डिजिटल विमर्श
Home » लेख » स्तम्भ » सेवा संस्मरण » सेवा संस्मरण: मेरे बाद

सेवा संस्मरण: मेरे बाद

व्यक्तिगत, सामाजिक एवं सार्वजनिक जीवन में उम्र के अंतिम पड़ाव पर..मेरे अंतर्मन में यह ख्याल बार-बार आता है, कि मेरे बाद, वर्षों से कभी न टूटने वाली चिर निद्रा में सोये मेरे बिखरे हुए हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज का ख्याल कौन रखेगा ? 

अपने अंतर्मन के इस द्वन्द को सार्वजनिक करने को लेकर मेरा  आशय यह कदापि नहीं कि मैंने अपने समाज के लिये अब तक क्या किया ! याकि..यह सब आप सबके समक्ष रखकर किसी तरह से भी आपकी प्रशंसा, प्रोत्साहन याकि सहानुभूति पाना चाहता हूँ ! बल्कि सच तो यह है कि, बहुत कुछ चाहते और सोचते हुए भी मैं अपने हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के लिये कुछ नहीं कर पाया हूँ । 

मेरे लिये मेरा हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज जी मेरा परिवार है । जीवन की अंतिम साँस तक, एक साधारण सेवक की भाँति हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज की सेवा ही मेरे इस जीवन का एकमात्र संकल्प है । अपने इस संकल्प की सकारात्मक पूर्णता के लिये यथार्थ के धरातल पर उतारने के लिये लिये मेरा संघर्ष और प्रयास निरंतर जारी रहेगा । 

मैंने अब तक व्यक्तिगत, सामाजिक एवं सार्वजनिक तौर पर जो भी कुछ किया उसे मैं महज़ भगवान श्री सहस्रार्जुन जी की प्रेरणा समझता हूँ इसके अतिरिक्त कुछ नहीं । मुझे माध्यम बनाकर वह जो जैसा मुझसे करवाना चाहते हैं मैं..बिना सोचे, बिना रूके और बिना थके, बिना किसी स्वार्थ अथवा लोभ लालच के करना चाहता हूँ । आखिरकार..जिस समाज में मुझे जन्म दिया, परिवार दिया । नाम पहचान और सम्मान दिया, उस हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के लिये समर्पण मेरा अपना उत्तरदायित्व बनता है । अपने लिये तो सब जीते हैं, लेकिन मैं इस स्वयंवादी सोच से अलग अपनों के लिये जीना चाहता हूँ । अगर अपने प्रयासों से मैं अपने हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के सर्वांगीण विकास के लिये कुछ कर पाता हूँ तो यक़ीनन ही यह मेरे जीवन की सर्वश्रेष्ठ एवं अनुकरणीय उपलब्धि होगी । 

वर्तमान में मुझे मेरे व्यक्तिगत, सामाजिक और सार्वजनिक जीवन ने अच्छा-बुरा जो जैसा भी मुकाम दिया है वह मेरे अब तक के कार्य व्यवहार का प्रतिफल है । यहाँ तक पहुँचने का पूरा श्रेय, समाज के प्रति मेरी व्यक्तिगत सोच, मेरा अपना चिंतन, मेरी अपनी परिकल्पना के साथ-साथ अपने उन सभी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सहयोगी साथियों को देना चाहूंगा । जिन्होंने हर कदम पर मेरा साथ दिया । जब मैं निराश और हताश हो रहा था, उस वक़्त में मुझे साहस और आत्मबल दिया । लक्ष्य के अनुरूप जब मुझे आगे बढ़ने की दिशा में कोई राह नहीं सूझ रही थी, उस विषम परिस्थिति में मार्गदर्शन दिया । जीवन के इस मोड़ पर मैं उन्हें विस्मृत कर स्वयं व्यक्तिगत रूप से कोई श्रेय लेना नहीं चाहूंगा । 

