सेवा, शिक्षा और दानशीलता के पर्याय : श्री नन्दकिशोर जी बड़वार (ताम्रकार)

रंग बसंत व्यक्ति विशेष

(7 फरवरी 22 वाँ पुण्य स्मरण)

मध्यप्रदेश के सागर जिले की सबसे प्राचीनतम एवं बड़ी तहसील के रूप में विख्यात खुरई नगरी की पहचान सबसे उन्नत किस्म के गेंहू के उत्पादन और गुणवत्ता पूर्ण कृषि संयंत्रों के निर्माण के रूप में होती है ।  खुरई नगर के हैहयवंशीय क्षत्रिय ताम्रकार समाज में पीतल बर्तन निर्माण और विविध कला कार्यों  से जुड़े मध्यमवर्गीय, मेहनतकश एवं प्रतिष्ठित श्री मंगली प्रसाद जी बड़वार परिवार की एक अपनी ही पहचान है । 

जन्म, पारिवारिक एवं शैक्षणिक परिचय 

श्री मंगली प्रसाद जी के ज्येष्ठ पुत्र श्री करोडीलाल जी बड़वार की धर्मपत्नि श्रीमति तुलसा बाई ने 5 पुत्रियों और 2 पुत्रों को जन्म दिया । जिनमें आप द्वितीय पुत्र हैं । आपका जन्म 30 जनवरी 1939 को हुआ । शिक्षा अध्ययन के पश्चात 22/07/1959 में 20 वर्ष की उम्र में आपकी नियुक्ति शिक्षक के पद पर हो गई । महज़ 40/- के वेतन पर आपने बेसरा, धनोरा, सेमरा घाट और तेवरा आदि ग्रामों में एक शिक्षक के रूप में कार्य करते हुए शिक्षा की अलख जगाई । आपका विवाह लश्कर (ग्वालियर) के कसेरा ओली निवासी श्री भूरेलाल जी हयारण की द्वितीय पुत्री श्रीमती कपूरी बाई के साथ संपन्न हो गया । जिनसे आपको 2 पुत्र और 4 पुत्रियां मिलीं । 

वर्षों तक ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत रहने के बाद शिक्षा विभाग ने आपके सेवा कार्यों से प्रभावित होकर 06/12/1979 में आपका स्थानांतरण गृह नगर खुरई के शासकीय प्राथमिक कन्या शाला में हो गया । आपने मध्यप्रदेश के रायसेन से 14 जुलाई 1965 में बी टी आई का विभागीय प्रशिक्षण किया था । आपको 24/01/1995 में स्थानीय कबीर प्राथमिक शाला खुरई में प्रधानाध्यापक के रूप में पदोन्नति मिली । शासकीय सेवा में रहते हुए 07/02/1999 में हृदय गति रूक जाने से आपकी दिव्य आत्मा सदा सदा के लिये पंचतत्व में विलीन हो गई । 

सामाजिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक परिचय 

धर्मपरायण माता-पिता के संस्कार, बाल्यकाल से ही आप ही आपके व्यक्तित्व और कार्यव्यवहार में स्पष्ट रूप में दिखाई देने लगे थे । सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में भी आप अनवरत  रूचि रखते थे । अपने पिताश्री की भांति आपकी भी माँ सिन्ह्वाहिनी में अनन्य आस्था थी । किला गेट बाहर स्थित माँ सिन्ह्वाहिनी मंदिर हैहयवंशीय क्षत्रिय ताम्रकार समाज में जो पीतल की प्रतिमा है, आपके पिताश्री उसके साथ माँ सिन्ह्वाहिनी की एक छोटी प्रतिमा भी साथ लेकर आये थे । जो आज भी आपके घर में स्थापित है । सामाजिक और धार्मिक कार्यों में आप सदैव यथाशक्ति सहयोग दिया करते थे । मंदिर के जीर्णोद्धार कार्य में आपने भी उल्लेखनीय योगदान दिया । 

विविध परिचय 

पेशे से शिक्षक श्री नंदकिशोर जी बड़वार अपने पारिवारिक और पुश्तैनी व्यवसाय से भी जुड़े रहे । अवकाश के समय का सदुपयोग बर्तन व्यापार में किया करते थे । आप ताबीज, खैरदानी, चुनैटी और मंदिर के कलश आदि के साथ साथ अखाड़ों में आयुध के रूप में शामिल डिजाईनदार शेरमुख पटा (तलवार नुमा) अपने हाथों से स्वयं तैयार करते थे । आपने हारमोनियम के एक कुशल सुधारक के रूप में अपनी पहचान बनाई । 

विशेष चिंतन 

आपने सामाजिक और धार्मिक कार्यों में सदैव बढ़ चढ़ कर सहयोग दिया । आपकी सोच होती थी कि फिजूलखर्ची में कमी करके जो राशि संचित होती है उसका उपयोग जरुरतमंदों एवं दान के रूप में किया जाना ज्यादा श्रेस्यकर है । आप अपने बच्चों को यही सीख देते थे कि उपलब्धता होने पर तो कोई भी दान कर सकता है, बात तो तब है कि अनुउपलब्धता होने पर भी आवश्यक खर्चों से कटौती कर उस धन को जरूरतमंदों और दान में खर्च किया जाये । 

आपकी धर्मपत्नि भी आपको सामाजिक एवं धार्मिक सेवाकार्यों के लिये प्रेरित किया करती थीं । आपके बच्चे भी आपके संस्कारों को आगे बढ़ा रहे हैं । दोनों पुत्र चि अनूप और चि नीलेश रिश्तों की ” शुभ पहल ” सेवा परिवार के संस्थापक सदस्य के रूप में सामाजिक सेवा कार्यों से जुड़े हैं । छोटे पुत्र नीलेश ताम्रकार जी हैहयवंशीय क्षत्रिय केन्द्रीय संचालन समिति के राष्ट्रीय सहसचिव (मध्यप्रदेश) हैं ।  

आपकी 22 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर हम आपके प्रेरणामयी  जीवन दर्शन को शब्दों में समाहित कर स्वयं को गौरवान्वित मेहसूश कर रहे हैं । सादर शत शत नमन

प्रदीप वर्मा (हैहयवंशीय)
Latest posts by प्रदीप वर्मा (हैहयवंशीय) (see all)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *