फिल॰
कोटा, राजस्थान मे निवास
फोन: 9602054015

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