स्त्री और पुरूष परस्पर पूरक

चुनौतियाँ और अवसर सामाजिक चिंतन

अविवाहित युवकों की बढ़ती उम्र और संख्या : हम और आप मौन, जिम्मेदार कौन ? 

उक्त विषय वर्तमान परिवेश की सम-सामयिक और ज्वलंत समस्या है, जिसने समूची मानवीय सभ्यता के भविश्य समक्ष प्रश्न चिन्ह लगा दिया है ! इस सम-सामयिक विषय को  गंभीरता से लेते हुए एक सकारत्मक, सार्थक एवं स्वस्थ्य विचार विमर्श की महती आवश्यक्ता है । ” विमर्श ” के रूप में हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज की पहली डिजिटल पत्रिका का अभ्योदय निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है । जिसने उक्त विषय पर ऑनलाईन राष्ट्रीय विचार विमर्श की भूमिका तैयार की । हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के हित-लाभ को देखते हुए इस सकारात्मक पहल के लिये ” विमर्श ” एवं उसके सहयोगियों का सकल हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के द्वारा हृदय से स्वागत किया जाना चाहिये । ” विमर्श ” पत्रिका परिवार के द्वारा ” संवाद ” के रूप में आयोजित इस प्रथम राष्ट्रीय विचार विमर्श को निश्चित रूप से सकारात्मक लिया जाना चाहिये ।

” विमर्श ” द्वारा निष्पक्षता के साथ स्वजातीय सामाजिक संगठनों, सेवा समूहों, चिन्तकों और विचारकों के साथ मातृशक्ति और युवाओं को इस प्रथम प्रयास के लिये सहभागी बनाया जाना सराहनीय है । 

” विमर्श ” परिवार की यह पहल, आखिरी नहीं ! बल्कि आगे सम-सामयिक सामाजिक विषयों, ज्वलंत मुद्दों, रीति रिवाजों और परंपराओं पर आधारित इस तरह के कई कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे । अतैव किसी व्यक्ति विशेष अथवा समूह द्वारा यह सोच लेना कि उसे महत्व नहीं दिया गया यह अनुचित है । साथ ही सकल समाज के द्वारा हृदय से स्वीकृति दिये जाने के बाद, मात्र व्यक्तिगत पुर्वागृहों के लिये एक संगठन विशेष से जुड़े हुए लोगों के द्वारा इस सकारात्मक पहल का बहिष्कार किया जाना निसन्देह दु:खद है । 

उक्त विषय पर अपने व्यक्तिगत विचार रखने से पूर्व, मैं उस तथ्य को आपके समक्ष प्रस्तूत करने जा रहा हूँ, जो कहीं न कहीं इस राष्ट्रीय सामाजिक विषय का मूल है । 

” यत्र नारियेस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता “ यह हमारी संस्कृति का मूल है । अर्थात जहां नारी की पूजा होती है, उस स्थान पर देवताओं का वास होता है । ” कन्या “ को देवी का रूप मानकर पूजा की जाती है । ” माँ “ का दर्जा गुरू और ईश्वर से ऊपर माना गया है । माँ, बेटी, बहिन और पत्नि के रूप में स्त्री ने हमेशा ही पुरूष का सत्य और निष्ठा के साथ साथ निभाया है । देव-असुर संग्राम में देवताओं की हार को सुनिश्चित मानते हुए, देवी माँ ने रण चंडी का रूप रखकर असुरों का संहार के देवताओं (पुरूषों) के अस्तित्व की रक्षा की । ईश्वर ने मानवीय सभ्यता के अनवरत संचालन के लिये स्त्री और पुरूष की रचना कुछ इस तरह से की है, कि एक के होने पर ही दुसरे का अस्तित्व रहेगा । स्त्री और पुरूष परस्पर एक दूसरे  के पूरक हैं । इस स्थिति में किसी एक को महत्व देना, अथवा दूसरे कि उपेक्षा करना ठीक वैसे ही होगा, जैसे कि प्राणवायू के बिना शरीर । सामाजिक व्यवस्था के प्रादुर्भाव से आज तक स्त्री-पुरूष दोनों ने नव-सृजन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को बखूबी अंजाम दिया है । जहां स्त्री घर-गृहस्थी-बच्चों और पूरे  परिवार को संभालती रही है । तो वहीं पुरूष ने परिवार के संचालन की जिम्मेदारी अपने काँधे पर उठा रखी है । अपितु किसी एक के महत्व को दूसरे से कमतर आंकना सीधा सीधा उसके अस्तित्व की उपेक्षा है । 

सामाजिक व्यवस्था के अभ्योदय से आज तक मानवीय सभ्यता के संचालन की बागडोर पुरूष वर्ग के हाथों में ही रही है । जिसके चलते स्त्री के महत्व को सदैव पुरूषों की तुलना में महत्व कम दिया गया । सदियों से पारिवारिक मर्यादा के नाम पर स्त्री वर्ग दासिता का जीवन जीती आ रही है । हमारे पुरूष प्रधान समाज ने लगभग हर मोर्चे पर स्त्री को पुरूष की तुलना में महत्व कम दिया । शिक्षा एवं व्यवसाय और नौकरी के योग्य नहीं समझा । जिसके चलते प्रारब्ध से आज तक स्त्री वर्ग की घोर उपेक्षा की जाती रही । 

” बेटी ” को इस पुरूष प्रधान व्यवस्था ने ” गाय ” की उपमा दी थी । बिना उसकी पसंद और मर्जी जाने उसकी ज़िंदगी का फैसला कर दिया जाता था । कभी ससुराल में दु:ख/यातना/अत्यचार होने पर कहा जाता था, ” बाबुल के घर से बेटी की डोली उठती है और पति के घर से  अर्थी ” स्त्री वर्ग भी इस सामाजिक सिद्धांत को अक्षरशः स्वीकार कर जुल्म और अत्याचार को ही अपना भाग्य मानकर चुपचाप सहती आई है । 

