डिजिटल विमर्श
Home » लेख » स्तम्भ » झरोखा » हमारी धरोहर: भाग दो

हमारी धरोहर: भाग दो

हैहयवंशीय गौरव वर्मा

स्तंभकार का एक संक्षिप्त परिचय
नाम:गौरव वर्मा ( वर्तमान प्रवक्ता अंग्रेजी एवं पूर्व प्रधानाध्यापक ) निवास: नगर फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश। सम्मानित वरिष्ठ सदस्य- ' दीप ' ( साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था, फर्रुखाबाद ) सम्मानित सदस्य- सलाहकार एवं चयन समिति ( श्री सहस्रार्जुन शिक्षा योजना) ; द्वारा अखंड हैहयवंशीय क्षत्रिय विकास समिति (रजि.) सम्मानित सदस्य ( मनोनीत )- विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएं।

ज्ञानेश कुमार अग्निहोत्री

निवास स्थान: राजेपुर, फर्रुखाबाद. (उत्तर प्रदेश). सदस्य: 'राष्ट्रीय सरल साहित्य अकादमी', हरदोई. (उ०प्र०). संपर्क: +91 99367 35414

अपने सपूत के चरित देख
जब मात पिता हर्षाते हैं,
आशीर्वाद पाते सौ सौ
भवसागर से तर जाते हैं।

जो दुष्ट पुत्र दुष्कर्मों से इन
का अंतर छलनी करते
वे रौरब नर्क झेलते हैं भव
सागर से न कभी तरते।

निज मात पिता सर्बोच्च मान
गणपति हो मूसक पर सवार।
श्रद्धापूर्बक निज बूते पर
की थीं परिक्रमा सात बार।

बन गए गजानन प्रथम पूज्य
उनके समान नहि सुर दूजा
अपने बिबाह गौरा शिव ने
की थी उनकी ही पूजा।

य़ह माना कि लड़ाई आर पार की है।
मगर बात तो सातवें द्वार की है।

परखने सब खड़े रणभूमि में कौशल।
चुनौती चक्रव्यूह की स्वजन संहार की है।

धर्मसंकट है , मगर धर्म का उत्थान भी है।
स्वीकार यदि रण है नहीं तो महा अपमान भी है ।

धर्म सम्मत प्रण रहे यदि प्राण के उत्सर्ग से,
वीर योद्धा सोचता क्या कभी परिणाम भी है।

तन सुंदर मन सुमन भए मस्तक रचे अबीर।
प्रेम पाश में बंध रहे राजा रंक फकीर।।

सुखद मंद मादक अधिक पुरवा वहे समीर।
फागुन की मधु गंध से पुलकित हुए शरीर।

घर घर में घरनी करें पूजा व्रत और दान
नए अन्न से करे रहे अग्नि देव का मान।

हर्ष हृदय में भर रहे करते मंगल गान ।
प्रेम नेम से लेत सब गुजिया पापड पान।

तन सुंदर मन सुमन भए मस्तक रचे अबीर।
प्रेम पाश में बंध रहे राजा रंक फकीर।।

सुखद मंद मादक अधिक पुरवा वहे समीर।
फागुन की मधु गंध से पुलकित हुए शरीर।

घर घर में घरनी करें पूजा व्रत और दान
नए अन्न से करे रहे अग्नि देव का मान।

हर्ष हृदय में भर रहे करते मंगल गान ।
प्रेम नेम से लेत सब गुजिया पापड पान।

ना विरह की वेदना हूं।
ना घुटन में घुट रहा हुँ।
शब्द की पूंजी सम्भाले,
अर्थ दे कर लुट रहा हूँ ।

ना किसी का मीत निमर्म,
ना किसी की प्रीति हरदम,
भाव में जो अनुभाव पा ले
वो गीत बनकर छुट रहा हूँ |

सत पथ कंटक से भरा, समय करे प्रतिघात।
दिन दुख दूना बढ रहा, मन में भय अज्ञात ।
बांट दिये दुःख दर्द सब,बाकी क्या सौग़ात।
आंसू आहें करुण स्वर ,शेष अन्धेरी रात।
फिर- फिर चिन्तित चेतना मौन, कर रही बात।
अगर निराशा छा गई, दिन प्रतिदिन उत्पात।

