हमारी धरोहर

काव्य

प्रिय मित्रों विमर्श के इस अंक से हम एक नवीन स्तंभ को प्रारम्भ कर रहे हैं;– ‘हमारी धरोहर’। यह स्तंभ आपको कैसा लगा; इस पर आप सभी की प्रतिक्रिया प्रतीक्षारत है।

‘हमारी धरोहर’ स्तंभकार का एक संक्षिप्त परिचय

नाम
-गौरव वर्मा ( वर्तमान प्रवक्ता अंग्रेजी एवं पूर्व प्रधानाध्यापक )
निवास- नगर फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश।
सम्मानित  वरिष्ठ सदस्य- ‘ दीप ‘ ( साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था, फर्रुखाबाद )
सम्मानित सदस्य- सलाहकार एवं चयन समिति ( श्री सहस्रार्जुन शिक्षा योजना) ; द्वारा अखंड हैहयवंशीय क्षत्रिय विकास समिति (रजि.)
सम्मानित सदस्य ( मनोनीत )- विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएं।

कवि परिचय: निमिष टण्डन ‘निमिष’

Mo.no. 9451906916
पता –2/163 मो० खतराना, फर्रुखाबाद (उ.प्र.)।
पिता — श्री राजेन्द्र नारायण टण्डन 
व्यवसाय –थोक वस्त्र व्यवसायी
प्रतिष्ठान — आशीर्वाद क्लॉथ स्टोर, नेहरू रोड, फर्रुखाबाद।

  • संस्थापक सह अध्यक्ष “दीप” (सामाजिक,साहित्यिक,एवं सांस्कृतिक) संस्था, फर्रुखाबाद।
  • आजीवन सदस्य ‘अभिव्यंजना’ संस्था, फर्रुखाबाद
  • उपाध्यक्ष ‘संस्कार भारती’ संस्था,फर्रुखाबाद।
  • वरिष्ठ उपाध्यक्ष ‘सरल साहित्य अकादमी’ संस्था, हरदोई।
  • सदस्य ‘अभिव्यक्ति’ संस्था, फर्रुखाबाद।

ग़ज़ल: तुम्हीं एक साँचे हो प्रियतम हमारे

यादें तुम्हारी गज़ल हो गई है ।
समस्याएं सारी सरल हो गई है ।।
हर शै में लगता कि तुम ही बसे हो ।
तुम्हें देख आँखें सजल हो गई है ।।
बसे ही रहो आप दिल मे हमारे ।
भावनायें सारी विमल हो गई है ।।
तुम्ही एक साँचे हो प्रियतम हमारे ।
तुम बिन तो खुशियां गरल हो गई है ।।
मिलता रहे बस सदा प्यार तेरा ।
तभी दिल की आहें तरल हो गई है ।।
मुझे हर “निमिष”बस तेरी याद आये ।
चले आओ चाहें विकल हो गई है ।।


ग़ज़ल
शिकायत तो जिंदगी में होती है सभी को,
तेरे बिन जिंदगी को जिए जा रहे हैं।
जिंदगी रहने की चाहत खत्म हो चुकी है,
जहर जैसा उसे हम पिए जा रहे हैं।
तमाम ख्वाहिशों के साथ जी रहे हैं,
मगर होठ अपने सीए जा रहे है।
मेरे खातिर कोई सोचे ना सोचे मगर,
दुआएं अपनी हम उनको दिए जा रहे हैं।
कत्ल मेरा उन्हीं ने किया था निमिष,
जनाजा भी वही मेरा लिए जा रहे हैं।।


ग़ज़ल
मेरी आगोश में जब भी आया करो।
बेवजह ही नहीं कुलबुलाया करो।।
मेरी आगोश में है मज़े ही मज़े।
कुछ मज़े यार तुम भी उठाया करो।।
इसकी खातिर मिटाए कई फासले,
अब नए फैसले मत बढ़ाया करो।
ना – नुकुर भी तुम्हारी यह दिलचस्प है,
नखरे हमको अधिक मत दिखाया करो।।
तुम को पाकर मुझे जिंदगी मिल गई ,
प्यास ऐसे ही मिलकर बुझाया करो ।
यह “निमिष” भर का सुख है मेरी जिंदगी,
आ के आगोश में मुस्कुराया करो।।


ग़ज़ल
कई लोग बोले कि मैं मनचला हूं।
मगर सच तो यह है कि मैं दिलजला हूं।
किसे खोलकर ज़ख्म दिल के दिखाऊँ?
कि मैं दर्द का वन गया काफ़िला हूं।
कोई काश मेरी हक़ीक़त तो समझे,
कई बार तो मौत से भी मिला हूं।
फिर भी चला जा रहा कारवाँ है,
किसी के लिये सिर्फ शिकवा गिला हूँ।
“निमिष” भर तो मिलता अगर प्यार तेरा,
खिले ज़िंदगी यह अभी अधखिला हूं।


ग़ज़ल:-
आँख से आँख जब भी मिलाया करो,
तो इशारों में सब कुछ बताया करो।
राजे-दिल तेरा जानम समझ जायेंगे,
यूं न नजरें सनम तुम झुकाया करो।
बाबा आदम से दुश्मन ज़माना रहा,
फिर भी दिल अपना दिल से मिलाया करो।
फूल बनकर मिलूँ जब सरे -राह मैं,
खुश्बू बनकर गले से लगाया करो।
रेत की एक दीवार अपना नहीं प्यार है,
प्यार जीवन-मरण तक निभाया करो।
यह समय कल मिले न मिले ए “निमिष”
आज ही दर्दे दिल तुम सुनाया करो।


तेरा सुमिरन ही बस सहारा है

जग तो झूठा-सा इक नज़ारा है ।
चंद साँसों का खेल सारा है ।।
साँस हर एक कीमती अपनी ।
उसको हरि -भक्ति से निखारा है ।।
मेरी उम्मीद आसमां चूमे ।
तहे-दिल से तुम्हें पुकारा है ।।
आप दिल में मेरे बसे रहना ।
“तेरा सुमिरन ही बस सहारा है”।।
मेरी नज़रे तुम्हे तलाश करें ।
तेरे चरणों में बस किनारा है ।।
“निमिष” भर आपको नहीं भूलूं ।
मेरे दिल का यही इशारा है ।।


कविता
ख़ुदा का करम है थका भी नहीं हूँ।
रुका तो नहीं पर चला भी नहीं हूँ।।
मुक़द्दर कहाँ लेके जायेगा उसको।
मैं मंज़िल की उसकी पता भी नहीं हूँ।।
जो दुश्मन हैं मेरे वतन के वो सुन लें,
मैं मैदाँ से अब तक हटा भी नहीं हूँ।।
निगाहों से तेरी गिरा हूँ “निमिष” पर।
भला भी नहीं पर बुरा भी नहीं हूँ ।।

 

हैहयवंशीय गौरव वर्मा
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