दहेज के नाम पर अपने हृदय पर पत्थर रखकर पिता की पगड़ी को उछ्लते खुली आंखो से देखती आई है । न जाने कितनी ही बेटियों को दहेज की आग में झुलसने को मजबुर होना पड़ा । तो कभी फांसी के फंदे को चूमना  पड़ा । बेटे के जन्म पर खुशियाँ, बेटी के जन्म पर मातम, स्त्री वर्ग पर इस पुरूषवादी समाज के जुल्म की इन्तेहाँ तो तब हो गई ” जब जन्म लेने से पूर्व ही बेटियों को गर्भ में ही मार दिया गया ।” सोच कर रूह काँप उठती है ! हमारे पुरूष प्रधान समाज द्वारा निर्धारित दोहरे मापदण्ड के अनुसार, पत्नी के जीवित रहते पति की मृत्यू हो जाने पर उसे डायन पर पुरूष से बात करने पर कुल्टा जन्म लेते ही बच्चे की मृत्यु  हो जाने पर नागिन जैसे असम्मान सूचक संबोधनों का प्रयोग किया जाता था । लेकिन कहते हैं न कि, वक़्त कैसा भी बदलता जरूर है ।

” वक़्त के साथ साथ शनैः शनै ही सही बदलाव भी आता है ” हुआ भी यही । 

अतीत और आज की तुलना कीजिये, आपको वर्तमान स्थिति पर कोई हैरत नहीं होगी । बेशक स्त्री वर्ग को अपनी तुलना में कमतर समझने वाले पुरूष ने कभी स्त्री को महत्व नहीं दिया । और..लेकिन, स्त्री ने भी अपना भाग्य समझकर इस अन्याय, जुल्म और अत्याचार का कभी कोई प्रतिकार नहीं किया । अपनी बेटी के सुखद वैवाहिक जीवन की आकांक्षा में उसके अभिभावकों ने किसी प्रतिष्ठित व्यवसायी परिवार अथवा नौकरी वाले रिश्ते की तलाश की तो उसके एवज में उसे  अपना घर-जेवर और जमीन भी दांव पर लगानी पड़ी, लेकिन इसके बाद भी बेटी को सुख खरीद कर नहीं दे सका । पुरूष प्रधान सामाजिक व्यवस्था के संचालन कर्ताओं के द्वारा स्त्री और पुरूष वर्ग के लिये निर्धारित दोहरी मापदण्ड व्यवस्था के जो भी कारण रहे हों, लेकिन अतीत की कड़वी भयावहता से सबक लेकर स्त्री वर्ग ने आज स्वयं को लगभग हर मोर्चे पर साबित कर दिया है । मातृशाक्ति ने यह दिखा दिया है, कि उसके बगैर पुरूष वर्ग का कोई अस्तित्व नहीं । 

आज की स्त्री किसी भी मामले में पुरूष वर्ग से बहुत आगे है, स्त्री को अबला मानकर सदियों से महत्वहीन और उपेक्षित मानकर जुल्म और अत्याचार का युग समाप्त हो चुका है । 

बेटियाँ अपना भला-बुरा बखूबी समझने लगीं हैं

वर्तमान परिवेश में कोई भी स्त्री वर्ग पर अपनी मनमर्जी थोपने का दुस्साहस नहीं कर सकता । आज की बेटियाँ अपना भला-बुरा बखूबी समझने लगीं हैं । वह अपनी जिन्दगी और भविश्य का फैसला स्वयं करने में सक्षम हैं । विवाह आज अविवाहित युवाओं के समक्ष एक चुनौती और विकराल समस्या के रूप में है, और इसके लिये स्त्री और पुरूष के लिये दोहरे मापदण्ड को ही मैं पुर्णता: जिम्मेदार मानता हूँ । हमारे पुरूष प्रधान समाज ने नारी को अबला मानकर, अतीत में जो जुल्म और अत्याचार किये वर्तमान में व्याप्त समस्या उसी की परिणिती है । 

अन्तत : 

स्त्री और पुरूष ” दाम्पत्य जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिये के जैसे होते हैं, किसी एक को महत्व और दूसरे की उपेक्षा करना सर्वथा अनुचित है ।” अतीत में स्त्री के साथ जो हुआ वर्तमान उसी की परिणिती है, और वर्तमान में जो होगा वह आने वाले भविश्य की इबारत लिखेगी । नारी को त्याग की मूरत कहा जाता है, मेरा मातृशक्ति से विनय पुर्वक निवेदन बस यही निवेदन है, मानवीय सभ्यता के समूल नाश का कारण बनने कदापि न बनें, पुरूष वर्ग का अस्तित्व खत्म होने से स्वयं नारी का अस्तित्व भी खत्म हो जायेगा । पुरूष प्रधान समाज व्यवस्था के कर्ता-धर्ताओं को मेरा यही सविनय आगृह से स्त्री वर्ग के महत्व को स्वीकार कर, सदियों से हो रहे जुल्म, अन्याय और अत्याचार पर त्वरित लगाम लगाये । स्त्री और पुरूष के लिये एक समान व्यवस्था पर विचार करे । अन्यथा वर्तमान की तुलना में भविष्य के भीषण परिणाम को भुगतने के लिये तैयार रहे । ” अभी भी वक़्त है संभल जाओ जहां वालो, वर्ना तुम्हारी दास्ताँ भी न रहेगी दास्तानों में 

 

हैहयवंशी चंद्रकांत ताम्रकार 

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