प्रात की बेला बिखरती रश्मियाँ नभ से प्रभाती कह गयीं ।
छा गया आलोक जग में,
उपवन में कलियाँ मुस्कुराती रह गयीं।
सप्तरंगो से सजा अचला का आँचल फागुनी,
मकरंद पीती तितलियां यूँ गुनगुनाती रह गयीं।
टिमटिमाते छिप गये नभ में सितारे,
मोतियों की माल सी शबनम सुहाती रह गयी।
तन मन जलाया दीप ने घोर तम के वास्ते,
झिलमिलाती दीप की लौ गीत गाती रह गयी ।
मन्द आहट से खुली आँखे उनींदी स्वप्न से,
धड़कने यूँ बांचती कोई प्रेम पाती रह गयी।
है कोशिशें अपनी कि हरदिल में उजाले की,
अब लेखनी ही रोशनी की एक थाती रह गयी।

छटा सुबह की अति सुखद सुहानी लगती है।
अरुणिम किरणों की आभा में पवन दिवानी लगती है।
खगकुल के कलरव को सुनती,
ऊषा अधिक सयानी लगती है।
नभ से झांक रहा है दिनकर
धरा की चूनर धानी लगती है।
मधुकर का मधु सुमन समेटे,
खिली कली मुस्कान लिए बलिदानी लगती है।
निज तृषा तृप्ति को जागे नभचर,
सुबह-सुबह की नींद बहुत बेमानी लगती है।
मोती तल से गया अतल में,
बीच भंवर में सीप समानी लगती है।
बहके-बहके और उनींदे नैनों में
कोई गम्भीर कहानी लगती है।

निराश नहीं होना है,धैर्य नहीं खोना है।
मन मरुभूमि में संकल्प बीज बोना है।
ध्यान ज्ञान कर्म केप्रचंडतम प्रवाह में,
दीन हीन भावों कोपूर्णत: डुबोना है।
प्यासी पथरायी अलसायी नम आँखों को
आसा उत्साह स्नेहजलबिन्दु से भिगोना है।
काल विकराल की क्रूर हुँकार बीच ,
छिन्न-भिन्न जीवन को सतत सजोना है।

कुछ आदर्श निभाने पडते हैं, कुछ आदर्श बनाने पड़ते हैं।
संकल्पों की सुद्र्ढ नींव पर, कुछ स्वप्न सजाने पड़ते हैं।
जब संघर्षों की जुडती कड़ियां, तब सुजन मनाने पड़ते हैं ।
जब अन्धकार पथ करता विचलित,तब दीप जलाने पड़तेहैं।
जब सत्य समर्थन में हो अडचन, तब गीत सुनाने पड़ते हैं।
जब शांति दूत हो जाते असफल, तब शीश कटाने पड़ते हैं।

करने लगे हैं आप सवालात किस क़दर
बिगड़ने लगे हैं आज हालात किस क़दर।
खोते ही जा रहे हो अदब आबरू
भड़कने लगे हैं अब जज़्बात किस क़दर।
है अपनी आरज़ू कि रोशन जहान हो
होने लगे हैं दिल पे आघात किस क़दर।
मौन होकर भी शब्द हो गये हैं ज़ख्मी
चुभने लगे हैं लफ्ज अकस्मात् किस क़दर।
होने लगी है अब तो बेनूर ये आंखें
करने लगे हैं आईने बात किस क़दर।

किसके चिंतन से हम चेते?
किसके आदर्शों में जीते ?
किसके स्वाभिमान से जागे?
किसका गौरव गान सुनाकर बढ़े विश्व में आगे?