कठिन राह जीवन की 

इंसान का जीवन एक पानी के बुलबुले की मानिंद ही तो है, जो जरा सी ठोकर में अपना अस्तित्व खो देता है । आज जब व्यक्ति की औसत उम्र 60 वर्ष है, मैं अपने जीवन के 51 वर्ष पूर्ण कर चुका हूँ । इस चर-अचर जीव जगत में मृत्यु एक शास्वत सत्य है । जन्म लेने वाले हर प्राणी को कभी न कभी विदा तो लेना ही है । जीवन के इस आखिरी पड़ाव पर कब श्वांसों की डोर टूट जाये हम सभी इस बात से अंजान हैं । अपने अब तक के सफ़र में, अपने मौलिक चिंतन एवं कार्यव्यवहार के माध्यम से मैंने अच्छा-बुरा जो भी किया, मैं उससे भली-भाँति वाकिफ भी हूँ और संतुष्ट भी । संतुष्ट इसलिये कह रहा हूँ कि, शायद इससे अधिक और बेहतर कर पाना मेरे लिये मुनासिब ही नहीं होता । 

मैंने अपने स्वविवेक से बिना किसी से प्रभावित हुए, बिना भय और पक्षपात के, बिना किसी कार्य-योजना के, बिना किसी लोभ लालच के, अपने जीवन के लक्ष्य से विचलित हुए बिना..अच्छा-बुरा जो भी कुछ किया मुझे उससे कोई शिकायत नहीं । 

व्यक्तिगत, सार्वजनिक एवं सामाजिक जीवन में आज मैं स्वयं को जिस मुकाम पर देख रहा हूँ । मैंने कभी उसे पाने का, मेरी कोई सोच नहीं रही । संघर्ष से शुरू जीवन की इस यात्रा में मैंने बहुत से उतार-चढ़ाव देखे । अपने अब तक के सफ़र में मैंने कभी कुछ पाने की तमन्ना नहीं की । प्रशंसा, प्रोत्साहन, मान-सम्मान पाना कभी मेरा उद्देश्य नहीं रहा । उपब्धियों और कीर्तिमान कायम करने के लिये कभी कोई कार्य नहीं किया ।

आम तौर पर जीवन में लगभग सभी सहज-और सरल मार्ग चुनते हैं अपितु मैंने सदैव ही कठिन और दुर्गम मार्ग को ही वरीयता दी । असंभव प्रतीत होने वाले लक्ष्यों को अपना संकल्प बनाकर कार्य करना ही मुझे हमेशा रास आया । मैंने सामाजिक दायित्व को सदैव ही व्यक्तिगत, पारिवारिक और व्यवसायिक हितों से ऊपर रखा । जिसके लिये मैं स्वयं को कभी अपराध बोध से मुक्त नहीं कर पाया । इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि मैंने कभी अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक दायित्वों की परवाह ही नहीं की । हाँ..सामाजिक सेवाकार्यों के प्रति समर्पण के चलते मैं अपने परिवार के लिये उतना नहीं कर पाया जितना की कर सकता था । 

समाज मे राजनीति 

मुझे राजनीति कभी रास नहीं आई, और न ही कभी स्वजातीय संगठनों में रहकर कार्य करना । मेरी सामाजिक सार्वजनिक यात्रा भले ही संक्षिप्त रही हो ! अपितु अपने अब तक के सफ़र में मैं जो भी कुछ करना चाहता था उसके लिये हृदय से प्रयास किया । लीक से हटकर कुछ नया और बेहतर करना इतना आसान नहीं होता फिर भी मैंने वही किया जिसे आमतौर कोई भी कभी करना नहीं चाहेगा । प्रारब्ध काल में मिलने वाली निराशा और आलोचनाओं का डटकर सामना किया । कभी हार न मानने वाले अपने जूनून के चलते मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा । लक्ष्य तक पहुंचे बिना न मैं कभी रूका और न ही कभी थका । 

जीवन यात्रा के संस्मरणों का मेरा यह सफ़र जारी है..
अगले संस्करण में आपसे फिर मुखातिब होंगे । जय सहस्रार्जुन मित्रो

टेक्स्ट की साइज़ सेट करें

इस लेख के रचनाकार से मिलिये

हैहयवंशी चंद्रकांत ताम्रकार 

सेवक, चिंतक एवं विचारक
हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज
खुरई (जिला-सागर) मध्यप्रदेश
संपर्क : 8319385628

हमारा धर्म हमारी संस्कृति

टेक्स्ट की साइज़ सेट करें