जिसके प्रण को राम पालते।
संकल्पों की नींव डालते।
प्राण गये पर प्रण न टालते।
उनके चिन्तन से हम चेते।
उनके आदर्शों मे जीते।
उनके स्वाभिमान से जागे।
उनका गौरव गान सुनाकर बढ़े विश्व मे आगे।

जिसका कण्ठ हलाहल पीता।
जिसका वक्त बिजन में बीता।
जिसकी रखवारी में सीता।
जिसका पड़ा सिंहासन रीता।
जिसने लिखी भागवत् गीता।
उनके चिंतन से हम चेते।
उनके आदर्शों में जीते।
उनके स्वाभिमान से जागे।
उनका गौरव गान सुनाकर बढ़े विश्व में आगे।।

जिसने तोड़ी कंस की कारा।
बदली परिबर्तन की धारा।
मिटा दिया जग का तम सारा।
उनके चिंतन से हम चेते।
उनके आदर्शों में जीते।
उनके स्वाभिमान से जागे।
उनका गौरव गान सुनाकर बढ़े विश्व में आगे।।

जिसने घास की रोटी खाई।
जिसकी बिखर गयी तरुनाई।
न जिसके द्वार बजी शहनाई।
उनके चिंतन से हम चेते।
उनके आदर्शों में जीते।
उनके स्वाभिमान से जागे।
उनका गौरव गान सुनाकर बढ़े विश्व में आगे।।

पग पग पर प्रतिबंध मिले हैं।
झूठे सब अनुबंध मिले हैं।
अविश्वास के अंधियारे में
संशय के सम्बंध मिले हैं।
श्री कृष्ण के मीत सुदामा।
भेंट को चावल चंद मिले हैं ।
प्रेम दिवानी मीरा के घर
जहर को पीते छ्न्द मिले हैं।
ना नंदगांव मथुरा बरसाना
घनश्याम जेल में बन्द मिले हैं।
राम संग बनवासिन सीता
कौन कहे आनंद मिले हैं।
हम अपनो से हो गये पराजित,
घर घर मे जय चंद मिले हैं।

न हम बदले न तुम बदले दिन मुहब्बत के मगर बदले।
शिकन माथे पे क्यूं उनके जो पल भर में सनम बदले।
बहाकर अश्क आँखो से समझते हो कि गम बदले।
कुछ तुम्हारे हक में लिखने को कातिब ने कलम बदले।
हर रोज़ बदलती है दुनिया ऐसा है कोई जो अलम बदले।
लिखावट पढ़ न पाए हैं सौ सौ बार जनम बदले ।
माथे पे शिकन उनके नहीं कोई,
जो धोखे दे और धर्म बदले।
है ख्वाब से बेहतर नहीं कुछ भी
मुसीबत में हकीक़त हर कदम बदले।

बौर बौराने बागन में आम,
सुगंध भरी अमराई है।
पीले हाथ हुये सरसों के,
मानौ तय आज ही भयी सगाई है।
भरभराई मटर उठी गले मिले बथुआ के,
चहके चना चहुओर चाल चित की चुराई है।
चट-चट ध्वनि देत अंडीं के पेड़ के कहिं,
जौं ने जम्हाई लेत मूँछें बिखराई है।
पात पात चौपती के अरुझानी अक्शा की बेलि,
गेहुं को जवान देखि अरहर अकुलायी है।
सब आलस त्याग बसंत में अलसी,
गुभिया पे पॉव धरि फूली मुस्कायी है।

बच्चों की किलकारी कविता,
होली की पिचकारी कविता l
जन गण मन को प्यारी कविता ,
समय समय पर न्यारी कविता l
फ़ूलों सी मुस्कान बिखेरे
रसिको की मनहारी कविताl
दुख दर्दो में आंसू पोंछे
ओछे मन पर भारी कविता l
त्याग और बलिदान की थाती,
अरि के लिए कटारी कविता l
जनमानस का भाव समेटे,
अर्थों की अधिकारी कविता।
सहज शक्ति अवचेतन मन की,
हिय की दुखद पिटारी कविता।
छंद बद्ध स्वच्छंद उमर भर
विचरण करे बिचारी कविता।
सजल शान्ति में अनल क्रांति में
हर युग में रही दुधारी कविता।
सत्य अहिंसा आदर्शों की है
साधक और पुजारी कविता।
कवि उर पुर में सजती बसती,
अब तक मगर कुंवारी कविता।

टेक्स्ट की साइज़ सेट करें

इस लेख के रचनाकार से मिलिये

हैहयवंशीय गौरव वर्मा

निवास- नगर फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश।
सम्मानित वरिष्ठ सदस्य- ' दीप '
( साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था, फर्रुखाबाद )
संपर्क: 9889555424

हमारा धर्म हमारी संस्कृति

टेक्स्ट की साइज़ सेट करें